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रविवार, 30 दिसंबर 2012

रौब के तोते -लघु कथा

 

पुलिस स्टेशन में लैंडलाइन फोन बजा .थानाध्यक्ष ने रिसीवर उठाया .फोन पर आवाज़  साफ़ नहीं आ रही थी .उधर से कोई महिला बोल रही थी .थानाध्यक्ष जी समझने की कोशिश करते हुए प्रश्नों की बौछार करने में जुट गए -''.......क्या ...कौन भाग गयी ...किस इलाके से बोल रही हो ...भाई हमारा थाना वहां नहीं लगता ...अपने बच्चों को सँभालते नहीं....यहाँ फोन कर देते हो ......किसे किसे ढूंढें ....पहले ही गोली क्यों नहीं मार देते ....?'' ये कहकर थानाध्यक्ष जी ने फोन झटककर रख दिया .तभी उनका निजी  मोबाइल बज उठा .कॉल  घर से थी .वे कुछ बोलते उससे पहले ही उनकी श्रीमती जी का उन्हें लताड़ना शुरू हो गया - ''मोबाइल मिलाओ वो नहीं मिलता .थाने के नंबर पर फोन करो तो आप आवाज़ नहीं पहचानते .घंटे भर से आपको बता रही हूँ कि सपना एक चिट्ठी  लिखकर भाग गयी है किसी लड़के के साथ .ढूंढो उसे .'' ये कहकर गुस्से में श्रीमती जी ने फोन काट दिया और थानाध्यक्ष जी के रौब के तोते उड़ गए .
                               शिखा कौशिक 'नूतन '

रविवार, 23 दिसंबर 2012

क्या यही है पुरुष !!-एक लघु कथा

 Delhi gang rape case: Section 144 lifted, protesters continue battle

शहर में बलात्कार -आरोपियों को कड़ी सजा दिलाने हेतु उग्र आन्दोलन चल रहा था .युवक-युवतियां पूरे जोश व् गुस्से में अपनी भावनाओं का इज़हार कर रहे थे .सिमरन भी अपनी सहेलियों के साथ इस गुस्साई भीड़ का हिस्सा थी .दिन भरे चले आन्दोलन के बाद सिमरन रेखा व् पूनम के साथ एक ऑटो   पकड़कर अपने घर को रवाना  हो गयी .ऑटो  ने उन तीनों को एक चौराहे पर उतार  दिया जहाँ से तीनों अपने घर को पैदल ही चल दी .सिमरन का घर थोड़ी ही दूर रह गया था तभी पीछे से एक बाइक जिस पर तीन युवक सवार थे तेज़ हॉर्न बजाती हुई उसके पास से इतनी तेज़ी से निकली कि एक बार को तो सिमरन घबरा ही गयी .सिमरन दो कदम ही बमुश्किल चल पाई थी कि वो बाइक मुड़कर सामने से आती हुई फिर दिखाई दी .इस बार उसकी रफ़्तार सामान्य से भी धीमी थी .उस पर सवार तीनों युवकों ने सिमरन के पास से गुजरते हुए उस पर फब्तियां कसी -''.....ए झाँसी की रानी ........आती क्या खंडाला .......हाय सैक्सी '' सिमरन उनके चेहरे देखकर ठिठक गयी .सिमरन उन्हें पलट कर कोई जवाब देती उससे पहले ही वे बाइक की रफ़्तार बढाकर फुर्र हो गए .घर तक पहुँचते पहुँचते सिमरन को आखिर याद आ  ही गया कि ये तीनों चेहरे उसे इतने जाने पहचाने क्यों लगे !! दरअसल ये तीनों आज के आन्दोलन में सबसे उग्र प्रदर्शनकारी थे .सिमरन के होठों पर एक फींकी व्यंग्यमयी मुस्कान तैर गयी और मन में उथल-पुथल '...क्या यही है पुरुष जोअन्य पुरुषों द्वारा प्रताड़ित स्त्री के लिए तो न्याय मांगता है और खुद किसी स्त्री को प्रताड़ित करने में आनद की अनुभूति करता है ..''
                                    शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

ऐसे समाज को फांसी पर लटका दो -लघु कथा

 Seagull collects a puffin

अस्पताल के बाहर मीडियाकर्मियों व् जनता की भीड़ लगी थी .अन्दर इमरजेंसी में गैंगरेप  की शिकार युवती जिंदगी व् मौत से जूझ रही थी .मीडियाकर्मी आपस में बातचीत कर रहे थे -''अरे भाई लड़की का नाम व् पता बदलकर छापना ....बेचारी अगर जिंदा बच गयी तो इस समाज का सामना कैसे करेगी ?''जनता का मुख्य उद्देश्य भी युवती का नाम -पता जानना था .तभी अस्पताल के भीतर से एक प्रौढ़ महिला हाथ में एक फोटो लिए बाहर आई . और अस्पताल  के सामने एकत्रित भीड़ को मजबूत स्वर में संबोधित करते हुए बोली -''मैं उस पीडिता की माँ हूँ [ ये कहकर फोटो लिए हाथ को ऊपर उठा दिया ] ये मेरी बेटी अस्किनी का फोटो है जो भीतर जिंदगी व् मौत से जूझ रही है .हम इसी शहर के स्थानीय निवासी हैं और हमारा घर करोड़ी मौहल्ले में है .हमारा मकान नंबर २/४१ है .अस्किनी के पिता जी अध्यापक हैं और छोटा भाई पीयूष दसवी कक्षा का छात्र है .
.....आप सोच रहे होंगें कि मैं ये सब जानकारियां स्वयं आप को क्यों दे रही हूँ .मैं ये सब इसलिए बता रही हूँ कि मेरी बेटी ने कोई अपराध नहीं किया है जो उसका नाम व् पता छिपाया जाये .यदि वो जिंदा बच गयी तो हमारे परिवार में उसका वही लाड   होगा जो इस हादसे से पहले होता था .मुंह तो उन कुकर्मी कुत्तों का छिपाया जाना चाहिए जिन्होंने मेरी बेटी के साथ दुष्कर्म किया है .नाम व् पता वे छिपाते फिरे और उनके परिवार वाले .मेरी बेटी के साथ यदि यह समाज इस हादसे के बाद कोई गलत व्यवहार करता है तो निश्चित रूप से उन दुराचारी कुत्तों के साथ इस समाज को भी खुलेआम फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए .'' ये कहकर वे मुड़ी और तेज़ क़दमों से अस्पताल के भीतर पुन:  चली गयी

                     शिखा कौशिक ''नूतन''

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

ऐसा धोखा मत देना -लघु कथा

[दैनिक जनवाणी में 16-12-2012 को प्रकाशित ]


ऐसा धोखा मत देना -लघु कथा

'अम्मी ...मैं  ज़रा शबाना के घर होकर आ रही हूँ .''ये कहकर जूही ने अपनी जीभ हल्की सी काट  ली क्योंकि वो जानती थी कि  वो झूठ  बोल रही है .वो आज किसी और ही नशे में  झूम रही थी .शाहिद से उसका मेलजोल यूँ तो दो साल से था पर ...इश्क का  सिलसिला कैसे और कब शुरू हुआ जूही खुद भी न समझ  पाई थी .अब तो एक लम्हां  भी शाहिद से दूर रहना जूही को बर्दाश्त नहीं था .कल जब शाहिद का मैसेज उसे  अपने मोबाइल पर मिला तो वो ख़ुशी से झूम उठी .मैसेज में लिखा था -''जूही मैं  कल जुम्मे  के पाक दिन  तुम्हे प्रपोज़ करना चाहता हूँ .'' बस तब से जूही  शाहिद  से मिलने के लिए बेक़रार हो उठी थी .कब व् कहाँ मिलना है ? ये आज  सुबह मिले शाहिद के मैसेज से जूही जान चुकी थी .जूही ने पसंदीदा गुलाबी रंग  का सलवार -कुर्ता पहना और दुपट्टा सिर पर सलीके से ओढ़कर आईने में खुद का  दीदार कर खुद पर ही रीझ गयी .उसके गोरे  गालो पर गुलाबी दुपट्टे की धमक ने  उसे और भी खूबसूरत बना दिया था .जूही ठीक वक़्त पर शाहिद  की बताई जगह पर  पहुँच गयी .ये किसी इंटर कॉलेज की निर्माणाधीन बिल्डिंग थी .ऐसी सुनसान जगह  पर आकर जूही का दिल जोर जोर से डर के मारे धड़कने लगा ... पर सामने से  शाहिद को आते देख उसके दिल को सुकून आ गया .शाहिद ने जूही के करीब आते ही  उसे ऊपर से नीचे तक ऐसी वहशी नज़रों से निहारा कि जूही कि रूह तक कांप गयी  और उसके पूरे बदन में दहशत की लहर दौड़ गयी .जूही के दिल ने कहा -''ये तो  मेरा वो शाहिद नहीं जो जिस्मों से दूर रूहों के मिलन की बात करता  था .''  ...पर ....अब देर हो चुकी थी .जूही वहां से घर लौटने के लिए ज्यों ही पीछे  हटी उसके कन्धों को दो फौलादी हाथों ने जकड लिया .अगले ही पल उसके मुंह को  दबोचते हुए वो फौलादी शख्स जूही को अपने कंधे पर उठाकर एक कमरे  की ओर बढ़  लिया .पीछे से आते शाहिद ने उस शख्स   के कमरे में घुसते ही खुद भी अन्दर  आकर कमरे की चटकनी बंद कर दी .जूही को लगभग ज़मीन पर पटकते हुए उस  शख्स ने  जोर से  ठहाका लगाया .जूही ने आँखे उठाकर देखा 'ये आफ़ताब था ' शाहिद का  जिगरी दोस्त .जूही ने उन दोनों से दूर खिसकते हुए खड़े होकर ज्यों ही किवाड़  की ओर कदम बढ़ाये शाहिद झुंझलाते  हुए बोला  -''जूही इस  दिन के इंतजार में  मैं कब से था ...अब नखरे   मत  दिखा  यार ...'  शाहिद की इस घटिया बात पर  जूही का खून उबल पड़ा और उसका  दिल धधक उठा .अगले ही पल उसने दुपट्टा एक ओर  फेंकते   हुए अपने कुरते का गला पकड़ कर जोर से खीच   डाला . कपडे की रगड़ से  उसकी सारी  गर्दन की खाल  छिल गयी और उस पर  खून छलक आया .दर्द के कारण   जूही  तड़प उठी .अर्धनग्न खुले वक्षस्थल के साथ खड़ी  जूही जोर से  चीखती हुई  बोली -''नोंच लो ....दोनों मिलकर नोंच लो ...मेरे इस पाक बदन को नापाक कर  दो !!...पर आगे से किसी लड़की के साथ ऐसा धोखा मत करना .अल्लाह !तुम्हे कभी  माफ़ नहीं करेगा ...अल्लाह !  करे तुम्हारे घर कभी कोंई बेटी-बहन पैदा न हो  ...'' जूही ये कहते कहते ज़मीन पर घुटने   टेककर सिर झुकाकर बैठ गयी .दो कदम  उसकी ओर बढे और उसके सिर पर दुपट्टा डालकर कमरे की चटकनी खोल बाहर की ओर  बढ़ गए .जूही ने दुपट्टे से अपना जिस्म ढकते हुए सिर उठाकर कमरे में चारो ओर  नज़र दौड़ाई .शाहिद दीवार की ओर मुंह करे खड़ा था .बाहर की ओर गए कदम आफ़ताब  के थे .जूही की ओर पीठ किये हुए ही शाहिद बोला -''जूही ...मैं गुनाहगार हूँ  ...मुझे माफ़ कर दो ...मैं तुमसे निकाह करना चाहता हूँ !'जूही कांपते हुए  स्वर में बोली -''नहीं ... शाहिद ..अब मैं तुमसे निकाह नहीं कर सकती क्योंकि  अब मैं तुम्हे वो इज्ज़त ... कभी नहीं दे सकती जो एक शरीक-ए-हयात कोअपने  शौहर  को देनी  चाहिए  .खुदाहाफिज़ !!'' ये कहकर जूही तेज़ क़दमों से वहां से  चल दी .
  शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

''ऐसी बात है तो मना कर दो !'' -लघु कथा

 


माननीय राज्यपाल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उपस्थित छात्र-छात्राओं को ''बिना दहेज़ -विवाह ''करने की शपथ दिला रहे थे .उनके कोट की अगली जेब में रखा उनका मोबाइल तभी बज उठा .शपथ -ग्रहण पूरा हुआ तो उन्होंने मोबाइल निकालकर देखा .कॉल घर से उनकी धर्मपत्नी जी की थी .उन्होंने खुद घर का नंबर मिलाया और धीरे से पूछा -''क्या कोई जरूरी बात थी ?''धर्मपत्नी जी बोली -'' हाँ ! वे गुप्ता जी आये थे अपनी पोती का रिश्ता लेकर  हमारे राकेश के बेटे सूरज के लिए .कह रहे थे पांच करोड़ खर्च करने को तैयार हैं .मैंने कहा इतने का तो उसे साल भर का पैकेज   ही मिल जाता है .अब बताओ क्या करूँ ?''राज्यपाल जी ने कहा -''ऐसी बात है तो मना कर दो !'' सामने सभागार में बैठे छात्र-छात्रागण    माननीय द्वारा दिलाई गयी शपथ के बाद करतल ध्वनि   द्वारा उनको सम्मान प्रदान कर रहे थे .
                                   शिखा कौशिक 'नूतन '
                                

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

''प्रेम ...जाल !!''-लघु कथा


 Teen girl posing with arms crossed, wearing white t-shirt, looking at camera. Isolated on white background. stock photography
''पापा ...वैभव  बहुत अच्छा है ...मैं उससे ही शादी करूंगी ....वरना !! ' अग्रवाल साहब नेहा के ये शब्द सुनकर एक घडी को तो सन्न रह गए .फिर  सामान्य  होते  हुए  बोले  -' ठीक है पर पहले मैं तुम्हारे साथ मिलकर उसकी परीक्षा लेना चाहता हूँ तभी होगा तुम्हारा विवाह वैभव से ...कहो मंज़ूर है ?'नेहा चहकते हुए बोली -''हाँ   मंज़ूर है मुझे ..वैभव से अच्छा जीवन साथी कोई हो ही नहीं सकता .वो हर परीक्षा में सफल होगा ....आप नहीं जानते पापा वैभव को !'  अगले दिन कॉलेज में नेहा जब वैभव से मिली तो उसका मुंह लटका हुआ था .वैभव मुस्कुराते हुए बोला -'क्या बात है स्वीट हार्ट ...इतना उदास क्यों हो ....तुम मुस्कुरा दो वरना मैं अपनी जान दे दूंगा .''  नेहा झुंझलाते हुए बोली -'वैभव मजाक छोडो ....पापा ने हमारे विवाह के लिए इंकार कर दिया है ...अब क्या होगा ? वैभव हवा में बात उडाता हुआ बोला -''होगा क्या ...हम घर से भाग जायेंगे और कोर्ट मैरिज कर वापस आ जायेंगें .'' नेहा उसे बीच में टोकते हुए बोली -''...पर इस सबके लिए तो पैसों की जरूरत होगी .क्या तुम मैनेज  कर लोगे ?'' ''......ओह बस यही दिक्कत है ...मैं तुम्हारे लिए  जान दे सकता हूँ पर इस वक्त मेरे पास पैसे नहीं ...हो सकता है घर से भागने के बाद हमें कही होटल में छिपकर रहना पड़े तुम ऐसा करो .तुम्हारे पास और तुम्हारे घर में जो कुछ भी चाँदी -सोना-नकदी तुम्हारे हाथ लगे तुम ले आना ...वैसे मैं भी कोशिश करूंगा   ...कल को तुम घर से कहकर आना कि तुम कॉलेज जा  रही हो और यहाँ से हम फर हो जायेंगे ...सपनों को सच करने के लिए !'' नेहा भोली बनते हुए बोली -''पर इससे तो मेरी व् मेरे परिवार कि बहुत बदनामी होगी '' वैभव लापरवाही के साथ बोला -''बदनामी .....वो तो होती रहती है ...तुम इसकी परवाह ..'' वैभव इससे आगे  कुछ कहता उससे पूर्व ही नेहा ने उसके गाल पर जोरदार तमाचा रसीद कर दिया .नेहा भड़कते हुयी बोली -''हर बात पर जान देने को तैयार बदतमीज़ तुझे ये तक परवाह नहीं जिससे तू प्यार करता है उसकी और उसके परिवार की  समाज में बदनामी  हो ....प्रेम का दावा करता है ....बदतमीज़ ये जान ले कि मैं वो अंधी प्रेमिका नहीं जो पिता की इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ा कर ऐय्याशी   करती फिरूं .कौन से सपने सच हो जायेंगे ....जब मेरे भाग जाने पर मेरे पिता जहर खाकर प्राण दे देंगें !मैं अपने पिता की इज्ज़त नीलाम कर तेरे साथ भाग जाऊँगी तो समाज में और ससुराल में मेरी बड़ी इज्ज़त होगी ...वे अपने सिर माथे पर बैठायेंगें  ....और सपनों की दुनिया इस समाज से कहीं इतर होगी ...हमें रहना तो इसी समाज में हैं ...घर  से भागकर क्या आसमान में रहेंगें ?है कोई जवाब तेरे पास ?....पीछे से ताली की आवाज सुनकर वैभव ने मुड़कर देखा तो पहचान न पाया .नेहा दौड़कर  उनके पास  चली  गयी  और आंसू  पोछते  हुए बोली  -'पापा आप  ठीक  कह  रहे  थे  ये प्रेम  नहीं  केवल  जाल  है जिसमे फंसकर मुझ जैसी हजारों लडकिय अपना जीवन बर्बाद कर डालती हैं  !!''
                                 शिखा कौशिक 'नूतन '

बुधवार, 28 नवंबर 2012

क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती !-एक लघु कथा

क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती !-एक लघु कथा 
 


 '...जिज्जी बाहर निकाल उस मुसलमानी को .!!!'  रमा के घर के बाहर खड़ी भीड़ में से आवाज़ आई .आवाज़ में ऐसा वहशीपन था कि दिल दहल जाये .रमा  ने साडी का पल्ला सिर पर ढका और घर के किवाड़ खोलकर दरवाजे के बीचोबीच खड़ी हो गयी .नज़ारा बहुत खौफनाक था .भीड़ में बबलू का सिर फटा  हुआ था और राजू की कमीज़ फटी हुई थी .खून से सने कपड़ों में खड़ा सोनू ही चीख चीख कर रमा से कह रहा था ''....हरामजादों ने मेरी बहन की अस्मत रौंद डाली ...मैं भी नहीं छोडूंगा इसको ....!!!''रमा  का  चेहरा सख्त हो गया .वो फौलाद से कड़क स्वर में बोली - ''मैं उस लड़की को तुम्हारे  हवाले नहीं करूंगी !!! उसकी अस्मत से खेलकर तुम्हारी बहन की इज्ज़त वापस नहीं आ जाएगी .किसी और की अस्मत लूटकर तुम्हारी बहन की अस्मत वापस मिल सकती है तो ...आओ ..लो मैं खड़ी हूँ ...बढ़ो और .....'' ''जिज्जी !!!!!'' सोनू चीख पड़ा और आकर रमा के पैरों में गिर पड़ा .सारी भीड़ तितर-बितर हो गयी .सोनू को कुछ लोग उठाकर अस्पताल ले गए .रमा पलट कर घर में ज्यों ही घुसी घर में किवाड़ की ओट में छिपी फाटे कपड़ों से बदन छिपती युवती उसके पैरों में गिर पड़ी .फफक फफक कर रोती हुई वो बोली -'' आप न होती तो मेरे जिस्म को ये सारी भीड़ नोंच डालती .मैं कहीं का न रहती !'.रमा ने प्यार से उसे उठाते हुए अपनी छाती से लगा लिया .और कोमल बोली में धैर्य   बंधाते हुए बोली -लाडो डर मत !! धार्मिक उन्मादों में कितनी ही  बहन बेटियों की अस्मत मुझ जैसी औरतों ने बचाई है क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती !!

                                   शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 24 नवंबर 2012

परिवार की इज्ज़त -लघु कथा .

 परिवार की इज्ज़त -लघु कथा  .


'स्नेहा....स्नेहा ....' भैय्या  की कड़क आवाज़ सुन स्नेहा रसोई से सीधे उनके कमरे में पहुंची .स्नेहा से चार साल बड़े आदित्य  की आँखें  छत  पर घूमते पंखें पर थी और हाथ में एक चिट्ठी थी .स्नेहा के वहां पहुँचते ही आदित्य ने घूरते हुए कहा -''ये क्या है ?' स्नेहा समझ गयी मयंक की चिट्ठी भैय्या के हाथ लग गयी है .स्नेहा ज़मीन की ओर देखते हुए बोली -'भैय्या मयंक बहुत अच्छा ....'' वाक्य पूरा कर भी न पायी थी  कि   आदित्य ने  जोरदार तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया और स्नेहा चीख पड़ी '' भैय्या ..''.आदित्य  ने उसकी चोटी पकड़ते हुए कहा -''याद रख स्नेहा जो भाई तेरी इज्ज़त बचाने के लिए किसी और की जान ले सकता है वो ....परिवार की इज्ज़त बनाये रखने के लिए तेरी भी जान ले सकता है .'' ये कहकर आदित्य ने झटके से स्नेहा की चोटी छोड़ दी और  वहां से निकल कर घर से बाहर चला गया ..आदित्य के जाते ही दीवार पर टंगी माता-पिता की तस्वीरें देखती हुई स्नेहा वही बैठ गयी . मन ही मन सोचने लगी -''आज अगर वे जिंदा होते तो शायद मैं कुछ कर पाती ...पर भैय्या ......लेकिन अगर भैय्या  को पसंद नहीं तो मैं ...अब मयंक से नहीं मिलूंगी .''दिन का गया आदित्य जब रात के बारह बजे तक भी न लौटा तो स्नेहा का दिल घबराने लगा .राह देखते देखते उसकी आँख लग गयी .माथे  पर कुछ सटा होने के अहसास से उसकी आँख खुली तो आदित्य को सिरहाने खड़ा पाया उसके हाथ के रिवॉल्वर को अपने माथे पर लगा पाया .स्नेहा कुछ बोलती इससे पहले ही आदित्य रिवॉल्वर का ट्रिगर दबा चूका था और आदित्य के कानों में गूँज रहे थे गली के कोने में खड़े लफंगों के शब्द .....''ये देखो खुद की रोज़ी-रोटी चलाने को बहन को धंधे पर लगा दिया ...अजी कौन जाने किस किस से चक्कर है ....हम ही क्या बुरे हैं...... कुछ भेंट तो हम भी चढ़ा  देते ...और ...और जोरदार ठहाके !!!
                                                                                    शिखा कौशिक 'नूतन '
                              

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो-लघु कथा

इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो-लघु कथा 

Indian_village : Smiling indian girl joining hands; as a  welcoming gesture Stock PhotoBeautiful_indian_girl_face : Asian Young smiling woman calling by phone. Over white background

सुखबीर ....सुखबीर 'सख्त लहजे में लखनपाल आवाज़ लगता हुआ सुखबीर की दहलीज़ में घुसा .सुखबीर आँगन में खाट पर बैठा हुआ चाय पी रहा था .लखनपाल की आवाज़ सुनते ही सुखबीर ज्यों ही उठा लखनपाल वहीँ आ पहुंचा और कड़े स्वर में बोला -'सुख्बीरे   कित्ती बेर टोका था तुझे ...लौंडिया को दाब के रख ...जवान छोरी .जींस पहरेगी ..फून रखेगी ...और तो और मोटर साईकिल पे फिरेगी ..लौंडा बन के .टेम देखा है तूने ?साँझ होने आ गयी ..इब तक न आई ..मेरा बबलू भी फंस गया उसके साथ ...अच्छा सोच्चा मैंने साथ साथ आ जाया करेंगें सकूल से ..पांच किलोमीटर का रास्ता .मेरे लौंडे के साथ रहने से तेरी लौंडिया की हिफाज़त भी हो जावेगी .तू इतने इत्मीनान से क्योकर बैठा ?कोई फून आया था के ?भाग न गयी हो किसी की गैल ?तावली कर तावली...''लखनपाल की बात पर सुखबीर ठहाका  लगाकर हंस पड़ा और उसे झिड़कते हुए बोला -''बक बक पूरी होगी तेरी या ओर भी बकेगा ?मेरी लौंडिया ना भागी किसी की गैल .. तेरे लौंडे के कारण हो गया वहां सकूल में बबाल .उसने किसी नेता की लौडियां छेड़ दी ..फून से फोटू खीन्छ लिया .मेरी लौंडिया ने संभाला सारा मामला .उस लड़की को समझाया तब मानी वो ...अरनी पड़ गए थे लेने के देने .सब फून पे बताया मेरी लौंडिया ने .इब आने ही वाले . लखनपाल इब लौंडिया नी लौंडों को संभालो .सवरे बोत  बिगड़ गए .''लखनपाल ये सुनकर ''आन दे आज  हरामजादे कू... फून ना फोड़ दिया उसका तो मेरा नाम लखनपाल नी !!'' कहता हुआ खिसियाकर वहां से खिसक लिया .
                                                         शिखा कौशिक ''नूतन''

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

पाप-पुण्य की कसौटी -एक लघु कथा


 पाप-पुण्य की कसौटी -एक लघु कथा 

    Saint : Saint Elijah Stock Photo
प्रभात के घर  आज  गुरुदेव आने  वाले  थे  .गुरुदेव का सम्मान  प्रभात का पूरा  परिवार  करता है .गुरुदेव ने ज्यों ही उनके  मुख्य द्वार पर अपने चरण कमल रखे तभी वहीँ पास में बैठा प्रभात का पालतू कुत्ता बुलेट उन पर जोर जोर से भौकने लगा .गुरुदेव के उज्जवल मस्तक पर क्षण भर को कुछ लकीरें उभरी और फिर होंठों पर मुस्कान .गुरुदेव ने स्नेह से बुलेट के सिर पर हाथ फेरते  हुए कहा- ''शांत हो जाओ मैं समझ गया हूँ .ईश्वर तुम्हे मुक्ति प्रदान करें !''  गुरुदेव के इतना कहते ही बुलेट शांत हो गया और अपने स्थान पर जाकर बैठ गया .वहां उपस्थित प्रभात सहित उसके परिवारीजन यह देखकर चकित रह गए क्योंकि बुलेट को शांत करना वे सभी जानते थे कि बहुत मुश्किल होता है .थोड़ी देर बाद जब गुरुदेव ने अपना निर्धारित आसन ग्रहण कर लिया तब गंभीर व् अमृततुल्य वाणी में वे कोमल स्वर में बोले -  ''आप सभी चकित हैं कि आपका प्रिय जीव मुझसे क्या कह रहा था ? प्रभात ये जो श्वान योनि में है पिछले जन्म में ये एक सर्राफ था और तुम इससे उधार लेने वाले गरीब किसान .जब तुम उधार लौटाने  इसकी गद्दी पर गर्मी में जाते  ये तुम्हे बाहर धूप में इंतजार करवाता और खुद शीतल कमरे में बैठता .इसीलिए आज ये तुम्हारे द्वार पर सर्दी-गर्मी के थपेड़े खाता है ....पर तुम दयालु हो ....इसका ध्यान रखते हो ...खाने को देते हो ...सर्दी गर्मी में इसे लू-ठंड के थपेड़ों से बचाने का प्रयास करते हो क्योंकि कहीं  न कहीं तुम्हारे सूक्ष्म शरीर में पिछले जन्म में इससे लिए गए उधार का बोझ बना हुआ है .आज मेरे  यहाँ प्रवेश करते ही ये जीव मुझसे कहने लगा -मुझे इस नारकीय जीवन से मुक्ति दिलवाइए !मैंने स्नेह से इसके मस्तक पर हाथ फेरा तो निज पाप कर्मों की अग्नि से तपती इसकी आत्मा को ठंडक पड़ी . और यह शांत भाव से बैठ गया .हम सभी के लिए यह एक उदाहरण है कि हमें अपना हर कर्म पाप-पुण्य की कसौटी पर कसकर ही करना चाहिए अन्यथा विधाता आपको दण्डित अवश्य करेंगें ! जय भोलेनाथ की !!'' गुरुदेव के यह कहते ही सब उनके चरणों में नतमस्तक हो गए .
                                                                                        शिखा कौशिक 'नूतन'

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

रचनाकार: कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -106- शिखा कौशिक की कहानी : पापा मैं फिर आ गया


'' पापा मैं फिर आ गया '-कहानी (शिखा कौशिक )

[कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -106- शिखा कौशिक की कहानी]

आगे पढ़ें: रचनाकार: कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -106- शिखा कौशिक की कहानी : पापा मैं फिर आ गया http://www.rachanakar.org/2012/10/106.html#ixzz28FkoRO7g]

मीनाक्षी और मुकेश की आँखों से कोर्ट  का फैसला  सुनते  ही आंसुओं का सैलाब बह निकला .पिछले दो साल से अपने प्रियांशु के हत्यारों को सजा दिलाने के लिए दोनों ने दिन रात एक कर दिए थे .आज जाकर दिल को ठंडक पहुंची तो आँखों से आंसू बह निकले .मीनाक्षी को धैर्य बंधाते हुए मुकेश बोला -''मैं न कहता था  मीना इस हत्यारे को फांसी की सजा जरूर मिलेगी !''मीनाक्षी ने मुकेश की ओर देखते हुए ''हाँ '' में गर्दन हिला दी .मुकेश का दिल चाह रहा था उस बत्तीस साल के नाटे व्यक्ति को जाकर पुलिस से छुड़ा इतना मारे कि वह खून से लथपथ हो जाये किन्तु मन ही मन उसने इस आक्रोश को दबाया और मीनाक्षी ,बाबू जी व् माँ के साथ कोर्ट से निकल अपनी कार की ओर कदम बढ़ा दिए .कार का गेट खोलकर मुकेश खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया .मीनाक्षी व् माँ पिछली सीट पर व् बाबू जी मुकेश के बराबर वाली सीट पर बैठ गए .सब के बैठ  जाने पर मुकेश ने कार स्टार्ट की और दाई ओर मोड़कर मेन  रोड पर कार को दौड़ा दिया .मुकेश की आँखों के सामने प्रियांशु का मुस्कुराता हुआ चेहरा  घूमने लगा ओर कानों में उसकी खिलखिलाहट गूंजने लगी .मुकेश ने एकाएक कार के ब्रेक लगाये क्योंकि कार एक घोड़ागाड़ी से टकराते टकराते बची . बाबू जी बोले -''मुकेश लाओ मैं ड्राइव करता हूँ ..लगता है तुम ड्राइविंग एकाग्रचित्त होकर नहीं कार  पा रहे हो .' मुकेश ने तुरंत ड्राइविंग सीट छोड़ दी .बाबू जी ड्राइविंग सीट पर आ गए ओर मुकेश उनके बराबर में बैठ गया .माँ बोली -' मुकेश पुरानी बातों को भुलाने की कोशिश करो .तुम ऐसे अनमने रहोगे तो मेरी बहू को कौन संभालेगा ...जानते हो ना ये फिर से माँ बनने वाली है .ऐसे में इसका ध्यान रखा करो .मैं ओर तुम्हारे बाबू जी मीना को खुश देखना चाहते हैं .भगवान ने चाहा तो फिर से हमारे घर में बच्चे की किलकारी गूंजेगी !'माँ की बातों ने मनोज व् मीनाक्षी के दुखी  ह्रदय को बहुत सांत्वना दी . घर पहुंचकर माँ व् मीनाक्षी रसोईघर में चली गयी और मुकेश व् बाबू जी लॉन में पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए .बाबू जी बोले -' मुकेश बेटा कहते हैं ना भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है .प्रियांशु के हत्यारे को मौत की सजा मिलना इसका प्रमाण है .चार साल के मासूम बच्चे को इतनी निर्ममता से मारने वाले के लिए  यदि फांसी से ज्यादा भी कोई सजा होती तो वह दी जानी चाहिए थी .''मुकेश की आँखे नम हो उठी .बाबू जी ने उसके कंधे पर हाथ कसते हुए कहा '....लेकिन मुकेश मीना के सामने इन बातों को मत दोहराओ ...जरा सोचो उसकी ममता कितनी आहत हुई है और इस समय वह प्रेग्नेंट भी है .अपने पर संयम रखो ..'मुकेश ने सहमति में सिर हिला दिया .बाबू जी फ्रेश होने के लिए अन्दर चले गए तो मुकेश की आँखों के सामने उस मनहूस दिन की एक एक तस्वीर घूमने लगी .वो उस दिन अपने ऑफिस में लंच कर रहा था कि उसका मोबाइल बज उठा .कॉल रिसीव करते ही मीनाक्षी की घबराई हुई आवाज़ उसके कानों से टकराई .भोजन बीच में ही छोड़कर वह अपनी जगह पर खड़ा हो गया .उसके सहकर्मी शिरीष ,संगीता व् उत्तम भी भोजन छोड़कर उसकी ओर देखने लगे .मीनाक्षी घबराई हुई कह रही थी ''.....हेलो ...हेलो ...'' मुकेश ने खुद को सँभालते हुए मीनाक्षी से पूछा था -'...मीना ...मीना क्या बात है ?? इतनी घबराई हुई क्यों हो ?'' मीनाक्षी ने लगभग रोते हुए कहा था '...दीपक का फोन आया था उसने प्रियांशु का अपहरण कर लिया है और शाम तक पचास  लाख रूपये की डिमांड की है ...नहीं तो वो हमारे प्रियांशु को  .....!!!'इसके आगे मीनाक्षी बोल तक नहीं पायी थी ..उसका गला रूंध गया था .मुकेश ने मीनाक्षी को धैर्य बंधाते बस इतना कहा था -''....मीना चिंता मत करो ...मैं घर आ रहा हूँ .''यह कहकर फोन बंद कर मुकेश कुर्सी पर निढाल होकर बैठ गया था.  दोनों हाथों से सिर पकडे मुकेश की आँखों में आंसू  छलक आये थे .फोन पर उसकी बातों से सहज ही किसी अनिष्ट का अनुमान लगा संगीता बोली थी -'मुकेश क्या हुआ ?अनिथिंग सीरियस ?शिरीष व् उत्तम भी उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले थे -''मुकेश क्या बात है ?'' मुकेश ने रूंधे गले से किसी प्रकार बोलते हुए कहा था ''....मेरे नौकर ने मेरे बेटे का अपहरण कर लिया है और पचास  लाख रूपये देने पर छोड़ने की बात कही है पर मैं इतने पैसों का इंतजाम इतनी जल्दी कहाँ से करूंगा ..कैसे करूंगा ??''शिरीष बोला -''तुम पुलिस की मदद लो .ऐसा करो तुम घर जाओ और मैं व् उत्तम पुलिस से बात करते हैं ...चिंता मत करो ...सब ठीक हो जायेगा ..''मुकेश कार से घर के लिए रवाना हो गया .संगीता भी उसके साथ हो ली .लगभग सवा दो बजे दोपहर में वे घर पहुंचे .मीनाक्षी का रो-रोकर बुरा हाल था .मुकेश को देखते ही उसकी रही -सही शक्ति भी जवाब दे गयी . वो  मुकेश का हाथ पकड़ते हुए बोली  'मेरे प्रियांशु को बचा लो  ..वो  बहुत  खतरनाक है ..उसने फोन पर प्रियांशु के रोने की आवाज़ भी सुनाई है ..'  प्रियांशु का नाम आते ही मुकेश भी फिर से भावुक हो गया .संगीता ने दोनों को हिम्मत बंधाई .करीब पांच बजे फोन की घंटी फिर से बजते ही मीनाक्षी ; मुकेश और संगीता के दिलो की धड़कन बढ़ गयी .मुकेश ने घर के लैंड लाइन का रिसीवर कान से लगाया तो प्रियांशु की प्यारी सी आवाज़ कान से टकराई -''पापा..मम्मी ...मुझे बचा लो ..ये अंकल मुझे  मारते   हैं ...मुझे बचा लो ...' प्रियांशु रो रोकर बेहाल  हो रहा था .मुकेश ने रिसीवर कस कर पकड़ा ...तभी दूसरी ओर से एक कठोर स्वर कान से टकराया '...सुनते  हो मुकेश बाबू ..आज शाम छह बजकर पंद्रह मिनट पर शहर के बाहर सुखदेव सिंह के ईख के खेत में पचास लाख लेकर पहुँच जाना वरना .......' कहकर क्रूरतायुक्त ठहाका लगाया जिसे सुनकर मुकेश का रोम रोम सिहर उठा और नसों में ठंडी लहर दौड़ गयी .एक पल को लगा जैसे ह्रदय ने काम करना बंद कर दिया हो और मस्तिष्क  चेतनारहित सा अनुभव हुआ .संगीता ने पसीने से लथपथ मुकेश से रिसीवर अपने हाथ में लेकर कान से लगाया तो दूसरी ओर से कोई प्रतिक्रिया  न आती जानकर उसने फोन रख दिया .तभी संगीता के मोबाइल की रिंगटोन बज उठी .संगीता ने रिसीव किया तो वह शिरीष व् उत्तम का फोन था .उन्होंने संगीता को कुछ जानकारी दी व् उससे यहाँ की कुछ जानकारी लेनी चाही .संगीता ने मुकेश को अपना मोबाइल पकड़ा दिया क्योंकि वह स्वयं अब तक किडनैपर के फोन के बारे में मुकेश से बातचीत नहीं कर पाई थी .मीनाक्षी की आँखों से आंसुओं की अविरल  धारा  बहे जा रही थी .मुकेश ने उत्तम और शिरीष को  सब जानकारी दे दी और जेब से रुमाल निकाल कर चेहरे पर आये पसीने को पोंछा .संगीता को उसका मोबाइल पकड़ाते हुए उसके हाथ कांपते देख संगीता समझाते हुए बोली -'मुकेश डरो मत सब ठीक हो जायेगा .तुमने उत्तम और शिरीष को किडनैपर की एक एक बात अच्छी तरह बता दी है ना ....वो पुलिस के साथ प्लानिंग पर प्रियांशु को जरूर उसके चंगुल से छुड़ा लेंगें . अब देखो साढ़े पांच बज रहे हैं ...तुम्हे वहां पहुँचने में कम से कम पच्चीस मिनट लगेंगे .   तुम स्वयं को नियंत्रित करो .क्या उत्तम व् शिरीष तुम्हें  फिर से कौनटैक्ट   करेंगें ?'  मुकेश ने हडबडाते हुए  कहा -''...नहीं ..उन्होंने  कहा है मैं  अकेला  ही एक ब्रीफकेस के लेकर  वहां पहुँच जाऊं  ...आगे  पुलिस  के साथ  मिलकर  वे  दोनों  संभाल  लेंगें .'' इस वार्तालाप  के ठीक पांच मिनट बाद मुकेश एक कपड़ों  से भरा  ब्रीफकेस लेकर अपनी कार द्वारा गंतव्य की ओर रवाना  हो गया .मीनाक्षी भी साथ चलने की जिद कर रही थी पर संगीता  ने किसी प्रकार उसे समझा-बुझाकर रोक लिया .मुकेश ठीक छः बजे सुखदेव सिंह के खेत पर पहुँच गया .उसे पांच मिनट बाद सामने  की ओर से ईख हिलते नज़र आये और पीछे से भी कुछ कदमों की आहट सुनाई दी ..वह सावधान हो गया .उसने ब्रीफकेस को कस  कर पकड़ लिया .सामने से आते व्यक्ति को नकाब से मुंह छिपाए हुए देखकर भी मुकेश उसकी  चाल ढाल से उसे पहचान गया ...वह दीपक था .पीछे मुड़कर देखा तो दो और व्यक्ति नकाब से मुंह  छिपाए हुए रिवॉल्वर लिए उसके ठीक पीछे  खड़े थे   .उनमे  से एक ने रिवॉल्वर मुकेश  की  कांपती  से सटा  दिया  . दीपक  चलते  हुए  मुकेश  के  एकदम पास   पहुंचकर  बोला -''बाबू  ब्रीफकेस  मेरे  हवाले  कर  दो .''  मुकेश ने  दृढ़ता  के  साथ  कहा -''बिलकुल  नहीं !!पहले  मेरे  बेटे  को  मेरे  हवाले  करो   !''.....मुकेश के ये  कहते ही पीछे खड़े एक व्यक्ति ने उसके सिर पर जोरदार वार किया और मुकेश लगभग निढाल होकर गिर पड़ा .जब आँख खुली तब वह अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के बैद  पर था .उसको होश  में आया  देख  नर्स ने तुरंत डॉक्टर को सूचना  दी .डॉक्टर के आते ही मुकेश के माँ -बाबूजी भी  उसके साथ उस वार्ड में अन्दर  आये .दोनों काफी थके हुए नज़र आ रहे थे .मुकेश ने उठना चाहा तो सिर में असहनीय दर्द से उसकी चीख निकल गयी .डॉक्टर ने एक इंजेक्शन लगाया और वह फिर से नींद की गहराइयों में चला गया . करीब एक माह में वह अस्पताल से घर पहुँच पाया .इस बीच जब भी वह मीनाक्षी और प्रियांशु के बारे में बाबूजी और माँ से पूछता तो वे कह देते कि-'' प्रियांशु के बुखार है और मीनाक्षी उसकी देखभाल में लगी रहती है ...फिर हम  दोनों तो हैं  तेरी  देखभाल को यहाँ .हमने   ही मीनाक्षी को प्रियांशु की देखभाल सही से करने  की हिदायत दे रखी  है इसीलिए उसे यहाँ नहीं आने देते और फिर तुम्हारी ऐसी हालत देखकर मीनाक्षी की हालत ख़राब हो सकती है .इसी कारण वो यहाँ नहीं आ पाती  .''माँ बाबूजी की बात पर मुकेश को कतई यकीन नहीं हुआ था पर और कोई रास्ता भी नहीं था .सबसे  ज्यादा आश्चर्य तो उसे शिरीष ,उत्तम और संगीता -किसी के भी अस्पताल में उससे न मिलने आने पर हुआ था .उसे अन्दर से ऐसा महसूस हो रहा था जैसे माँ-बाबू जी एक माह से उससे कुछ ऐसा छिपाना चाह रहे हैं जिसे छिपाना उनके भी बस की बात नहीं है .मुकेश तो पिछले दस दिन से अच्छा महसूस कर रहा था पर माँ बाबूजी ही डॉक्टर से बार  बार  उसके स्वस्थ  होने  के बारे में पूछकर  ''...घर जाने की क्या जल्दी है ?''कहकर उसे अस्पताल में ही रोके  हुए थे .आज  जाकर किसी तरह अस्पताल से छुट्टी मिली तो वह घर चलने के लिए जल्दी से तैयार हो गया .उसने देखा माँ बाबूजी के चेहरे  पर कोई खास चमक नहीं थी बल्कि वे काफी उलझे  हुए नज़र आ रहे थे .कार में बैठते ही उसने देखा माँ की आँखों से आंसू बह रहे थे .उसने माँ से इसका कारण पूछा तो बाबू जी बोले -''बेटा पूरे एक माह जिस माँ का बेटा मौत से जूझकर सकुशल अपने घर वापस लौट  रहा हो वह भला अपने आंसुओं को रोके तो ?'' यह  कहते कहते बाबूजी की आवाज़ भी भर्राई  हुई सी  महसूस हुई .ऐसी आवाज़ मुकेश ने बाबूजी जी की तब सुनी थी जब मुकेश की दादी जी का स्वर्गवास  हुआ था वरना मुकेश के बाबूजी जो सेना में रहे थे अपनी भावनाओं को काबू में करना बखूबी जानते थे .कार बाबूजी जी ड्राइव कर रहे थे .मुकेश मीनाक्षी से भी ज्यादा प्रियांशु से मिलने को उत्सुक था .एक तो वह अपहरण  की दुर्घटना से सहमा हुआ होगा  और ऊपर  से माँ बाबूजी के अनुसार पिछले इतने दिनों से बुखार से ग्रस्त है .मुकेश ने माँ से पूछा -''अच्छा माँ प्रियांशु अब तो आप दोनों से काफी घुलमिल गया होगा ?''मुस्कुराता  हुआ बोला -''माँ !ये क्या ....अब तो  मैं ठीक  हो गया  हूँ  ना  .....फिर क्यों आंसू बहा रही हो ?'' माँ ने ''हाँ'' में गर्दन हिला दी  पर इस  बात पर भी माँ के चेहरे पर सुकून की रत्ती भर  भी झलक नहीं दिखाई दी  .घर के सामने पहुँचते ही बाबूजी ने कार के ब्रेक लगा दिए और जैसी की मुकेश को उम्मीद थी -मिनाक्षी घर के बहार लॉन में इंतजार करती   दिखाई देगी   ...वैसा  कुछ नहीं हुआ क्योंकि मिनाक्षी उसे नहीं दिखाई दी .   मुकेश ने कार से  निकलकर  घर का गेट खोल  दिया  और  बाबूजी कार को अन्दर ले आये .लॉन काफी उजड़ा उजड़ा लग रहा था .मुकेश के ह्रदय  में  भी  एक   अजीब  सी उदासी   घर करती  जा  रही  थी  .लॉन इतना  सूखा  हुआ  क्यों  हैं  ? मीनाक्षी तो  हर पौधे  का कितना  ध्यान  रखती  है .वह  ये  सब  सोच  ही  रहा था की  बाबूजी ने उसके  पास  आकर  कहा  -''मुकेश चलो  अन्दर चलो . ज्यादा सोच विचार  मत  करो तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए यह अच्छा नहीं है .''मुकेश बाबूजी ji  के यह कहते ही घर के भीतर की ओर चल दिया .ड्राइंग रूम  में प्रवेश करते ही सामने सोफे पर बैठी हुई मीनाक्षी एकाएक सिर पर साड़ी का पल्लू ढकते हुए खड़ी हो गयी .मुकेश एक नज़र में उसे पहचान भी न पाया और अनायास ही उसके होठों  से निकल  गया -''ये क्या हाल बना रखा है तुमने !प्रियांशु कहाँ है ?'' मुकेश के इस प्रश्न के उत्तर में मीनाक्षी का हाथ एकाएक दीवार की ओर उठा और वह फफक फफक कर रो  पड़ी .मुकेश की नज़र दीवार पर गयी तो वही टिक गयी .प्रियांशु का गुलाब सा मुस्कुराता हुआ चेहरा और उस फोटो पर फूलों की माला  !! वह ''नहीं ''कहकर लगभग चीखता हुआ दीवार के पास पहुँच गया .बाबूजी उसे संयमित कर सोफे तक लाये .वह निढाल होकर सोफे पर बैठ गया .उसके मस्तिष्क में हजारों सवाल दौड़ लगाने  लगे  .माँ बोली  -''मीना जरा  एक गिलास पानी ले आओ '' मीनाक्षी पानी ले आई .माँ ने मुकेश के पास बैठते हुए गिलास  पकड़ाते हुए कहा -''बेटा जो  दुर्घटना घटनी थी वह घट चुकी ...अब खुद  को संभालो .इस तरह तुम और मीना यहाँ दिल्ली में ऐसे दुखी रहोगे तो हम वहां कानपूर में कैसे चैन से रह पाएंगे ?बाबूजी बोले -''मुकेश तुम जो कुछ जानना चाहते  हो वो मैं  तुम्हे बताता हूँ .तुम्हे बेहोश कर वे तीनों बदमाश फिर से ईख के खेत में छिप गए लेकिन उस खेत को पुलिस ने उत्तम व् शिरीष की सूचनाओं द्वारा चारों ओर से घेर  लिया था .तुमको बेहोश पड़ा देखकर शिरीष व् उत्तम पुलिस की सहायता से तुम्हे तुम्हारी गाड़ी से लेकर  अस्पताल पहुँच  गए और उधर  ब्रीफकेस में कुछ ना पाकर तीनों बदमाश पुलिस के डर से ईख से बाहर निकल आये .पुलिस द्वारा प्रियांशु के बारे में पूछे जाने पर पता चला कि........उन्होंने उस नन्ही सी जान को पहले ही मार डाला था और फोन पर पैसा हड़पने के लिए जो प्रियांशु की आवाज़ वे सुना रहे थे वो रिकॉर्ड की हुई थी ..वे तो पैसा लेकर फरार  हो जाना चाहते थे .पुलिस की गहन पूछताछ  में पता चला कि-उन दरिंदों ने प्रियांशु कि डैड बॉडी शहर के बाहर एक बाग़ में दबा दी थी .उन हैवानों की दरिंदगी तो देखो  ....उन्होंने मरकर   भी उस नन्ही सी जान को सुकून न   लेने  दिया .प्रियांशु की शिनाख्त  छिपाने के लिए उसका चेहरा मरने के बाद तेजाब से झुलसा दिया ...'' ...''बाबूजी ...बस ...रहने दीजिये !!!...''मुकेश चीखता हुआ बोला और अपनी हथेलियों से अपना मुंह ढककर तड़पता हुआ रोने लगा .बाबूजी मुकेश के कंधे पर हाथ रखते   हुए उसके पास ही बैठ   गए .वे बोले -''बेटा तुम इस हालत में नहीं थे इसीलिए एक माह तक हमने तुमसे  ये बात छिपाई .मीनाक्षी तुम्हारे सामने इसीलिए नहीं आई क्योंकि वो तो खुद को ही नहीं संभाल पा रही थी .शिरीष ,उत्तम और संगीता अस्पताल लगभग रोज़ आते थे पर तुम्हारे सामने आने साहस न कर पाते कि कहीं उनके मुंह से ये बात न निकल जाये ...लेकिन हाँ  अब ध्यान से सुनों ...मैं और तुम्हारी माँ कल को कानपूर लौट जायेंगे ...तुम्हे और मीनाक्षी को मजबूत दिल का होकर प्रियांशु के हत्यारे को फांसी के तख्ते तक पहुँचाना है .'' बाबूजी की बातें कानों में गूँज रही थी कि मुकेश को लगा उसके कंधे कोई जोर  से हिला रहा है ...यह मीनाक्षी थी .मुकेश वर्तमान  में लौट आया  और प्रियांशु के हत्यारे  को फांसी की सजा दिलाने की याद आते ही एक लम्बी सुकून की सांस ली .
                             तीन माह पश्चात्  मीनाक्षी  ने घर के निकट के ही ''आशीर्वाद '' नर्सिंग होम में एक चाँद से बेटे  को जन्म दिया और जब नर्स गोद में लेकर उसे बाहर आई तो माँ बाबूजी के चेहरे  वैसे ही खिल गए जैसे प्रियांशु के जन्म के समय खिल उठे थे .और मुकेश ने उस नवजात शिशु को जैसे ही गोद में लिया वह अधखुली आँखों  से एकटक  उसे देखता  हुआ हल्का सा मुस्कुराया जैसे वो नन्हा  सा फ़रिश्ता कह रहा हो -''पापा लो मैं फिर आ गया '' मुकेश की आँखे ख़ुशी के आंसुओं  से छलछला उठी .


[घोषणा पत्र
प्रमाणित किया जाता है कि संलग्न कहानी मौलिक, पूर्णतः अप्रकाशित व अप्रसारित है, तथा इसे रचनाकार-ऑर्ग (http://rachanakar.org में कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में सम्मिलित करने हेतु प्रेषित किया जा रहा है. मुझे रचनाकार-ऑर्ग की तमाम शर्तें, उनके निर्णय समेत, मान्य होंगे.

shikha kaushik ]

रविवार, 30 सितंबर 2012

बोझ [एक लघु कथा ]




ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े रोहित का दिल जोर जोर से धड़क रहा था .जया के अचानक  ही डिलीवरी डेट से दो हफ्ते पहले लेबर पेन उठ  जाने के कारण रोहित आनन् फानन में उसे पास के एक नर्सिंग होम में ले आया  था .सघन चिकित्सा कक्ष से निकली एक नर्स ने आकर रोहित को तसल्ली देते हुए कहा -''.....आपकी वाइफ और बेबी ठीक है .मुबारक हो आपके घर लक्ष्मी आई है !'' बेटी हुई है सुनकर रोहित थोडा बुझ सा गया  .तभी काफी देर से वहीँ उपस्थित एक बुजुर्ग उसके पास आकर बोले -''क्या बेटी के होने से हताश हो ?'' रोहित ने झिझकते हुए कहा -''...नहीं ....नहीं तो '' बुजुर्ग बोले -'' बेटा ऐसा कभी मत करना वरना ये बोझ बनकर जिंदगी भर अपने दिल पर ढ़ोना होगा .मैं भी अपनी बेटी के होने पर ऐसे ही दुखी हो गया था .मेरी पत्नी से मेरा इसी झुंझलाहट में इतना झगडा हुआ कि वो कई महीनों को मायके चली गयी थी .घर वालों के समझाने पर मैं उसे वापस ले आया .समय बीतता गया और मेरी वही बिटिया आज इतनी काबिल है कि लोग पूछते हैं ..''आप डॉ नीरजा के पिता जी हैं !''...तब मेरा सिर गर्व से ऊँचा उठ जाता है पर....फिर अपनी बिटिया के जन्म पर अपने किये व्यवहार को सोचकर दिल पर एक बोझ सा महसूस करता हूँ .बेटा तुम ऐसा कभी मत होने देना .''रोहित ने उन बुजुर्ग के झुककर चरण स्पर्श करते हुए कहा -''.....आप डॉ नीरजा के पिता जी हैं !!!....मतलब जिन्होंने अभी अभी मेरी पत्नी और बच्ची की ऑपरेशन कर जान बचाई है .आपका बहुत बहुत शुक्रिया आपने न केवल मेरी सोच को बदला है बल्कि मुझे मेरी बिटिया के सामने भविष्य में शर्मिंदा होने से भी बचा लिया है .''

                                                          

                      शिखा कौशिक 
              [मेरी कहानियां ]


मंगलवार, 18 सितंबर 2012

सलाम मदर इण्डिया को -लघु कथा

सलाम मदर  इण्डिया को -लघु कथा 

   
'विलास ..  .. विलास ' बाइक पर विलास के  घर  के  बाहर  कुंदन  और  किशोर  दबी  जुबान  में आवाज  लगा  रहे  थे  .फरवरी के महीने  की  सुबह  के चार  बज रहे थे . विलास हल्के  क़दमों  से  हाथ में एक थैला लेकर चुपके से घर से निकल लिया .बाइक पर  किशोर के पीछे  विलास के बैठते  ही  कुंदन ने  बाइक  स्टार्ट  कर  दी .हवा  में उड़ते  हुए  तीनों  एक घंटे  में शहर  के चौराहे  पर पहुँच  गए  .विलास ने  घडी  में टाइम  देखा  .पांच  बजने  वाले  थे .कुंदन बोला  -''तैयार  रहना  विलास आज उन दोनों की सारी  हेकड़ी  निकाल देंगें .'' तभी  सामने  से स्कूटी  पर आती  दो  छात्राएं  दिखाई  दी . उनके थोडा आगे  निकलते ही कुंदन ने बाइक उनकी  स्कूटी  के पीछे दौड़ा दी .सड़क  पार होते   ही स्कूटी ज्यों   ही एक   गली  में  मुड़ी  कुंदन ने सुनसान  इलाका  देख  अपनी  बाइक की   रफ़्तार  बढ़ा दी और स्कूटी के आगे जाकर रोक  दी .तेज ब्रेक लगाने  के कारण स्कूटी का संतुलन बिगड़ा और संभलते संभलते भी भी दोनों छात्राएं सड़क पर गिर पड़ी .विलास तेजी से बाइक से उतरा और थैले में से बोतल निकालकर उनकी ओर बढ़ा .बोतल का ढक्कन  खोलकर उसमे भरा  द्रव सड़क पर गिरी छात्राओं के चेहरों पर  उड़ेल  दिया .छात्राओं ने चीखकर अपना  मुंह ढक लिया  पर ये क्या वहां चारो  ओर गुलाब जल की खुशबू फ़ैल गयी .विलास ने हाथ में पकड़ी बोतल के मुंह को नाक के पास  लाकर  सूंघा  ..उसमे से गुलाब जल की ही खुशबू आ रही  थी  .उसने बोतल को ध्यान  से देखा .ये तेजाब वाली बोतल नहीं थी .
तभी  किशोर जोर  से बोला  -''....विलास जल्दी भाग .......पुलिस ...पुलिस पुलिस की जीप आ रही है  .विलास के हाथ कांप  गए  बोतल हाथ से छूटकर वही गिर गयी ..विलास बाइक की ओर दौड़ा तभी गली में एक कार आकर  रुकी .विलास पहचान गया ये उनकी ही कार थी .कार का गेट  तेजी से खुला  और एक महिला उसमे  से बाहर   निकली .विलास उन्हें देखते  ही बोला  .-''..मम्मी  आप   ...यहाँ ....!!!'' पीछे से आती पुलिस की जीप भी वहां आकर रुकी .महिला ने विलास के पास आकर  एक जोरदार  तमाचा  उसके  गाल पर जड़ दिया और क्रोध  में कांपते हुए  बोली -''....मैं  तेरी  मम्मी नहीं .!!''दौड़कर आते पुलिस के सिपाहियों को देखकर तीनों  भागने  का प्रयास  करने  लगे  पर विफल  रहे  .विलास की मम्मी ने फिर उन छात्राओं के पास पहुंचकर  उन्हें  सहारा  देकर  खड़ा  किया ओर उन्हें अपनी कार से डॉक्टर  की क्लिनिक  तक  पहुँचाया .................फिर एक लम्बी सांस  लेकर  सोचा -'''अगर  मैं विलास की गतिविधियों पर ध्यान न देती और तेजाब की बोतल की जगह थैले में गुलाब जल की बोतल न रखती तो आज उसने तो इन  कलियों को झुलसा ही डाला था  .
                                       shikha kaushik 

शनिवार, 7 जुलाई 2012

जोर का झटका ...धीरे से लगा !!-a short story

जोर का झटका ...धीरे से लगा !!



विपाशा कॉलेज से घर लौटी तो माँ के कराहने की आवाज सुनकर  माँ के कमरे की और  बढ़  ली .माँ पलंग पर लेटी  हुई थी .विपाशा ने अपना बैग एक ओर रखा  और माँ के माथे पर हाथ रखकर देखा .माँ ज्वर  से तप रही थी .विपाशा ने माँ से पूछा -''दवाई नहीं दी भाभी  ने ?''माँ ने इशारे से मना कर दिया .विपाशा का ह्रदय क्रोध की अग्नि से धधक  उठा किन्तु अपने पर नियंत्रण कर पहले रसोईघर में गयी और चाय बना ली .माँ को सहारा देकर बैठाया और बिस्कुट खिलाकर दवाई दे दी .माँ को थोड़ी देर में कुछ आराम मिला तो वे सो गयी .माँ को सोया हुआ देखकर विपाशा भाभी के कमरे की ओर गयी .विपाशा के वहां पहुँचते ही भाभी तेजाबी अंदाज  में बोली -''  आ गयी  कॉलेज से घूमकर ?आज बहुत  देर से आई हो  !''विपाशा ने शांत रहते  हुए  कहा  -''माँ की दवाई देना आप भूल गयी थी या आपने जान बूझकर नहीं दी ?''भाभी का चेहरा गुस्से से लाल  हो गया और विपाशा को लताड़ते  हुए बोली -'अपनी हद में रहो वरना तुम्हारे भैया से कहकर तुम्हे ओर तुम्हारी माँ को घर से बाहर .....खड़ा कर दूंगी ......अब ससुर  जी  तो जिन्दा रहे नहीं ....दर दर  ठोकरे  खाती फिरोगी ....''तभी भाभी का मोबाईल बज उठा   .उसकी माता जी का फोन था .घबराई हुई बोल रही -''....कनक  ...मैं और तेरे पापा सड़क पर खड़े हैं ...तेरे भाई -भाभी ने हमें  घर से बाहर निकाल  दिया है .दामाद  जी को लेकर तुरंत यहाँ आ जा तेरे पापा की तबियत बहुत ख़राब है .'' ये सुनते ही भाभी के पैरों तले की जमीन खिसक गयी .उसकी आँख में आंसू छलक आये और विपाशा के अधरों पर व्यंग्यात्मक    मुस्कान  !
                      शिखा कौशिक 
              [मेरी कहानियां ]

शनिवार, 19 मई 2012

गंवार लड़की ? -लघु कथा

गंवार  लड़की ? -लघु कथा  

कॉलेज कैंटीन में  बैठे  रिकी और रॉकी अपनी ओर  आती  हुई सुन्दर   लड़की को   देखकर   फूले  नहीं समां  रहे  थे  .लड़की ने उनके  पास  आकर   पूछा  -''भैया  ! अभी  अभी कुछ  देर  पहले  मैं  यही  बैठी  थी  ....मेरी  रिंग  खो  गयी  है ...आपको  तो नहीं मिली ?''रॉकी और रिकी ने बुरा सा मुंह बनाकर मना कर दिया .उसके जाते ही  रिकी रॉकी से  बोला  -''हाउ विलेजर  इज शी  ?[यह कितनी गंवार है ?]हमें भैया बोल रही थी !'' रिकी व् रॉकी कॉलेज में मस्ती  कर अपने  अपने घर  लौट  गए  .घर पर  रिकी ने अपनी छोटी  बहन  सिमरन  को उदास देखा तो बोला -''व्हाट  डिड हैपेन सिस ?……. तुम इतना सैड क्यों हो ?' सिमरन झुंझलाते हुए बोली -''भैया आज कॉलेज में मेरी क्लास के एक लड़के की नोटबुक  क्लास में छूट गयी ....मैंने देखी  तो दौड़कर उसे पकड़ाने  गयी ...पर वो  तो खुश  होने की जगह गुस्सा हो गया क्योंकि मैंने उसे ''भैया ''कहकर आवाज दी थी .बोला ''भैया किसे बोल रही हो ?हाउ विलेजर आर यू ?'मुझे बहुत गुस्सा आया उस पर .''रिकी अपनी मुट्ठी  भीचता हुआ बोला -''कमीना   कहीं का ... मेरी बहन पर   लाइन    मार रहा    था  ....सिमरन उस कमीने से अब   कभी  बात   मत करना !!!
                                                                                शिखा कौशिक   
                                                                          [मेरी कहानियां   ]

बुधवार, 9 मई 2012

''ये तो घाटे का सौदा रहा ''!!!-A SHROT STORY

''ये तो घाटे का सौदा रहा ''!!!-A SHROT STORY 

'संतरेश  की माँ यहाँ आ   ...'' पति सत्तो   की  कड़क   आवाज़  पर बर्तन    मांजती    सुशीला    धोती  के पल्लू  से हाथ पोछती हुई रसोईघर से निकल  आँगन में  पड़ी खाट  पर बैठे पति  के पास आकर जमीन पर उकडू बैठ गयी .संतरेश  का  बाप  अंगूठे व् तर्जनी से पकड़ी हुई बीडी को मुंह   से निकालते  हुए  बोला  -''कल्लू  मिला  था  ...कह  रहा  था  सत्रह  की हो   गयी तेरी  लौंडिया  ..ब्याह  न  करेगा  ?''...मैं बोला तू ही बता  ...तो बोला ..''तीन  हज़ार  dene को taiyar है पास  के gauv   का सुक्खू   ...उम्र भी बस   चालीस   के आस   पास  है .मैं बोला तीन  तो कम हैं  ...इतना तो छोरी  ही कमा  लावे है काम  करके इधर उधर से ....फिर वो बोला 'अच्छा kal    को बताऊंगा  सुक्खू से बात करके ...''...इब तू बता  के कहवे ?'' सुशीला मुंह बनती  हुई बोली -''धी का जन्म तो होवे ही है नरक भोगने को ...जितने में चाहवे कर दे ..मैं कुछ  बोल के क्यों खोपडिया  पे जूत लगवाऊँ ....'''ये कहकर  सुशीला बर्तन  धोने  फिर  से  रसोईघर  को  चली  गयी  .दो दिन बाद संतरेश की शादी सुक्खू के साथ  हो गयी .विदाई  के समय सुशीला की आँख में आंसू  थे और सत्तो रूपये  गिनते  हुए  मन में सोच रहा था कि-''ये तो घाटे का सौदा रहा ''!!!
                                                -shikha  kaushik  

रविवार, 6 मई 2012

मेरे पापा .. तुम्हारे पापा से भी बढ़कर हैं-a short story




   स्कूल  में  भोजनावकाश  के  समय  कक्षा  पांच  के तीन  विद्यार्थी  राजू ,सोहन व् बंटी ने अपने टिफिन बॉक्स खोले और निवाला  मुंह में रखते हुए राजू बोला-''...पता है सोहन मेरे पापा को  मेरी  बहन बिलकुल पसंद  नहीं .पापा कहते हैं कि यदि उसकी जगह भी मेरे भाई होता तो हमारा  परिवार पूरा हो जाता .कल हम दोनों में लड़ाई हो गयी .मेरी गलती थी ....पर पापा ने मेरी बहन के गाल पर जोरदार  तमाचा लगाते हुए कहा-शर्म नहीं आती अपने भाई से लडती है !''.....सोहन बोला-''मेरे पापा तो तुम्हारे पापा से भी बढ़कर हैं कल माँ से कह रहे थे -''यदि इस  बार लड़की  पैदा  की तो घर   से  निकाल दूंगा तुझे  ..तुम  तो जानते  ही  हो मेरे पहले  से ही  तीन छोटी  बहने    हैं .''.....उन    दोनों की बात  सुनकर  बंटी बोला -''...पर मेरे पापा तुम   दोनों के पापा से बढ़कर हैं .मेरी माँ के पेट     में ही  जुड़वाँ  बहनों  को परसों  ख़त्म  करवाकर  आये  हैं .ये  तो अच्छा  हुआ   कि मैं  लड़का  हूँ  वरना  वे  मुझे  भी जन्म न  लेने   देते   ....''  तभी   भोजनावकाश   की समाप्ति  की घंटी  बजी  और 
तीनों  अपनी  अपनी  सीट   पर जाकर  बैठ   गए  .
                 शिखा कौशिक  

शुक्रवार, 4 मई 2012

लघु कथा- ''माँ मैं इसलिए बच गया ''

लघु कथा- ''माँ मैं इसलिए बच गया ''



Dog : Pomeranian dog isolated on a white background Stock Photo
गूगल से  साभार 


सब्जी मंडी में अचानक रूपाली का चार वर्षीय  बेटा अर्णव ज्यों ही उससे हाथ छुड़ाकर भागा  तो  रूपाली का सारा ध्यान अर्णव की  ओर  चला गया . अर्णव ने तेजी  से भागकर एक पिल्ले को नाले में गिरने से बचा लिया .इसके बाद अर्णव रूपाली की ओर दूर से ही मुस्कुराता हुआ दौड़कर आने लगा कि तभी एक तेज़ रफ़्तार से   आती   बाईक  को   देखकर रूपाली सिहर  उठी  .अर्णव उसकी  चपेट  में आ   ही  जाता तभी एक युवक ने तेज़ी से आकर  अर्णव को अपनी  ओर खींच  लिया और...एक हादसा होने से बच गया .रूपाली भागकर उस युवक के पास  पहुंची  और उसका शुक्रिया  अदा  किया  फिर  अर्णव को अपनी बांहों में भरकर रो   पड़ी .अर्णव मासूमियत से माँ के आंसू  पोछते   हुए  बोला -''माँ मैंने उस पिल्ले को बचाया  था  न  नाले में गिरने से उसी तरह इस भईया ने मुझे उस बाईक से बचा लिया .मैं इसी  लिए बच गया .वो  देखो  वो प्यारा  सा  पिल्ला   कैसे पूंछ   हिला  रहा है !'' रूपाली ने रुधे गले से ''हाँ बेटा '' कहा और उसका हाथ पकड़कर सब्जी लेने के लिए दुकान की ओर चल दी .

                                                                                              शिखा कौशिक 
                                                                                      [मेरी कहानियां ]

रविवार, 1 अप्रैल 2012

पूनम युग और बेटियों को संस्कार -A SHORT STORY

पूनम युग और बेटियों को संस्कार 

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गूगल से साभार 
''मम्मा ....ये  देखो ....हा !शेम शेम !''यह कहकर रुमा की   पांच वर्षीय बिटिया टिन्नी ने  अपनी नन्ही नन्ही हथेलियों  से  अपना  मुंह ढक लिया  .रुमा ने उसके  हाथ  से अख़बार  की मैगजीन  लेकर देखी तो तो उस पर पूनम पांडे  की सेमी न्यूड  फोटो छपी  थी ...रुमा ने तुरंत मैगजीन मोड़कर रख दी और टिन्नी का ध्यान मेज पर रखे  गुलदस्ते  के फूलों की ओर लगाते हुए पूछा-''टिन्नी बताओं ...कौन सा फूल सबसे प्यारा है ?''...टिन्नी ने तुरंत गुलाब के फूल  को  छू दिया ..तभी उनका डौगी टुकटुक टिन्नी के पास आकर पूंछ  हिलाने लगा और तिन्नी  उसे  लेकर फुदकती हुई वहां से गार्डन की ओर चली गयी .....लेकिन  टिन्नी फिर से दौड़कर  रुमा के पास आकर अपनी कोमल हथेलियों  से उसके हाथ पकड़ते हुए बोली -''ममा.. उन आंटी ने कपडे क्यों नहीं पहने ?''रुमा के मन में आया -''इस पूनम पांडे  के गोली मार दू !!...अब क्या जवाब दू बच्ची को ?''तभी उसे एक जवाब सूझा.वो बोली -''बेटा   ..वो बहुत  गरीब है ....उसके पास कपडे नहीं हैं ....कल  ही भेज दूँगी ..''....इस बार टिन्नी संतुष्ट नज़र आई और रुमा ने राहत की साँस लेते हुए मन ही मन कहा -''हे भगवन  .....इस पूनम युग में बच्चियों की माताओं  को साहस  दो कि वे अपनी बेटियों में संस्कार भर सकें !''

                                                   शिखा कौशिक 

बुधवार, 28 मार्च 2012

''बेटी की माँ ''-a short story

 ''बेटी की  माँ  ''

Happy Mothers Day Song - I Love You Mommy Mothers Day Song For Children
सभी फोटोस गूगल से साभार 


Germany, Cologne, Mother and daughter (4-5) head to head, portrait, close-up Photo (WESTF14285)Germany, Cologne, Mother and daughter (4-5), mother touching nose, smiling, portrait Photo (WESTF14282)Germany, Cologne, Mother and daughter (4-5) head to head, portrait, close-up Photo (WESTF14284)

आठ साल की प्रिया अपनी सहेली के घर खेलने गयी हुई थी .जब शाम ज्यादा हो गयी तब सुनीता को प्रिया की चिंता सताने लगी .सुनीता ने बाल ठीक  किये और घर का ताला लगा रीना के घर की ओर चल दी .एक एक कदम रखते हुए बस यही ख्याल सता रहा था कि -''मेरी बिटिया  के साथ कुछ गलत न  हो जाये !.....प्रिया बता रही थी कि रीना कि मम्मी  बाहर  सर्विस  करती हैं ..यहाँ केवल  रीना व्  उसके  पापा  रहते    हैं ....आदमियों  का क्या  भरोसा   ?...मैं  भी   कितनी   पागल    हूँ   प्रिया को जाने  दिया   ...हे  देवी  मैय्या !    मेरी बिटिया  की रक्षा  करना  !कहीं  रीना के घर से लौटते  हुए कुछ न हो गया   हो ....प्रिया आज   सही   सलामत   मिल   जाये ...बस आगे   से उसे इतनी देर के लिए ऐसी जगह नहीं जाने दूँगी "'ये सोचते  सोचते  सुनीता  ने कस कर अपनी मुठ्ठी  भींच ली  ..तभी उसे सामने से प्रिया.. रीना व् रीना   के पापा आते दिखाई दिए .प्रिया को देखकर सुनुता की जान में जान आ गयी .सुनीता ने रीना के पापा का शुक्रिया अदा किया .वे वही  से लौट गए .सुनीता ने घर पहुंचकर प्रिया के गाल पर तमाचा जड़  दिया और उसे डांटते   हुए   बोली   ''....कोई जरूरत नहीं है   किसी के घर जाने की ...लड़कियों का घर से बाहर ज्यादा घूमना ठीक नहीं ...''सुनीता ने यह कहते  हुए ही प्रिया को बांहों में भर लिया और मन में सोचा -'''एक बेटी की  माँ को ऐसा ही बनना   पड़ता    है  !''


                                     शिखा कौशिक 
                           [मेरी कहानियां ]

सोमवार, 26 मार्च 2012

'' वही बहू अच्छी ! ''


सुशीला  के बेटे का ब्याह हाल ही में हुआ था .मोहल्ले में शोर था कि बहू इत्ता दहेज़ लाई है कि घर में रखने तक की जगह नहीं बची . .जेवर   ..लत्ता कपडा   इत्ता लाइ है  कि क्या कहने ...!''उषा ने सोचा  ''....''मिल  ही आती हूँ सुशीला से और बहू भी देख आऊं ...हरिद्वार न गयी होती तो ब्याह में जरूर शामिल होती .......कितनी आस थी  ...मेरी बहू भी खूब दहेज़ लाये ...चार में बैठ कर गर्दन ऊँची करके कहती मेरे मुकेश की ससुराल.....पर क्या ?मुकेश ने सब मटियामेट कर दिया ...खुद ही ब्याह लाया ....एक चाँदी का सिक्का और दो जोड़ी कपडे .....सारी बिरादरी में नाक कटवा दी ....''.यही सब सोचते हुए उषा अपने कमरे में गयी और एक नयी धोती पहन कर तैयार हो गयी सुशीला के यहाँ जाने के लिए .कुछ रूपये ''बहू के मुंह dikhai '' हेतु लेकर रसोईघर में काम कर रही मुकेश की बहू सरिता से यह कहकर कि -''बहू..जरा सुशीला के यहाँ जा रही हूँ...मुकेश और उसके पिता जी दुकान से लौट आये तो मेरा इतज़ार   किये  बगैर  चाय बना लेना  ..मुझे देर हो सकती है वहां ...''ज्यों ही उषा ने चौखट के बाहर पैर रखा चौखट के आगे पड़ी लाहौरी ईट पर पड़ा और उसका पूरा पैर मुड़ गया ....वो ''हाय राम...''कहकर चीखी व् पैर पकड़कर वहीँ बैठ गयी .तेज दर्द के कारणउसकी आँख में आंसू भर आये .सासू माँ की चीख सुनकर सरिता सारा काम छोड़कर तेजी से भागी आई .सासू माँ को दर्द से तड़पते देख उसकी भी आँख भर आई .घर के आगे से जाते पडोसी रमेश की मदद से सरिता सासू माँ को उनके कमरे  तक ले आई और उन्हें पलंग  पर लिटाकर हल्दी का दूध बना लाई. ....फिर ऐसी तरकीब से सासू माँ का पैर मरोड़ा  की चट-चट करती सारी नसें खुल गयी और उषा के  पैर में आई मोच व् दर्द दोनों ठीक हो गए .उषा ने सरिता को लेट लेटे ही इशारे से अपने पास बुलाया और थोडा सा उठकर उसके माथे को चूम लिया ..फिर मुस्कुराकर बोली ..''मुकेश है तो मेरा ही बेटा ...ऐसी बहू लाया है कि लाखों क्या..करोड़ों में भी न  मिले ..''सासू माँ से तारीफ सुनकर सरिता मुस्कुरा  दी .उषा ने मन  ही मन सोचा -''करोड़ों का दहेज़ भी ले आती तो क्या होता ....जो दुःख दर्द में बेटी  की तरह सेवा कर सके वही बहू अच्छी !'' 
शिखा कौशिक 

गुरुवार, 15 मार्च 2012

तेरे ही कर्म -A SHORT STORY


गूगल  से साभार 
 

    बयालीस   वर्ष   की   आयु   में   अचानक  ह्रदय गति   रुक  जाने  से   मृत्यु    को    प्राप्त   चपल   ने   भगवान   के   दरबार   में   पहुचकर    पूछा  - ''हे   प्रभु   मेरे   साथ   ये   अन्याय   क्यों   किया   ?मेरा   परिवार   -मेरे  बच्चे  सब  अनाथ   हो  गए  .''प्रभु  व्यंग्ययुक्त   स्वर  में  बोले    -''मूर्ख  आज  से दस  साल पहले जब  तू   भीषण   दुर्घटना   में  भी   बाल  -बाल  बच   गया   था  तब  तेरा  ही  एक  सत्कर्म  तेरी  रक्षा  कर  रहा  था  .तूने  एक  गरीब  किसान  की  जमीन   महाजन  के  चंगुल  में  जाने से बचवाई  थी  पर  अब  तू  घर  में  बैठे  बैठे  ही  इस  तरह  इसलिए  मर  गया  क्योंकि   तेरा  एक  दुष्कर्म  तेरे  सब  पुण्यों     को लील   गया  तूने  एक  गरीब  से भी  रिश्वत    ले ली  जबकि  उसकी  पत्नी  दवाई  के  पैसे  न  होने  के  कारण   बीमारी  में  चल  बसी  .मैं  न  तो   किसी    के  साथ  न्याय  करता  हूँ  और  न  अन्याय  ..ये  तेरे  ही  कर्म  होते  हैं  .यमदूतों -   इसे  नरक  में  छोड़  आओ  !''प्रभु  ऐसा   आदेश   देकर   अंतर्ध्यान  हो  गए  .
                                                                शिखा कौशिक