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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

व्यास-गद्दी -लघु कथा

आरती और भारती तैयार होकर त्रिपाठी जी के यहाँ ''श्रीरामचरितमानस'' के अखंड पाठ में सम्मिलित होने के लिए पहुंची .अभी 'बालकाण्ड' का पाठ ही चल रहा था .आरती व् भारती को देखकर त्रिपाठी जी की बिटिया सुनयना मुस्कुराती हुई आई और उन्हें छेड़ते हुए बोली -'' दोनों भाभियाँ एक साथ ...आनंद आ गया देखकर !'' आइये बैठिये ना .'' आरती सुनयना के कंधे पर स्नेह से हाथ रखते हुए बोली -'' दीदी हम ज्यादा देर न बैठ पायेंगें ...हमें जल्दी जल्दी रामायण के पाठ का सुअवसर दिलवा दो .'' आरती की बात पर सुनयना आश्चर्य चकित होते हुए बोली -'' भाभी हमारे यहाँ व्यास-गद्दी पर महिलाएं नहीं बैठती ..आपको नहीं पता ?' ' आरती ने भारती की ओर देखा और भारती मुस्कुराती हुई सुनयना के पास आकर बोली -'' हमें जल्दी है दीदी ...शायद माता जी आरती के समय आएँगी .'' ये कहकर सुनयना के बहुत आग्रह पर भी वे नहीं रुकी .घर की ओर जाते समय आरती व् भारती के दिमाग में एक ही प्रश्न बार-बार घूम रहा था कि '' फिर ''रामायण पाठ '' के आरम्भ में आह्वान करते समय माता सीता को क्यों बुलाया जाता है ..व्यास-गद्दी पर बैठकर माता सीता का नाम ही क्यों लिया जाता है जबकि वे भी तो एक महिलां है ..हम अपवित्र हैं तो वे भी तो ....!!!''
शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

पुरुषीय -नैतिकता :कहानी

Protest : lots of furious people protesting (a group of people protesting, protest, demonstrator, protest man, demonstrations, protest, demonstrator, hooligan, fan, protest design, protest poster) Stock Photo
''हत्यारे को फांसी दो ...फांसी दो .....फांसी दो ...!!!'' के नारों से शहर की गली गली गूँज रही थी .अपनी ही पत्नी की हत्या कर सात हिस्सों में लाश को काटकर तंदूर में भून डालने वाले विलास को फांसी दिए जाने की वकालत समाज का हर तबका कर रहा था .विलास की दरिंदगी का किस्सा जहाँ भी , जिसने भी सुना ,अख़बार में पढ़ा -उसकी आत्मा कांप उठी और होंठों पर बस यही प्रश्न -' क्या कोई इंसान ऐसा भी कर सकता है ?'प्रियंका से प्रेम-विवाह किया था विलास ने फिर ऐसा क्या हुआ जो विलास एक इंसान से हैवान बन बैठा ?' 'नौ महीने दस दिन चली उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में ऐसा कौन-सा ज़हर घुल गया जिसने विलास को एक जंगली कुत्ता बना डाला ?'
जेल में भी साथी कैदी उससे बात करने में कतराते और उसके साथ बैठते उन्हें घिन्न आती .साफ्टवेयर इंजीनियर विलास आज कैदी बनकर जेल में घुटने मोड़कर उनके बीच में अपना सिर दिए बैठा रहता .न उसके घर से उसके माता-पिता मिलने आये और न ही प्रियंका के घर से कोई उससे मिलने आया .
आज कचहरी में जज साहब के सामने विलास को अपना पक्ष रखना था .पुलिस सुरक्षा में कचहरी में पहुँचते ही ''इस वहशी को फांसी दो !!!'' के नारे गूंजने लगे .हजारों की संख्या में जमा भीड़ के हाथों से विलास को ज़िंदा बचाकर कोर्ट-रूम तक ले जाना पुलिस के लिए उतना ही मुश्किल काम था जितना मधुमक्खियों के उड़ते माल से बचकर निकलना पर पुलिस वालों ने आज पसीना बहाते हुए कर्तव्य पालन की मिसाल खड़ी कर दी . जनता के हाथ मात्र विलास की कमीज़ के कॉलर का जरा सा टुकड़ा ही लग पाया जो एक बहादुर जनसेवक ने पुलिस के डंडे खाकर भी आगे बढ़कर खींच लिया था .
कोर्ट-रूम में जज साहब के द्वारा यह पूछे जाने पर कि ''तुम अपनी सफाई में क्या कहना चाहोगे ?'' पर विलास ने धीरे से उत्तर देना शुरू किया -'' सर ! मैं निर्दोष हूँ ..मुझे ये सब करने के लिए प्रियंका ने ही उकसाया .वो प्रेमिका से कभी पत्नी बन ही नहीं पायी .जब तक हमने प्रेम-विवाह नहीं किया था तब तक उसका अपने घर वालों से छिप छिप मोबाइल पर मुझसे बात करना मुझे बहुत अच्छा लगता था पर विवाह के बाद भी वो किसी से छिप छिप कर फोन पर बात करती .मैं पूछता तो कहती ...मम्मी का फोन है ...फिर मैं कहता मेरी बात कराओ तो गुस्सा हो जाती ..कहती मुझ पर शक करते हो ..जाओ नहीं कराती बात ..यूँ टाल जाती . मुझसे रोज़ नए-नए गिफ्ट एक्सपैक्ट करती ..मैं न लाता तो न खाना बनाती और न पानी को पूछती .विवाह के दो माह के अंदर उसने मेरे जमा बैंक-बैलेंस का आधा रुपया कपड़ों , जेवरों में फूंक डाला .मैंने टोका तो खुद पर मिटटी का तेल छिड़ककर माचिस लेकर खड़ी हो गयी .
मैंने तो ये सोचकर उससे विवाह किया था कि पढ़ी लिखी ब्रॉड माइंडेड लड़की है ..हमारी अच्छी छनेगी पर उसने तो मुझे मेरे ही घर में घोट डाला .मेरे माता-पिता ने मेरी इच्छा को सम्मान देते हुए मेरे प्रेम विवाह को मान्यता दे दी .वे घर आने वाले थे .मैंने प्रियंका से कहा -'' आज साड़ी पहन लेना ..माँ को पसंद है'' .. पर वो माँ-पिताजी के सामने क्वार्टर पैंट-टॉप में आकर खड़ी हो गयी .माँ-पिता जी के जाने के बाद मैंने गुस्से में उसके तमाचा जड़ दिया तो अलमारी से साड़ी निकल कर बैड पर चढ़ गयी और सीलिंग फैन से लटकने की धमकी देने लगी और कहने लगी -''तुमने मुझे इसी पहनावे में पसंद किया था और आज इसी के कारण मेरे तमाचा जड़ दिया ..तुम ऐसा नहीं कर सकते !!!''
विवाह के छठे महीने हमें खुशखबरी मिली कि हमारे घर नन्हा मेहमान आने वाला है पर प्रियंका ने मुझसे पूछे बिना ..जब मैं कम्पनी के काम से बाहर गया हुआ था बच्चा गिरा दिया .कारण पूछने पर बोली -अभी मैं केवल तेईस साल की हूँ ..अभी से माँ बनने का नाटक मुझसे नहीं होगा और हां जब मैं अपने माता -पिता से बिना पूछे तुमसे शादी कर सकती हूँ तब हर काम मैं तुमसे पूछ पूछ कर करूंगी इसकी उम्मीद तुम मुझसे मत रखना .''
प्रियंका की ये हरकतें कब मुझे इंसान से हैवान बनाती गई मैं खुद भी न जान पाया .मुझसे मिलने आये दोस्ते से उसका घुल-मिल कर बातें करना मुझे अंदर तक जला डालता .मैं उसे टोकता तो कहती -''अगर मैं मर्दों से बात करने में शर्माती तो क्या तुमसे बात कर पाती ..अब मेरा आज़ाद ख्यालात होना खटक रहा है पर विवाह से पहले तुम्ही कहते थे ना कि सिमटी-सकुची गंवार लड़कियां तुम्हे पसंद नहीं ...जो ठीक से बात भी नहीं कर पाती .''
प्रियंका के इस व्यवहार ने मुझे डरा डाला था .विवाह से पहले बात और थी पर अब वो मेरी पत्नी थी ..प्रेमिका की बातें दोस्तों में कर मैं भी मजे लेता था पर पत्नी ...पत्नी दोस्तों के साथ बैठ कर मजे ले ये मुझे क्या किसी भी मर्द को बर्दाश्त नहीं हो सकता !प्रेमिका आज़ाद ख़यालात रख सकती है पर पत्नी नहीं ....प्रेमिका के लिए रूपये हवा में उड़ाये जा सकते हैं पर पत्नी के लिए नहीं .पत्नी देवी होती है और जब वो अपने देवी -स्वरुप की गरिमा का ध्यान नहीं रखती तब उसके ऐसे ही टुकड़े किये जाते है जैसे मैंने किये ...आखिर नैतिकता भी कोई चीज़ है .'' ये कहकर विलास चुप हो गया .जज साहब निर्णय सुरक्षित रख कोर्ट रूम से चले गए तब पुलिस विलास को कोर्ट रूम से वापस अपनी जीप की ओर ले चली .कचहरी परिसर में अब केवल कुछ महिला संगठन की सदस्याएं -''फांसी दो ..फांसी दो !'' का नारा बुलंद कर रही थी .सभी आंदोलनकारी पुरुष अब नदारद थे .
शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

सरम भी तो आवै है -लघु कथा

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''अजी सुनते हो .....मुझे तो नयी बहू के लक्षण अच्छे नहीं लगते ..'' मित्तल बाबू की धर्मपत्नी अपने इकलौते पुत्र की नयी -नवेली दुल्हन के बारे में पतिदेव से शिकायत करती हुई बोली .मित्तल बाबू अखबार पढ़ते हुए उदासीन भाव से बोले -'' एक महीना भी पूरा नहीं हुआ बेटे के ब्याह को और तुम्हारी ये चुगलियां शुरू .अब बस भी करो .क्या गलत दिख गया बहू में ?'' मित्तल बाबू की बात पर नाक-भौ सिकोड़ते हुए उनकी धर्मपत्नी मिर्च भरी जुबान से बोली -''चुगलियां .....पता भी है कल नल ठीक करने वाला मिस्त्री आया था और ये आपकी लाड़ली बहू बिना मुंह ढके हंस-हंस कर बतिया रही थी उस गैर-मर्द से ...सरम भी तो आवै है कि नहीं !'' मित्तल बाबू अख़बार मोड़कर सामने रखी मेज़ पर पटककर रखते हुए बोले -'' शर्म की ठेकेदार धर्मपत्नी जी जब पुरुष टेलर के यहाँ जाकर खुद को नपवाती हो तब शर्म कहाँ जाती है और चूड़ीवाले से चूड़ी पहनते समय भी शर्म आती है तुम्हे ....नहीं ना ..तब बहू के लक्षण की बात रहने ही दो तुम ...व्हाट नॉनसेंस !'' मित्तल बाबू ये कहते हुए खड़े हुए और वहाँ से चल दिए .उनकी धर्मपत्नी उनके जाते ही सिर पर हाथ रखते हुए बोली -'' ये तो लल्लू हैं क्या जाने सरम क्या होवै है !!!''
शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 15 दिसंबर 2013

तेरहवीं -कहानी


''मृत्यु , दाह-संस्कार और तेरहवीं .....इसके बाद बस स्मृति-पटल पर दिवंगत व्यक्ति की छवि ,उसका मुस्कुराना ,रूठना , मनाना , हिदायतें और शेष इच्छाओं की अपूर्णता को लेकर कसक ...बस यही तो है इस जीवन का सच .'' विचारों के ऐसे ही तूफानी उथल -पुथल से जूझ रही थी पुष्पा अपने सामने घर पर ताला लगवाते समय . आज उसका दिल ही नहीं बल्कि उसकी आत्मा भी चीत्कार कर रही थी .
तेरह दिन पहले तक ज़िंदगी धीमी ही सही सुकूनी रफ़्तार से चल रही थी .पुष्पा और उसके पतिदेव अपने इस आशियाने में लम्बा वैवाहिक सफ़र पूरा कर इतमीनान से रह रहे थे .एकलौता बेटा व् बहू दूर शहर में अपना आशियाना बसाये हुए थे ....पर तेरह दिन पहले की वह कातिल सुबह पुष्पा के पतिदेव को ह्रदय -गति रुक जाने के कारण अंतिम -यात्रा पर ले गयी और पुष्पा के दिल में बस एक सदमा कि ''अब तो जाना ही होगा '' दे गयी . किसी गैर के घर नहीं बल्कि अपने एकलौते बेटे के घर जाना भी पुष्पा के लिए दुखदायी ही था .पतिदेव के जीवित रहते कई बार कहा था पुष्पा ने बेटे के घर चलकर रहने के लिए पर रिटायर्ड बैंक अधिकारी पतिदेव ने हर बार ठुकरा दिया था ये कहकर -'' तुम जाना चाहती हो तो जाओ मैं अकेला रह लूँगा !'' पुष्पा जानती थी कि पतिदेव का यहीं अपने घर पर रहना स्वाभिमानी होने के साथ-साथ इस घर से जुड़ा मोह भी है .अपने ही बेटे के घर मेहमान बनकर जाने पर जो इज्ज़त बख्शी जाती है वो स्थायी रूप से निवास करने पर ज़िल्लत का रूप ले लेती है फिर अपनी इच्छानुसार जागने ,उठने-बैठने ,खाने-पीने ,घूमने ,बुलाने-जाने की जो आज़ादी यहाँ है वो बेटे के घर कहाँ ! दो दिन भी काटने मुश्किल हो जाते थे उसके घर जब कभी जाकर रहे थे दोनों .बेटे-बहू का भी दोष नहीं उनकी अपनी जीवन -शैली है .यहाँ बरसों पुराने दोस्तों के साथ पुरानी यादों को ज़िंदा कर जीवन के इस अंतिम -पड़ाव का जो आनंद था वो बेटे के घर पर टी.वी. के सामने चिपके रहने में कहाँ !....पर आज ...आज तो पुष्पा को जाना ही पड़ेगा ! शरीर में इतना दम नहीं कि अकेले रह पाये और बेटा कब तक यहाँ रुक पायेगा ? ...पूरे तेरह दिन नौकरी ,बच्चों की पढाई ,अपना घर छोड़कर तन-मन से पिता की आत्मा की शांति के लिए लगा रहा है बेटा ...लेकिन अब एक और दिन रुक पाना सम्भव नहीं ! पोता-पोती धूम मचा रहे हैं ...पूरे तेरह दिन बाद वापस अपने घर जा रहे हैं.कितना होम-वर्क करना पड़ेगा -इसकी चिंता भी सता रही है उन्हें ....और पुष्पा है कि बार-बार आँगन में लगे पौधों के पास जाकर मन ही मन माफ़ी मांग रही है ...'माफ़ कर देना यदि किसी दिन पडोसी तुम्हे पानी देना भूल जाएँ ..कह दिया है उनसे पर तुम हो तो मेरे और उनके रोपे हुए .तुम ही साक्षी हो हम दोनों पति-पत्नी के आखिरी दिनों की मीठी नोंक-झोंक ,बड़बड़ाने और उखाड़ने के '' ......तभी नज़र पड़ी पुष्पा की कोने में पड़ी झाड़ू पर ...'' कौन बुहारने आएगा अब आँगन .......दिल करता है यहाँ की सुबह ,दोपहर , शाम और रात सब अपने थैले में भरकर ले जाऊं !''पुष्पा ये सोच ही रही थी कि बेटे ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा -'' चलो माँ ...कार में बैठो ...देर हो रही है ....अब यहाँ क्या जब पिता जी ही नहीं रहे !'' पुष्पा ने कातर दृष्टि से बेटे की ओर देखा . कान में फिर से गूंजा -''अब यहाँ क्या जब पिता जी ही नहीं रहे .'' पुष्पा के दिल में आया कहे ''सब कुछ तो है ....यहीं है मेरा सब कुछ '' पर बोल कुछ न पाई .कार में जाकर बैठने से पहले मुड़कर घर को प्रणाम किया -'' तेरी दीवारों ,छतों ,आँगन में मेरा जीवन बसंत सा बीता ...अब जा रही हूँ ...शायद फिर न आ पाऊं तुझे सजाने-संवारने ...मुझे याद रखना !'' ये सोचते सोचते कार में पिछली सीट पर बैठ गयी पुष्पा . कार स्टार्ट होते ही ज्यूँ ही चली पुष्पा को लगा मानों उसके पतिदेव घर के द्वार पर खड़े हैं और कह रहे हैं -'' जाओ पुष्पा ...तुम जाना चाहती हो तो जाओ ...मैं अकेला रह लूँगा !!'' पुष्पा आँखों से ओझल होने तक मुड़-मुड़ कर अपना आशियाना देखती रही और उसे महसूस हुआ मानों पतिदेव के साथ -साथ उसकी तेरहवीं भी आज हो गयी और वो आज अपनी आत्मा यहीं छोड़ अनंत मुक्ति-पथ पर चल पड़ी है .

[जनवाणी के रविवाणी में नौ फरवरी २०१४ अंक में प्रकाशित ]

शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

जातिवाद का ज़हर -लघु कथा

प्राइमरी स्कूल के अहाते में खेलते हुए बिटटू की पेन्सिल पैंट की जेब से निकलकर गिर पड़ी . वही पास में खड़े नोनू ने उसे उठाकर ज्यूँ ही बिटटू को पकड़ाना चाहा स्कूल के बच्चों का एक झुण्ड ताली बजाता हुआ बिटटू और नोनू को चिढ़ाने लगा -'' हा जी हा ...पेन्सिल तो चूड़े की हो गयी .'' बिटटू ने पेन्सिल नहीं पकड़ी और नोनू सर झुकाकर रोने लगा . उनकी टीचर ने उधर से गुजरते हुए ये सब देखा तो सभी बच्चों को डांटते हुए बोली - ''ये गन्दी बातें किसने सिखाई तुम्हें ? नोनू तुम सब में सबसे अच्छा बच्चा है ...उसने बिटटू की सहायता की है और सहायता करने वाला भगवान् का फरिश्ता होता है .'' ये कहते कहते वे झुकी और उन्होंने नोनू को गोद में उठा लिया और बच्चों के उस झुण्ड को सम्बोधित करते हुए बोली -''...लो मैं भी हो गयी चूड़े की !! मैं ने नोनू को गोद में जो उठा लिया !! कहो अब कहो !'' टीचर की इस बात को सुनकर सब बच्चों ने अपने कान पकड़ लिए पर टीचर जानती हैं ये कान इनके बड़ों को पकड़ने चाहिए जो इन्हें जातिवाद का ज़हर घुट्टी में घोलकर कर पिलाते हैं .
शिखा कौशिक 'नूतन

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

तमाचा-लघु कथा

अख़बार की रविवार -मैगजीन में छपी ग़ज़ल पढ़ते हुए टीटू की नज़र ग़ज़ल के नीचे छपे लेखिका के संपर्क नंबर गयी . ग़ज़ल अच्छी लगी तो उसने तुरंत अपने मोबाइल से लेखिका के दिए गए संपर्क नंबर पर कॉल कर दी .कॉल दूसरी ओर से रिसीव किये जाते ही टीटू ने लेखिका से उसकी ग़ज़ल की तारीफ की और पूछा -'' यदि आपके इस नंबर पर आपसे वैसे भी बात कर लूँ तो कोई दिक्कत तो नी जी ?'' टीटू के इस प्रश्न के जवाब में लेखिका ने गम्भीर स्वर में पूछा -'' यदि मेरी जगह तुम्हारी बहन से फोन पर कोई अजनबी यही प्रश्न करता कि ''बात करने में कोई दिक्कत तो नी जी '' तब तुम्हारा जवाब क्या होता ? वही मेरा जवाब है .'' लेखिका के ये कहते ही टीटू ने फोन काट दिया .उसे लगा पुरुषवादी सोच का तमाचा एक स्त्री ने उसके ही मुंह पर मार दिया है .
शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 8 दिसंबर 2013

रामलीला-मंच -लघु कथा

किशोरी सुकन्या नानी के घर गाँव आयी हुई थी . गाँव में स्थानीय नागरिकों द्वारा रामलीला का मंचन किया जा रहा था .सुकन्या भी नानी के साथ रामलीला का मंचन देखने पहुंची .उसे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि सीता आदि स्त्री पात्रों का अभिनय भी पुरुष कलाकार स्त्री बनकर निभा रहे थे .उसने नानी से पूछा -'' नानी जी यहाँ गाँव में कोई महिला कलाकार नहीं है क्या जो आदमी ही औरत बनकर स्त्री-पात्रों का रोल निभा रहे हैं ?'' उसकी नानी उसके सिर पर हल्की सी चपत लगाते हुए बोली -'' अरी बावली कहीं की ! रामलीला का मंच बहुत पवित्तर होवै है .औरत जात इस पे चढ़ेगी तो ये मैला न हो जावेगा ...औरते तो होवै ही हैं गन्दी !'' नानी की बात सुनकर सुकन्या तपाक से बोली - '' तो ये औरते यहाँ राम-लीला देखने भी क्यूँ आती हैं .ये परिसर भी तो मैला हो जायेगा नानी जी !!!'' ये कहकर सुकन्या उठी और वहाँ से घर की ओर चल दी .
शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

आकर्षक कवयित्री -लघु कथा

''अरे वाह ! माँ कितनी सुन्दर लग रही हो ......पर लिपिस्टिक थोडा डार्क लग रही है ....और बालों का आपका ये स्टाइल तो बिजली ही गिरा रहा है ...पर ये बैंगिल तो मेरी है ...आपने क्यूँ ली माँ ! आप किसी पेज थ्री पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रही हैं क्या ?'' किशोरी रिया की बात पर ड्रेसिंग टेबिल के आईने में अपने को ऊपर से नीचे तक निहारते हुए उसकी माँ चहकते हुए बोली - '' अरे नहीं ...पार्टी में नहीं आज मुझे कवि-सम्मलेन में कविता-पाठ करने जाना है .लोग कविता थोड़े ही सुनने आते हैं ???वरना निर्मला जी की तुलना में मेरी कविताओं की ज्यादा वाह-वाहवाही कोई करता क्या ? निर्मला जी ठहरी गाँधीवादी महिला .साधारण रहन-सहन !अब कौन समझाए उन्हें कवयित्री का आकर्षक दिखना भी कितना जरूरी होता है ! '' ये कहकर रिया की माँ ने अपने पर परफ्यूम का स्प्रे किया और अपने को महकाने के साथ साथ सारे वातावरण को बहका दिया .
शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

एक अच्छा सा फोटो -लघु कथा


अखबार के एडिटर महोदय का फोन आया .बोले -'' दीप्ति जी आपका आलेख सोमवार को प्रकाशित कर रहे हैं ..आप अपना अच्छा सा फोटो भेज दें .'' ये सुनते ही दीप्ति को झटका सा लगा .पहले भेजा तो था एक फोटो .अब जैसी वो है वैसा ही फोटो था .दीप्ति ने एडिटर महोदय को आश्वस्त करते हुए कि -'' वो भेजने का प्रयास करेगी '' बातचीत को सुखद विराम दे दिया पर इस बात ने उसके दिमाग में उथल -पुथल मचा दी .उसने सोचा -'' आखिर ये अच्छा सा फोटो क्यों जरूरी है ? क्या पाठक आलेख की सार्थकता के स्थान पर आलेख के साथ छपे लेखक के फोटो पर ज्यादा ध्यान देते हैं ? या ये बाध्यता केवल लेखिकाओं के साथ है कि उनकी रचना के साथ एक अच्छा सा फोटो भी हो ?क्या लेखिकाओं को अपनी लेखन-शैली को परिष्कृत करने ,अलंकृत करने ,शब्द ज्ञान को समृद्ध करने के स्थान पर अपना एक अच्छा सा फोटो अपनी रचना के साथ छपवाने से पाठकों में अधिक लोकप्रियता हासिल हो जायेगी ?'' तभी दीप्ति का ध्यान पास रखी साहित्यिक पत्रिका पर गया जिसमे महादेवी वर्मा जी का अत्यंत सीधा-सादा फोटो छपा हुआ था .दीप्ति उस फोटो को देखते हुए सोचने लगी -'' नहीं कभी नहीं ! एक लेखिका को केवल अपने लेखन पर ध्यान देना चाहिए और जिस पाठक की रुचि अच्छे फोटो में हो वे मॉडल्स के फोटो चाव से देख सकते हैं .लेखक व् लेखिका अपने लेखन से ही पहचाने जाये यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है !''
शिखा कौशिक 'नूतन

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

घटिया सोच-लघु कथा

tired businessman or taxi car driver -
शेखर अपनी नई खरीदी हुई कार से पहली बार अपने ऑफिस पहुंचा तो साथियों ने दावत की फरमाइश रख दी .दावत में उसके बॉस भी शामिल हुए .बातों ही बातों में शेखर के बॉस के मुख से वो बात निकल ही गयी जो उनके दिल में थी .वे व्यंग्यमयी स्वर में बोले थे -''भई अब तो मीडिल क्लास में भी बहुत लोगों ने कार कर ली है .'' शेखर को उनकी ये बात चुभी तो बहुत पर उसने ज़ाहिर नहीं होने दिया .ऑफिस से घर लौटते समय शाम को शेखर ट्रैफिक जाम में फंस गया .उसकी कार के बगल में एक रिक्शा भी जाम में फंस गयी .तभी उस रिक्शा के चालक का मोबाइल फोन बज उठा .रिक्शावाले को मोबाइल पर बतियाते देख शेखर के मन में आया '' लो भई अब रिक्शावालों पर भी मोबाइल हो गया .'' पर अगले ही पल शेखर अपनी इस सोच पर शर्मिंदा हो उठा .उसने सोचा -''जब मैं खुद से कम आय वर्ग के व्यक्ति को आधुनिक सुविधा का प्रयोग करते देख उनके प्रति ये घटिया सोच रखता हूँ तब बॉस की बात मुझे चुभी क्यों वे भी तो इसी घटिया सोच को ही प्रकट कर रहे थे !''
शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 1 दिसंबर 2013

पुरुष हुए शर्मिंदा -लघु कथा


लिफ्ट में घुसते ही बाइस वर्षीय सारा ने देखा लिफ्ट में उसके अलावा केवल उसके पिता की उम्र के एक शख्स लिफ्ट में थे .लिफ्ट चलते ही सारा ने उस व्यक्ति से जितनी दूरी सम्भव थी ...बना ली . सारा के मन में आया -'' पहले जब लिफ्ट में इस उम्र के किसी पुरुष को देख लेती थी तब रिलैक्स हो जाती थी ...चलो घबराने की कोई बात नहीं पर तरुण तेजपाल ने अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ जो किया उसके बाद से तो सच में किसी भी उम्र के पुरुष पर विश्वास नहीं किया जा सकता है .....!!'' सारा के सोचते सोचते ही लिफ्ट रुक गयी और गेट खुलते ही वो बाहर निकल ली .पीछे-पीछे वे सज्जन भी निकल लिए और उन्होंने सारा को टोककर रोकते हुए कहा -'' सुनो बेटी ! सब पुरुष तरुण तेजपाल जैसे नहीं होते .उसने जो किया उससे मैं भी शर्मिंदा हूँ !'' सारा ने उन सज्जन के चेहरे पर आये दीन भावों को पढ़ते हुए कहा -'' यस आई नो सर '' और ये सोचते हुए वहाँ से आगे बढ़ चली कि '' सच में तरुण तेजपाल ने सभी पुरुषों को शर्मिंदा कर डाला !''
शिखा कौशिक 'नूतन '

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

तू केवल इंसान -लघु कथा


रविवार का दिन था .पुष्कर दफ्तर के काम की कुछ फाइले बैड पर फैलाकर अपने काम में व्यस्त था तभी उसका पांच वर्षीय बेटा मिटठू बाहर से रोता हुआ आया और बैड पर चढ़कर उससे लिपट गया . पुष्कर ने अपना काम छोड़कर स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा -'' अरे क्या हुआ मिटठू बाबू जी .......आप तो खेलने गए थे बाहर !'' मिटठू अपनी नन्ही नन्ही उँगलियों से पुष्कर के दोनों कान पकड़ता हुआ बोला - '' पप्पा क्या मैं मनहूस हूँ ?'' मनहूस शब्द इतने छोटे बच्चे के मुंह से सुनकर पुष्कर आवाक रह गया . पुष्कर उसकी उँगलियों से कान छुड़ाता हुआ बोला -'' क्या कर रहे हो ? किसी ने कुछ कहा तुमसे ? '' मिटठू सुबकता हुआ बोला -'' हाँ ! वो रानी हैं ना ... ..मोटी कहीं की ...उसने कहा कि ''तुम हमारे साथ नहीं खेल सकते मेरी मम्मी कहती है कि तुम मनहूस हो ..तुम्हे जन्म देते ही तुम्हारी मम्मी मर गयी .'' ये बताता बताता मिटठू दहाड़े मारकर रोने लगा .पुष्कर उसे चुप कराता हुआ बोला -'' नहीं बेटा तू मनहूस नहीं है .मनहूस तो वे हिन्दू-मुस्लिम झगडे थे जिसके कारण शहर में कर्फ्यू लगा और मैं तुम्हारी मम्मी को समय से हॉस्पिटल न ले जा पाया .'' पुष्कर की बात पर मिटठू ने तुरंत प्रश्न पूछ डाला -'' पप्पा ये दंगे क्या होते हैं ....पप्पा मैं हिन्दू हूँ या मुस्लिम ?'' पुष्कर उसके इस प्रश्न पर उसके सिर पर हल्की सी चपत लगाता हुआ बोला -'' ये जो तू लड़कर आता है न अपने दोस्तों से ये ही दंगे होते हैं और तू न हिन्दू है और न ही मुस्लिम ..तू केवल इंसान है ...कुछ समझा .'' पुष्कर मिटठू को ये समझा ही रहा था कि गली के कई बच्चे शोर मचाते हुए वहीं आ पहुंचे .उनमें से एक गोल-मटोल प्यारी सी बच्ची आगे आयी और अपने कान पकड़ते हुए बोली -'' सॉरी मिटठू ..चलो बाहर चलकर खेलते हैं .'' उसकी सॉरी सुनते ही मिटठू ने पुष्कर की ओर देखा और उस बच्ची को धमकाता हुआ बोला -'' सॉरी की बच्ची रानी ..तुझे अभी सबक सिखाता हूँ .'' ये कहकर मिटठू बैड से कूदा और सारे बच्चे धूम मचाते हुए बाहर की ओर भाग गए .पुष्कर के दिल में आया -'' काश हमारे दिल भी बच्चों की तरह साफ़ होते तो न कभी मज़हबी दंगे होते और न मिटठू की तरह किसी बच्चे को अपनी माँ की ममता से महरूम होना पड़ता !''
शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कलियुग की जानकी -कहानी

Beautiful Indian girl in traditional Indian sari. - stock photo
कलियुग की जानकी -कहानी
''अजी सुनते हैं ...जरा अन्दर तो आइये जल्दी से ...!'' दबी जुबान में घबराई सुमित्रा ने स्वागत कक्ष में लड़के वालों की मेहमान नवाज़ी में जुटे अपने पतिदेव नरेन्द्र बाबू को बुलाया तो वे लड़केवालों से हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए ''अभी आता हूँ लौटकर ...आप नाश्ता कीजिये प्लीज '' ये कहकर मन ही मन खीजते हुए शयन कक्ष की ओर चल दिए .शयन कक्ष में पहुँचते ही वे सुमित्रा पर बिफर पड़े -''कमाल करती हो ...जानती हो ना बाहर कौन लोग आये हैं और ....और जानकी कहाँ है ?...तैयार नहीं हुई वो अब तक ?'' इससे आगे वे कुछ पूछते सुमित्रा ने भिंची मुट्ठी खोलकर एक मुसा हुआ कागज का टुकड़ा उनकी ओर बढ़ा दिया .नरेन्द्र बाबू आँखों से धमकाते हुए बोले -'' ये क्या है ? ...कर क्या रही हो तुम ?'' इस बार सुमित्रा का धीरज जवाब दे गया .वो दांत पीसते हुए बोली -'' मैं कुछ नहीं कर रही ! आपकी लाडली ही मुंह काला कर भाग गयी है और दो छूट जवान लड़की को ...लो पढो !'' इस बार नरेन्द्र बाबू आवाक रह गए .सुमित्रा के हाथ से कागज का टुकड़ा छीनकर एक एक शब्द ध्यान से पढने लगे .लिखा था -'' पापा मुझे ये शादी नहीं करनी .मैं जा रही हूँ .'' जानकी की लिखाई पहचानते थे वे .नरेन्द्र बाबू के पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी .जानकी ऐसा कर सकती है विश्वास नहीं हुआ पर प्रत्यक्ष प्रमाण ठेंगा दिखा रहा था मुंह चिढ़ा चिढ़ाकर .नरेन्द्र बाबू को लगा मानों इसी क्षण से वे दुनिया के सबसे कंगाल व्यक्ति हो गए हैं .जिस बेटी पर नाज़ था वो ऐसा धोखा देगी कभी कल्पना भी नहीं की थी .ये सच था कि समृद्ध परिवार के अमेरिका में बसे लड़के का रिश्ता आते ही उन्होंने जानकी की इच्छा जाने बिना ही रिश्ता तय करने का मन बना लिया था और जानकी को दुनियादारी की दुहाई देकर अंधी-मूक-बधिर बन जाने हेतु विवश कर दिया था लेकिन ये सब जानकी का हित सोचकर ही किया था पर जानकी ने सब के मुंह पर कालिख पोत दी . नरेन्द्र बाबू ने आंसू बहाती सुमित्रा के कंधे पर हाथ रखा और दिल कड़ा कर स्वागत कक्ष की ओर चल दिए .लड़के वाले कुछ व्यग्र नज़र आ रहे थे .नरेन्द्र बाबू ने हाथ जोड़ते हुए कहा -'' क्षमा चाहता हूँ ...पर आज रिश्ते की बात आगे न बढ़ पायेगी .बिटिया की तबियत अचानक ख़राब हो गयी ...आप लोगों को कष्ट हुआ इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ !'' उनके विनम्र निवेदन करने पर लड़के की माँ भड़कते हुए बोली -'' भाईसाहब ऐसी भी क्या तबियत ख़राब हो गयी ...मजाक थोड़े ही है ...हमने अपने बेटे को इसीलिए इंडिया बुलाया था कि एक बार लड़का -लड़की आपस में मिल लें ..पर आप तो हमें लाखों का चूना लगा रहे हैं .अमेरिका से यहाँ तक का किराया कितना लगता है ...जानते तो होंगे आप .....बहाने मत बनाइये सच क्या है बतला दीजिये .आपकी लड़की जैसी हजारों पड़ी है शहर में ...वो तो मेरे बेटे को उसका फोटो 'मैरिज डॉट कॉम' पर पसंद आ गया वरना हम अपनी हैसियत से इतना गिरकर शादी करने को कतई तैयार नहीं थे .आप भी कुछ बोलिए ना !'' ये कहते हुए लड़के की माँ ने लड़के के दुबले-पतले बाप को कोहनी मारी.लड़के के पिता सोफे पर से खड़े होते हुए बोले -''नरेन्द्र बाबू ..मुझे लगता है आपकी बेटी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं है .सच में आजकल लड़कियां कुछ ज्यादा ही बिगड़ गयी हैं .अपनी मर्जी से पहनना ,घूमना-फिरना ,शादी और भी न जाने क्या क्या !!'' वे इससे आगे कुछ कहते तभी नरेन्द्र बाबू का चेहरा सख्त हो गया .नरेन्द्र बाबू रूखे स्वर में बोले -'' देखिये मैं पहले ही आपको जो असुविधा हुई है उसके लिए खेद प्रकट कर चुका हूँ .आपके बेटे के आने-जाने का जो खर्च हुआ हो वो भी मैं चुका देता हूँ ...प्लीज अब आगे कुछ मत कहियेगा !'' नरेन्द्र बाबू के ये कहते ही लड़का थोडा अकड़ता हुआ बोला -'' अंकल यूं नो माई टाइम इज वैरी पिरिशियस ...वो तो मॉम -डैड ने प्रेशर डाला था ...मिडिल क्लास लड़की से तो मैं बात भी नहीं करता ...मैरिज तो ....और हां कहाँ है वो ...कहीं भाग तो नहीं ?'' लड़के के ये कहते ही नरेन्द्र बाबू का हाथ उसे थप्पड़ मारने के लिए उठ गया पर तभी डोर बैल बज उठी .नरेन्द्र बाबू के पीछे खड़ी सुमित्रा तुरंत किवाड़ खोलने के लिए उधर बढ़ ली .किवाड़ खोलते ही उसके आश्चर्य की सीमा न रही .उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा -'' जानकी तू !!!'' जानकी ने माँ के कंधे पर हाथ रखा और नरेन्द्र बाबू के पास पहुंचकर दूल्हा बनने आये लड़के वालों को संबोधित करते हुए बोली -'' ....मिस्टर फ्रॉड ये देखो मेरे हाथ में हैं तुम्हारे सारे अपराधों से सम्बंधित सबूत ....अमेरिका से आये हो .....ऑटो पकड़कर !!!......और मिडिल क्लास लडकी से बात भी नहीं करते .....किराये की खोली में रहने वाले !!!बाबू जी आप तो इनकी चमक-दमक में खो गए पर मैंने इंटरनेट पर सर्च किया तो जिस कम्पनी में ये अपने को सी.ई.ओ. बता रहा था वो तो कब की दिवालिया घोषित की जा चुकी है और जो टाइम इसने यहाँ इंडिया में अपनी फ्लाईट आने का बताया था उस टाइम पर तो अमेरिका क्या भूटान तक की फ्लाईट नहीं आती .अपनी सहेली प्रिया के पुलिस अंकल की मदद से इसका कच्चा-चिटठा खोजा तो ये जनाब दो दो शादी कर उनको धोखा देने के अपराधी निकले .....ये आप को ज़लील कर रहे थे अब देखिएगा इनका बैंड कैसे बजता है ? '' ये सुनते ही वे तीनों भागने के लिए ज्यों ही गेट की ओर बढे तभी एक अधेड़ महिला ने बाहर से आकर उनका रास्ता रोक दिया और बोली -'' दूल्हे राजा कहाँ भागते हो ? हम गरीबों को लूटकर चैन न पड़ा जो एक और लड़की की जिंदगी बर्बाद करने चले थे .'' इतना कहकर उसने पैरो की चप्पल निकाल ली .वो लड़के के सिर पर चप्पल जड़ने ही वाली थी कि पुलिस की जीप आ पहुंची .पुलिस उन तीनों को लेकर जब वहां से चली गयी तब नरेन्द्र बाबू जानकी के सिर पर हाथ रखते हुए बोले -जानकी तूने कलियुग में भी अपने पिता की लाज रख ली . तूने अपना नाम सार्थक कर दिया .मुझे माफ़ कर दे !'' ये कहते कहते उनका गला भर आया .जानकी ने उनकी हथेली अपनी हथेली में कसते हुए और पास खड़ी माँ को बांहों में लेते हुए कहा -'' बस अब कोई राम ही ढूंढना मेरे लिए .'' जानकी की बात सुनकर नरेन्द्र बाबू और सुमित्रा दोनों हो मुस्कुरा दिए !
शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 25 नवंबर 2013

कोई तो कमी है !!-लघु कथा

मधुकर बाबू के घर आज चहल-पहल थी .देवउठान एकादशी को ही उनकी पच्चीस वर्षीय विधवा बिटिया रिया का पुनर्विवाह होने जा रहा था .विवाह-स्थल पर सादगी से विवाह-संस्कार पूरे किये जा रहे थे .एक ओर एकत्रित आस-पड़ोस की महिलाओं की मण्डली इस विवाह के सम्बन्ध में अपनी अपनी राय ज़ाहिर कर रही थी .सत्या बोली -''अरे मैं तो सोच रही थी कोई बड़ी उम्र का दूल्हा होगा ..भला विधवा से कोई कम उम्र का लड़का क्यूँ ब्याह करने लगा ? ..पर ये तो रिया के साथ का ही लग रहा है और सुदर्शन भी है .'' विभा सिर का पल्लू ठीक करते हुए बोली -'' ठीक कह रही हो भाभी जी ...रिया से पूछा था मैंने कि दुल्हे की भी दूसरी शादी है क्या ?...बाल बच्चे भी हैं क्या ?...तो बोली 'नहीं चाची जी ये इनकी पहली ही शादी है .'' सुरेखा मुंह बनती हुई बोली -'' हो न हो कोई कमी तो है इस लड़के में वरना एक विधवा से कोई कुंवारा क्यूँ ब्याह करने लगा भला ...सरकारी अधिकारी है बड़ा ..तेरे ताऊ बता रहे थे .'' सुशीला सुरेखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली -'' ताई जी ठीक कह रही हो कोई न कोई कमी तो जरूर है .'' उन मधुमक्खियों की घिन-घिन तब टूटी जब फेरे पूरे हो गए और मधुकर बाबू नवदम्पत्ति को आशीर्वाद देते हुए बोले -'' तुम दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे और बेटा तुमने जो भारतीय समाज की दकियानूसी सोच को दरकिनार कर मेरी विधवा बेटी के जीवन में फिर से खुशियां भरी हैं मैं इसके लिए तुम्हारा आभारी हूँ .'' दूल्हे राजा ने मधुकर बाबू के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा -'' मैंने कोई उपकार नहीं किया है .रिया मुझे मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनसंगिनी लगी इसीलिए मैंने उसका हाथ आपसे मांग लिया और मुझे पता है कि यहाँ उपस्थित लगभग सभी का यही मत होगा कि मुझमे कोई न कोई कमी जरूर है जो मैंने एक विधवा लड़की से विवाह का निश्चय किया .हाँ मुझमे बहुत बड़ी कमी है और वो है -मैं भारतीय समाज की दकियानूसी सोच के अनुसार नहीं चलता जो सोच ये कहती है कि एक विधवा लड़की को केवल बड़ी उम्र का ,विधुर पुरुष ही ब्याहकर ले जा सकता है .'' दूल्हे राजा की ये बातें सुन सत्या ,विभा,सुरेखा व् सुशीला एक दुसरे का मुंह ताकते हुए सोचने लगी -'' कहीं दूल्हे राजा ने हमारी बातें सुन तो नहीं ली ?''
शिखा कौशिक 'नूतन '

शनिवार, 23 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-चार]


उम्मीद के विपरीत माँ ने दिल कड़ा कर सब सह लिया .साहिल विस्मित था पर गौरवान्वित भी ऐसी माँ को पाकर .माँ ने न केवल खुद को सम्भाला बल्कि साहिल व् प्रिया को भी .माँ का दिया सम्बल ही था जो साहिल डैडी के सब अंतिम संस्कार संयमित होकर करता गया वरना न जिस्म में ताकत रही थी और न मन में कोई उमंग जीवन के प्रति . इस हादसे के बाद साहिल माँ व् प्रिया को अकेला छोड़कर विदेश नहीं जाना चाहता था पर सुरक्षा कारणों से उसे फिर जाना पड़ा .माँ व् प्रिया को लेकर जब भी वो भावुक हो जाता हिलेरी उसे ढांढस बंधाती. डैडी के बारे में बात करता हुआ तो वो तड़प ही उठता था तब हिलेरी उसका ध्यान किसी और तरफ ले जाती .ऐसी फ्रेंड हिलेरी की सलाह को टालना साहिल के लिए सबसे कठिन काम था पर राजनीति में आने की प्रेरणा उसे माँ से मिली थी .सत्ता को जहर मानती आई माँ ने जब देखा कि दादी व् डैडी के खून-पसीने से सींची गयी पार्टी साम्प्रदायिक पार्टियों के आगे झुकने लगी है तब उन्होंने पार्टी की कमान अपने हाथ में ली और राजनीति में एक नए दौर की शरुआत हुई . जनता ने भी माँ की मेहनत व् नीयत को समझा .'' बेटी विदेश की है तो क्या बहू तो हिंदुस्तान की है .'' कहकर भारतीय जनता ने अपना दो सौ प्रतिशत स्नेह माँ पर न्योछावर कर दिया .माँ ने भी तो जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए दिन-रात एक कर दिए . जनता के इसी प्यार ने साहिल को भी भारत वापस बुला लिया .माँ के संसदीय क्षेत्र का दौरा करते समय जब एक नौ वर्षीय बालक ने साहिल का हाथ पकड़कर पूछा था -'' भैय्या जी मेरे पिता जी का सपना है कि मैं खूब पढूं इसलिए मैं दस किलोमीटर पैदल चलकर जाता हूँ .क्या आप अपने पिता जी के अधूरे सपने पूरे नहीं करेंगें ?'' उसी क्षण साहिल ने राजनीति में सक्रिय होने का अंतिम निर्णय ले लिया था .साहिल ने मन ही मन कहा -'' हिलेरी तुमने एक प्रतिशत उम्मीद भी गलत ही की है .अब मैं पूर्ण ह्रदय से जनता को समर्पित हूँ .मेरी पूँजी है ''जनता का विश्वास'' जिसे मैं कभी नहीं लुटा सकता और रही बात विपक्षियों के घिनौने आरोपों की तो जिस दिन राजनीति में आया था उसी दिन इस दिल को वज्र कर लिया था .हिलेरी तुम दादी की हत्या और डैडी की हत्या की बात करके मुझे मेरे लक्ष्य से नहीं भटका सकती हो .मैं जान चूका हूँ कि डैडी के सपने मैं राजनीति में रहकर ही पूरे कर सकता हूँ क्योंकि जनसेवा का सर्वोत्तम माध्यम राजनीति ही है .मैं तुम्हारे मेल का जवाब कभी नहीं दूंगा ...कभी नहीं !!!!!!'' ये सोचते हुए साहिल ने कुर्ते की जेब में पड़े पर्स को निकाला और उसमें लगी डैडी की फोटो को चूम लिया .
समाप्त
शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-तीन]


मेल की आखिरी चार लाइन साहिल ने दस बार पढ़ी और विंडो को शट डाउन कर दिया .साहिल ने एक निगाह मेज पर पड़े जनता के प्रार्थना पत्रों पर डाली और फिर ऊपर छत के पंखे पर .' हिलेरी जैसी फ्रेंड साहिल के लिए और कोई नहीं हो सकती ' ये वो पिछले बीस साल से जानता है पर जब राजनीति या फ्रेंड चुनने की बात आई तब साहिल ने राजनीति को चुना .साहिल अच्छी तरह जानता था कि राजनीति में आने के निर्णय से हिलेरी के साथ उसकी फ्रेंडशिप टूट जायेगी पर राजनीति ही वो जगह है जिसमे सक्रिय होकर वो अपने डैडी को ज़िंदा महसूस कर पाता है . दादी की हत्या के बाद सहमे हुए माँ ,साहिल और प्रिया को डैडी ने ही फिर से हँसना सिखाया था .कितना घबरा गया था साहिल एक बार लॉन में खेलती हुई प्रिया की ओर राइफल लेकर जाते हुए सिक्योरिटी पर्सन को देखकर .साहिल चिल्लाता हुआ दौड़ा था उस ओर -'' डोंट किल माई सिस्टर !!!'' डैडी भी चौदह वर्षीय किशोर साहिल की चीख सुनकर अपने रूम से दौड़कर वहाँ पहुँच गए थे और आँखों ही आँखों में सिक्योरिटी पर्सन को वहाँ से जाने का इशारा किया था .साहिल डैडी से लिपट कर बहुत देर तक रोता रहा था .एक हादसा बच्चे के दिमाग पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ जाता है ये डैडी अच्छी तरह जानते थे . साहिल व् प्रिया की पांच साल तक शिक्षा घर पर ही हुई क्योंकि साहिल के पूरे परिवार को मार डालने की धमकियाँ रोज़ आतंकवादी संगठनों की ओर से रोज़ दी जा रही थी .पांच साल बाद साहिल को विदेश पढ़ने भेज दिया गया .इसी दौरान उसकी दोस्ती हिलेरी से हुई .कॉलेज कैम्पस में एक दिन मस्ती करते हुए सब दोस्तों के साथ साहिल ये योजना बना ही रहा था कि इस बार भारत लौटने पर डैडी के साथ क्या-क्या शेयर करेगा ,उन्हें यहाँ के बारे में ये बतायेगा ...वो बतायेगा ...'' तभी अचानक सुरक्षा कारणों से साहिल को तुरंत अति सुरक्षित जगह पर ले जाया गया और वहाँ वार्डन सर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीमे स्वर में कहा -'' योर फादर इज मोर .....उनकी हत्या कर दी गयी है .'' इक्कीस वर्षीय साहिल के दिल को चीरते हुए निकल गए थे ये शब्द .उसके मुंह से बस इतना निकला था -'' इज दिस ट्रू ? '' और वार्डन सरके ''यस'' कहते ही उसकी आँखों के सामने डैडी का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम गया था और कान में उनके अंतिम शब्द '' कम सून ...'' साथ ही दिखाई दिया था माँ का चेहरा और साहिल ने तुरंत माँ से बात कराये जाने का आग्रह किया था .फोन पर संपर्क सधते ही साहिल माँ से बस इतना कह पाया था -'' माँ मैं आ रहा हूँ ...टूटना मत .'' जबकि साहिल खुद टूट कर चूर चूर हो गया था .जिन संस्मरणों को डैडी के साथ शेयर करने की प्लानिंग कुछ देर पहले वो कर रहा था उनके चीथड़े चीथड़े उड गए थे बिलकुल डैडी के बम विस्फोट में उड़े शरीर की तरह .साहिल की सिक्योरिटी इतनी कड़ी कर दी गयी थी कि हिलेरी भी ऐसे वक्त में उससे मिल नहीं पाई थी .विशेष विमान से साहिल को भारत लाया गया था और एयर पोर्ट पर खड़ी प्रिया साहिल को देखते ही उसकी ओर दौड़कर जाकर लिपट गयी थी उससे .घंटों से आँखों में रोके हुए अपने आंसुओं के सैलाब को रोक नहीं पायी थी वो .प्रिया की आँखों में आंसूं देखकर साहिल के दिल में दर्द की लहर दौड़ पड़ी थी पर उसने बड़े भाई होने का कर्तव्य निभाते हुए प्रिया को सम्भाला था .साहिल को इस वक्त केवल माँ की चिंता थी .उस माँ की जो उसके डैडी के लिए अपना घर ,देश ,संस्कृति छोड़कर भारतीयता के रंग में रंग गयी थी .जिसने अच्छी बहू ,अच्छी पत्नी व् अच्छी माँ होने की परीक्षाएं उत्तम अंकों में पास की थी .जो डैडी के हल्का सा बुखार होने पर सारी रात जगती रहती थी ...वो माँ डैडी के बिना कैसे रह पायेगी ? यही एक प्रश्न साहिल के दिल व् दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए था .
[जारी है ...]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा- -ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-दो ]


जींस के ऊपर पहने सूती कुर्ते की जेब में मेज से उठाकर मोबाइल डाला और शॉल इस तरह लपेटा कि केवल नाक के ऊपर का चेहरा दिखाई दे रहा था .''चलो आज रात का भोजन मैं तुम्हारे घर ही करूंगा .'' साहिल के ये कहते ही सुरेश के आश्चर्य की सीमा न रही .वो साहिल के पीछे पीछे कमरे से बाहर आ गया . साहिल के कमरे से बाहर आते ही एस.पी.जी. के कमांडों सतर्क हो गए और साहिल के निजी सचिव चंद्रा जी भी अपने कमरे से निकल कर तेजी से वहाँ पहुँच गए .साहिल ने चेहरे से शॉल हटाते हुए कहा -'' रिलेक्स एवरीवन ...मैं एक घंटे में लौट आउंगा .'' साहिल से असहमत होते हुए तभी वहाँ पहुंचे सिक्योरिटी ऑफिसर बोले -'' बट वी कांट एलाउ यू टू गो एलोन सर .'' साहिल उन्हें आश्वस्त करता हुआ बोला -'' ऑल राइट ...यू मस्ट डू योर ड्यूटी ...पर ध्यान रहे किसी को कोई परेशानी न हो .'' ये कहकर साहिल अपनी गाड़ी से न जाकर सुरेश की बाइक पर ही उसके पीछे बैठकर उसके घर के लिए रवाना हो लिया पर शॉल से अपना चेहरा ढकना न भूला .सुरेश के घर पर साहिल का जो स्वागत हुआ उसने साहिल का दिल जीत लिया .सुरेश के माता पिता ने साहिल को उसकी दादी ,डैडी से सम्बंधित संस्मरण सुनाये तो जैसे साहिल वापस अपने उसी बचपन में पहुँच गया जब वो डैडी के साथ यहाँ आकर धूम मचाया करता था .सुरेश के माता-पिता साहिल की दादी व् डैडी की हत्या का जिक्र करते समय फफक -फफक कर रो पड़े . साहिल की आँखें भी भर आयी .सुरेश की माता जी ने साहिल के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा तो साहिल को लगा जैसे दिल्ली से माँ यही आ गयी हो .''सच माँ का स्पर्श एक सा ही होता है वो चाहे मेरी माँ हो या किसी और की '' साहिल ने मन में सोचा .सुरेश की पत्नी खाना परोस लाइ तब सबने नीचे बैठकर एक साथ भोजन किया .आज साहिल के पेट की भूख ही नहीं बल्कि आत्मा भी तृप्त हो गयी .सुरेश के घर से सबको प्रणाम कर व् फिर आने का वादा कर साहिल जब डाकबंगले की ओर रवाना हुआ तब उसके मन में एक सुकून था कि उसने दशकों पहले गांधी जी द्वारा चलाये गए छुआछूत विरोधी अभियान में एक बूँद बराबर ही सही पर योगदान तो किया .
डाकबंगले पर अपने कमरे में साहिल जब लौटा तब रात के नौ बजने आ गए थे .शॉल बैड पर फेंककर ,मोबाइल कुर्ते की जेब से निकालकर मेज पर रख साहिल फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया .इधर उधर नज़र दौड़ाई तो बाथ सोप कहीं नज़र नहीं आया .एक बात याद कर साहिल के होंठो पर मुस्कान आ गयी और उसने मन में सोचा -'' लो भाई यहाँ तो साबुन का एक टुकड़ा तक नहीं और लोग कहते हैं मैं दलित के घर से लौटकर विशेष साबुन से नहाता हूँ !!!'' केवल पानी से मुंह धोकर आईने में अपना चेहरा देखते समय साहिल के कानों में सुरेश की पत्नी के एक बात उसके कानों में गूंजने लगी -'' भैय्या जी अब तो भौजी ले आइये !'' यूं सार्वजानिक रूप से चालीस की उम्र पार कर चुके साहिल को ये बातें अच्छी नहीं लगती थी पर सुरेश की पत्नी के कहने में एक अपनापन था बिल्कुल प्रिया जैसा .प्रिया भी बहुत बार टोक चुकी थी और माँ तो इस मुद्दे पर साहिल से कुछ कहना ही नहीं चाहती थी क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं अपने साहिल को . तौलिया से मुंह पोछते हुए साहिल वापस कमरे में आया और बिखरे बालों को बिना संवारे ही अपना लैपटॉप लेकर बैड पर बैठ गया .मेल खुलते ही इनबॉक्स में ''हिलेरी' का मेल देखते ही वो सुखद आश्चर्य में पड़ गया .'नौ साल बाद आज अचानक हिलेरी का मेल ' साहिल को यकीन ही नहीं हुआ .मेरा मेल मिला कहाँ से हिलेरी को ?ये सोचते हुए उसने वो मेल खोल लिया .स्पैनिश भाषा में लिखा व् अंग्रेजी में अनुवादित उस मेल का सारांश कुछ यूँ था -'' मन की बात अपनी भाषा में ही लिखी जाती है इसलिए स्पैनिश में लिख रही हूँ और मुझे पूरा यकीन हैं कि मेरे साथ रहते हुए जो स्पैनिश शब्द तुम सीख गए थे अब वे भी भूल गए होगे इसलिए नीचे इसका अनुवाद अंग्रेजी में कर दिया है .साहिल .....मुबारक हो रेप के आरोप से अदालत द्वारा बरी किये जाना .मैं ऐसे ही घिनौने आरोपों से तुम्हे बचाने के लिए राजनीति में न आने की सलाह दिया करती थी .मैं जानती हूँ कि तुम रेप जैसे घिनौने अपराध को करने की सोच भी नहीं सकते .साहिल राजनीति तुम जैसे भोले-भाले लोगों के लिए नहीं है .तुम्हारी दादी को उनके ही अंगरक्षकों ने गोलियों से भून डाला और तुम्हारे डैडी को कितनी क्रूरता से बम-विस्फोट में उड़ा दिया गया ....फिर भी तुम्हारी मॉम राजनीति में आयी और फिर तुम भी !!! तुम्हारे डैडी की हत्या पर तुम्हे तड़पते हुए मैंने देखा है .आज मैं सुकून से कह सकती हूँ कि मैंने तुम्हे सही सलाह दी थी ...विपक्षियों की गन्दी सोच 'रेप' तक जा पहुँचती है और तुम जैसा शालीन व्यक्ति अपने को पाक-साफ़ घोषित करने के लिए अदालतों का चक्कर लगाता है .तुम ये सब कैसे झेलते हो मुझे आश्चर्य होता है !!...यदि अब भी एक प्रतिशत भी तुम राजनीति छोड़कर यहाँ वेनेजुएला आने के बारे में सोचने को तैयार हो तभी इस मेल का जवाब देना ....तुम्हारा मेल तुम्हारी ऑफिशियल वेबसाइट से लिया है ......अलविदा ''
[जारी है ]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा-ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-एक]


शाम ढलने लगी थी .आधा नवम्बर बीत  चुका था .सुहानी हवाओं में बर्फ की ठंडक घुलने लगी थी .शॉल ओढ़कर साहिल खिड़की से बाहर के नज़ारों को देखने लगा .डैडी के साथ कितनी ही बार उनके  इस संसदीय क्षेत्र से सांसद रहते हुए साहिल ने इसी सरकारी डाकबंगले की खिड़की से रोमांचित होकर ये नज़ारे देखे थे .दूर दूर तक हरियाली ही हरियाली और उस पर संध्या की श्यामल चुनरी की छाया . साहिल की आँखों में एक सूनापन थोड़ी नमी के साथ उतर आया .ऐसा सूनापन साहिल ने पहली बार अपने डैडी की आँखों में तब देखा था जब दादी के अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी थी और डैडी के दादी की चिता को मुखाग्नि देने के बाद साहिल रोते हुए डैडी से लिपट गया था .चौदह साल के साहिल ने डैडी की आँखों में जो सूनापन उस समय देखा था वो ही उसके दिल में उतर गया था और जब तब उसकी आँखों में भी उतर आता है .साहिल ने आँखों में आयी नमी को शॉल के एक कोने से पोंछा और सरकारी डाकबंगले के उस कमरे में खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया .वही दीवार से सटी मेज पर फैले हुए कागजों को एकत्रित कर सलीके से क्रम में लगाया .ये कागज इस संसदीय क्षेत्र के दौरे के दौरान जनता द्वारा अपने सांसद साहिल को अपनी समस्याओं के समाधान हेतु दिए गए प्रार्थना पत्र थे .साहिल ने समस्याओं की गम्भीरता के आधार पर उनका ऊपर-नीचे का क्रम निर्धारित किया और मेज पर रखे अपने मोबाइल में आये मैसेज चैक किये .दो मैसेज छोटी बहन प्रिया के व् एक माँ का था .साहिल जानता है कि माँ व् बहन दोनों को ही हर पल उसकी चिंता लगी रहती है .साहिल ने दोनों को ही ''आई एम् ओ.के. एंड फाइन '' का मैसेज किया और दीवार पर लगी घडी से टाइम देखा .सात बजने आ गए थे .संध्या की श्यमल चुनरी अब रात की काली चादर बनकर खिड़की के दिखने वाले सारे नज़ारों को पूरी तरह ढक चुकी थी .साहिल ने कुर्सी से खड़े होते हुए खिड़की के किवाड़ बंद करने को ज्यों ही हाथ बढ़ाया तभी उसके कमरे के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी .साहिल खिड़की बंद करता हुआ ही बोला -'' कम इन प्लीज़ '' .ये डाक बंगले का ही कर्मचारी था .उसने आते ही साहिल को टोकते हुए रोका -'' अरे भैय्या जी ...आप रहने दीजिये ..हम बंद कर देंगें .'' साहिल मुस्कुराता हुआ बोला -''लो हो भी गई बंद ..!!'' साहिल के पास पहुँचते ही वो कर्मचारी साहिल के चरण-स्पर्श के लिए झुका .साहिल ने उसके कंधे पकड़ते हुए उसे रोका और बोला -'' अरे ये क्या करते हो भाई ?'' वह कर्मचारी गदगद होता हुआ बोला -'' नहीं भैया जी रोकिये मत पर आप हमें मत छुइये ...हम चमार हैं ..आप नहीं जानते बड़ी जात के लोग भले ही मुसलमान से अपने दुधारू पशुओं का दूध निकलवा लें पर हमसे परहेज़ करते हैं ...और तो और अपने बच्चों से कहते हैं भले ही किसी भी जात की लड़की से प्रेम ब्याह कर लेना पर चमार से नहीं ...और आप भैय्या जी हमें हाथ लगाते हैं !!!'' साहिल के चेहरे की मुस्कराहट क्षोभ में पलट गयी पर वो खुद के भावों को नियंत्रित करता हुआ बोला -'' छोडो ये सब ..क्या नाम है तुम्हारा ..नई नियुक्ति हो शायद ?'' साहिल के इस प्रश्न पर वो कर्मचारी विनम्रता के साथ उत्तर देता हुआ बोला -'' हां भैय्या जी ...आपके ही संसदीय क्षेत्र का हूँ ...सुरेश नाम है हमारा ..भैय्या जी आपके दर्शन करके आज हमारा जन्म सफल होई गया .'' साहिल के चेहरे पर मुस्कराहट वापस आ गयी और वो चुटीले अंदाज़ में बोला -'' तुम्हारा जन्म तो सफल हो गया पर मेरा कैसे होगा !! एक बात बताओ तुम्हारे घर रात का भोजन तैयार हो गया होगा ?'' सुरेश बोला -''हां भैय्या जी ..पर आप ये क्यूँ पूछते हैं ..कही ...'' साहिल उसकी बात पूरी करता हुआ बोला '' हाँ ..बिलकुल सही ...'' साहिल ने बैड के पास पड़ी अपनी चप्पलें पहनी .
[जारी है ...]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा-ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

सोमवार, 18 नवंबर 2013

मैनेज-लघु कथा


सुजीत ने रिंगटोन बजते ही जेब से मोबाइल निकाला और बटन दबाकर कॉल रिसीव करता हुआ बोला - '' माँ ...प्रणाम ...ठीक तो हो ?...पिता जी कैसे हैं ?'' माँ घबराई हुई सी आवाज़ में बोली -'' बेटा मैं तो ठीक हूँ पर तेरे पिता जी की तबियत काफी ख़राब है .तुम यहाँ आ जाते तो सहारा हो जाता . वैसे तो इलाज चल ही रहा है .'' सुजीत बहाना बनाता हुआ बोला -'' माँ तुम जानती हो ना मेरी जॉब के बारे में ...साँस लेने तक की फुर्सत नहीं है और तुम्हारी बहू नेहा भी नौकरी के चक्कर में बहुत व्यस्त रहती है . बिल्कुल टाइम नहीं मिलता उसको .आप प्लीज़ खुद ही मैनेज कर लो माँ ....और हां आपका पोता चिंटू क्लास में फर्स्ट पोजिशन लाया है ...पिता जी को बताना वो बहुत खुश होंगे .'' माँ थोड़े मायूस स्वर में बोली -'' नहीं आ सकते तो कोई बात नहीं ...मैं मैनेज कर लूंगी वैसे भी पिछले आठ साल से ....शादी के बाद से तुम ज्यादा ही व्यस्त हो गए हो .'' इस वार्तालाप के एक माह बाद सुजीत के मोबाइल पर फिर से माँ की कॉल आयी .सुजीत अनमने भाव से रिसीव करता हुआ बोला -'' प्रणाम माँ ....क्या बताऊँ यहाँ मैं बहुत परेशान हूँ ....पंद्रह दिन से चिंटू बीमार है .अच्छे से अच्छा इलाज करवा रहा हूँ पर तबियत अभी तक भी पूरी तरह ठीक होने में नहीं आयी है .'' माँ चिंतित स्वर में बोली -'' बेटा चिंता मत करो ...अब तुम्हारे पिता जी की तबियत काफी ठीक है ..तुमने तो पलटकर फोन करके पूछा भी नहीं ...चलो कोई बात नहीं ...तुम दोनों पर टाइम ही नहीं तो चिंटू की देखभाल क्या करोगे ...मैं और तुम्हारे पिता जी आ जाते हैं कुछ दिन के लिए वहाँ ...'' माँ की ये बात सुनकर सुजीत हड़बड़ाता हुआ बोला -'' माँ आप रहने दो क्यों चक्कर में पड़ती हो ...मैं और नेहा मैनेज कर लेंगें .'' ये कहकर सुजीत ने फोन काट दिया .
शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 16 नवंबर 2013

विश्वास-लघु कथा

रिया और राहुल को आपस में घुल मिलकर कॉलेज कैंटीन में बातें करते देखकर रॉकी के दिल में आग लग गयी और वो फुंकता हुआ रिया के पास पहुंचा .राहुल के प्रति उपेक्षा दिखाता हुआ रॉकी रिया से मुखातिब होते हुए बोला - '' मुझे रिजेक्ट कर इस मिडिल क्लास के साथ दोस्ती की है तुमने .एक्सप्लेन मी व्हाई ?'' रिया रॉकी की ओर देखते हुए बोली -'' रॉकी महगे गिफ्ट्स देकर किसी का दिल नहीं जीता जाता है .तुम्हे याद है एक समय था जब तुम मेरे बेस्ट फ्रेंड थे पर तुम्हारी एक आदत ने मुझे तुमसे दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया और वो है इंसान को सामान मानने की तुम्हारी गन्दी आदत .एक दिन ऐसे ही राहुल के साथ मुझे बातें करते देखकर राहुल के जाने के बाद एक घंटे तक तुमने मेरा दिमाग खा डाला था जैसे मैं कोई सामान हूँ और राहुल तुमसे छिपकर मुझे उठाकर ले जायेगा ...इतनी असुरक्षा का भाव दो फ्रेंड्स के बीच !.....पर राहुल ने मुझसे कभी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पूछा .यहाँ तक कि ये भी नहीं कि तुम्हारी व् मेरी दोस्ती क्यों टूट गयी क्योंकि उसे मुझ पर विश्वास है कि मैं एक अच्छी फ्रेंड के रूप में उसे कभी धोखा नहीं दूँगी .उसने कभी कोई चुभता हुआ प्रश्न नहीं पूछा ....हम दोनों में आपसी विश्वास है ...हम अच्छे फ्रेंड हैं !'' रॉकी रिया की बाते सुनकर आसमान में देखने लगा और खिसियाता हुआ बोला -'' ऑल राइट ..एन्जॉय योर फ्रेंडशिप !!''
शिखा कौशिक 'नूतन'