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गुरुवार, 28 नवंबर 2013

तू केवल इंसान -लघु कथा


रविवार का दिन था .पुष्कर दफ्तर के काम की कुछ फाइले बैड पर फैलाकर अपने काम में व्यस्त था तभी उसका पांच वर्षीय बेटा मिटठू बाहर से रोता हुआ आया और बैड पर चढ़कर उससे लिपट गया . पुष्कर ने अपना काम छोड़कर स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा -'' अरे क्या हुआ मिटठू बाबू जी .......आप तो खेलने गए थे बाहर !'' मिटठू अपनी नन्ही नन्ही उँगलियों से पुष्कर के दोनों कान पकड़ता हुआ बोला - '' पप्पा क्या मैं मनहूस हूँ ?'' मनहूस शब्द इतने छोटे बच्चे के मुंह से सुनकर पुष्कर आवाक रह गया . पुष्कर उसकी उँगलियों से कान छुड़ाता हुआ बोला -'' क्या कर रहे हो ? किसी ने कुछ कहा तुमसे ? '' मिटठू सुबकता हुआ बोला -'' हाँ ! वो रानी हैं ना ... ..मोटी कहीं की ...उसने कहा कि ''तुम हमारे साथ नहीं खेल सकते मेरी मम्मी कहती है कि तुम मनहूस हो ..तुम्हे जन्म देते ही तुम्हारी मम्मी मर गयी .'' ये बताता बताता मिटठू दहाड़े मारकर रोने लगा .पुष्कर उसे चुप कराता हुआ बोला -'' नहीं बेटा तू मनहूस नहीं है .मनहूस तो वे हिन्दू-मुस्लिम झगडे थे जिसके कारण शहर में कर्फ्यू लगा और मैं तुम्हारी मम्मी को समय से हॉस्पिटल न ले जा पाया .'' पुष्कर की बात पर मिटठू ने तुरंत प्रश्न पूछ डाला -'' पप्पा ये दंगे क्या होते हैं ....पप्पा मैं हिन्दू हूँ या मुस्लिम ?'' पुष्कर उसके इस प्रश्न पर उसके सिर पर हल्की सी चपत लगाता हुआ बोला -'' ये जो तू लड़कर आता है न अपने दोस्तों से ये ही दंगे होते हैं और तू न हिन्दू है और न ही मुस्लिम ..तू केवल इंसान है ...कुछ समझा .'' पुष्कर मिटठू को ये समझा ही रहा था कि गली के कई बच्चे शोर मचाते हुए वहीं आ पहुंचे .उनमें से एक गोल-मटोल प्यारी सी बच्ची आगे आयी और अपने कान पकड़ते हुए बोली -'' सॉरी मिटठू ..चलो बाहर चलकर खेलते हैं .'' उसकी सॉरी सुनते ही मिटठू ने पुष्कर की ओर देखा और उस बच्ची को धमकाता हुआ बोला -'' सॉरी की बच्ची रानी ..तुझे अभी सबक सिखाता हूँ .'' ये कहकर मिटठू बैड से कूदा और सारे बच्चे धूम मचाते हुए बाहर की ओर भाग गए .पुष्कर के दिल में आया -'' काश हमारे दिल भी बच्चों की तरह साफ़ होते तो न कभी मज़हबी दंगे होते और न मिटठू की तरह किसी बच्चे को अपनी माँ की ममता से महरूम होना पड़ता !''
शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कलियुग की जानकी -कहानी

Beautiful Indian girl in traditional Indian sari. - stock photo
कलियुग की जानकी -कहानी
''अजी सुनते हैं ...जरा अन्दर तो आइये जल्दी से ...!'' दबी जुबान में घबराई सुमित्रा ने स्वागत कक्ष में लड़के वालों की मेहमान नवाज़ी में जुटे अपने पतिदेव नरेन्द्र बाबू को बुलाया तो वे लड़केवालों से हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए ''अभी आता हूँ लौटकर ...आप नाश्ता कीजिये प्लीज '' ये कहकर मन ही मन खीजते हुए शयन कक्ष की ओर चल दिए .शयन कक्ष में पहुँचते ही वे सुमित्रा पर बिफर पड़े -''कमाल करती हो ...जानती हो ना बाहर कौन लोग आये हैं और ....और जानकी कहाँ है ?...तैयार नहीं हुई वो अब तक ?'' इससे आगे वे कुछ पूछते सुमित्रा ने भिंची मुट्ठी खोलकर एक मुसा हुआ कागज का टुकड़ा उनकी ओर बढ़ा दिया .नरेन्द्र बाबू आँखों से धमकाते हुए बोले -'' ये क्या है ? ...कर क्या रही हो तुम ?'' इस बार सुमित्रा का धीरज जवाब दे गया .वो दांत पीसते हुए बोली -'' मैं कुछ नहीं कर रही ! आपकी लाडली ही मुंह काला कर भाग गयी है और दो छूट जवान लड़की को ...लो पढो !'' इस बार नरेन्द्र बाबू आवाक रह गए .सुमित्रा के हाथ से कागज का टुकड़ा छीनकर एक एक शब्द ध्यान से पढने लगे .लिखा था -'' पापा मुझे ये शादी नहीं करनी .मैं जा रही हूँ .'' जानकी की लिखाई पहचानते थे वे .नरेन्द्र बाबू के पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी .जानकी ऐसा कर सकती है विश्वास नहीं हुआ पर प्रत्यक्ष प्रमाण ठेंगा दिखा रहा था मुंह चिढ़ा चिढ़ाकर .नरेन्द्र बाबू को लगा मानों इसी क्षण से वे दुनिया के सबसे कंगाल व्यक्ति हो गए हैं .जिस बेटी पर नाज़ था वो ऐसा धोखा देगी कभी कल्पना भी नहीं की थी .ये सच था कि समृद्ध परिवार के अमेरिका में बसे लड़के का रिश्ता आते ही उन्होंने जानकी की इच्छा जाने बिना ही रिश्ता तय करने का मन बना लिया था और जानकी को दुनियादारी की दुहाई देकर अंधी-मूक-बधिर बन जाने हेतु विवश कर दिया था लेकिन ये सब जानकी का हित सोचकर ही किया था पर जानकी ने सब के मुंह पर कालिख पोत दी . नरेन्द्र बाबू ने आंसू बहाती सुमित्रा के कंधे पर हाथ रखा और दिल कड़ा कर स्वागत कक्ष की ओर चल दिए .लड़के वाले कुछ व्यग्र नज़र आ रहे थे .नरेन्द्र बाबू ने हाथ जोड़ते हुए कहा -'' क्षमा चाहता हूँ ...पर आज रिश्ते की बात आगे न बढ़ पायेगी .बिटिया की तबियत अचानक ख़राब हो गयी ...आप लोगों को कष्ट हुआ इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ !'' उनके विनम्र निवेदन करने पर लड़के की माँ भड़कते हुए बोली -'' भाईसाहब ऐसी भी क्या तबियत ख़राब हो गयी ...मजाक थोड़े ही है ...हमने अपने बेटे को इसीलिए इंडिया बुलाया था कि एक बार लड़का -लड़की आपस में मिल लें ..पर आप तो हमें लाखों का चूना लगा रहे हैं .अमेरिका से यहाँ तक का किराया कितना लगता है ...जानते तो होंगे आप .....बहाने मत बनाइये सच क्या है बतला दीजिये .आपकी लड़की जैसी हजारों पड़ी है शहर में ...वो तो मेरे बेटे को उसका फोटो 'मैरिज डॉट कॉम' पर पसंद आ गया वरना हम अपनी हैसियत से इतना गिरकर शादी करने को कतई तैयार नहीं थे .आप भी कुछ बोलिए ना !'' ये कहते हुए लड़के की माँ ने लड़के के दुबले-पतले बाप को कोहनी मारी.लड़के के पिता सोफे पर से खड़े होते हुए बोले -''नरेन्द्र बाबू ..मुझे लगता है आपकी बेटी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं है .सच में आजकल लड़कियां कुछ ज्यादा ही बिगड़ गयी हैं .अपनी मर्जी से पहनना ,घूमना-फिरना ,शादी और भी न जाने क्या क्या !!'' वे इससे आगे कुछ कहते तभी नरेन्द्र बाबू का चेहरा सख्त हो गया .नरेन्द्र बाबू रूखे स्वर में बोले -'' देखिये मैं पहले ही आपको जो असुविधा हुई है उसके लिए खेद प्रकट कर चुका हूँ .आपके बेटे के आने-जाने का जो खर्च हुआ हो वो भी मैं चुका देता हूँ ...प्लीज अब आगे कुछ मत कहियेगा !'' नरेन्द्र बाबू के ये कहते ही लड़का थोडा अकड़ता हुआ बोला -'' अंकल यूं नो माई टाइम इज वैरी पिरिशियस ...वो तो मॉम -डैड ने प्रेशर डाला था ...मिडिल क्लास लड़की से तो मैं बात भी नहीं करता ...मैरिज तो ....और हां कहाँ है वो ...कहीं भाग तो नहीं ?'' लड़के के ये कहते ही नरेन्द्र बाबू का हाथ उसे थप्पड़ मारने के लिए उठ गया पर तभी डोर बैल बज उठी .नरेन्द्र बाबू के पीछे खड़ी सुमित्रा तुरंत किवाड़ खोलने के लिए उधर बढ़ ली .किवाड़ खोलते ही उसके आश्चर्य की सीमा न रही .उसके मुंह से अनायास ही निकल पड़ा -'' जानकी तू !!!'' जानकी ने माँ के कंधे पर हाथ रखा और नरेन्द्र बाबू के पास पहुंचकर दूल्हा बनने आये लड़के वालों को संबोधित करते हुए बोली -'' ....मिस्टर फ्रॉड ये देखो मेरे हाथ में हैं तुम्हारे सारे अपराधों से सम्बंधित सबूत ....अमेरिका से आये हो .....ऑटो पकड़कर !!!......और मिडिल क्लास लडकी से बात भी नहीं करते .....किराये की खोली में रहने वाले !!!बाबू जी आप तो इनकी चमक-दमक में खो गए पर मैंने इंटरनेट पर सर्च किया तो जिस कम्पनी में ये अपने को सी.ई.ओ. बता रहा था वो तो कब की दिवालिया घोषित की जा चुकी है और जो टाइम इसने यहाँ इंडिया में अपनी फ्लाईट आने का बताया था उस टाइम पर तो अमेरिका क्या भूटान तक की फ्लाईट नहीं आती .अपनी सहेली प्रिया के पुलिस अंकल की मदद से इसका कच्चा-चिटठा खोजा तो ये जनाब दो दो शादी कर उनको धोखा देने के अपराधी निकले .....ये आप को ज़लील कर रहे थे अब देखिएगा इनका बैंड कैसे बजता है ? '' ये सुनते ही वे तीनों भागने के लिए ज्यों ही गेट की ओर बढे तभी एक अधेड़ महिला ने बाहर से आकर उनका रास्ता रोक दिया और बोली -'' दूल्हे राजा कहाँ भागते हो ? हम गरीबों को लूटकर चैन न पड़ा जो एक और लड़की की जिंदगी बर्बाद करने चले थे .'' इतना कहकर उसने पैरो की चप्पल निकाल ली .वो लड़के के सिर पर चप्पल जड़ने ही वाली थी कि पुलिस की जीप आ पहुंची .पुलिस उन तीनों को लेकर जब वहां से चली गयी तब नरेन्द्र बाबू जानकी के सिर पर हाथ रखते हुए बोले -जानकी तूने कलियुग में भी अपने पिता की लाज रख ली . तूने अपना नाम सार्थक कर दिया .मुझे माफ़ कर दे !'' ये कहते कहते उनका गला भर आया .जानकी ने उनकी हथेली अपनी हथेली में कसते हुए और पास खड़ी माँ को बांहों में लेते हुए कहा -'' बस अब कोई राम ही ढूंढना मेरे लिए .'' जानकी की बात सुनकर नरेन्द्र बाबू और सुमित्रा दोनों हो मुस्कुरा दिए !
शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 25 नवंबर 2013

कोई तो कमी है !!-लघु कथा

मधुकर बाबू के घर आज चहल-पहल थी .देवउठान एकादशी को ही उनकी पच्चीस वर्षीय विधवा बिटिया रिया का पुनर्विवाह होने जा रहा था .विवाह-स्थल पर सादगी से विवाह-संस्कार पूरे किये जा रहे थे .एक ओर एकत्रित आस-पड़ोस की महिलाओं की मण्डली इस विवाह के सम्बन्ध में अपनी अपनी राय ज़ाहिर कर रही थी .सत्या बोली -''अरे मैं तो सोच रही थी कोई बड़ी उम्र का दूल्हा होगा ..भला विधवा से कोई कम उम्र का लड़का क्यूँ ब्याह करने लगा ? ..पर ये तो रिया के साथ का ही लग रहा है और सुदर्शन भी है .'' विभा सिर का पल्लू ठीक करते हुए बोली -'' ठीक कह रही हो भाभी जी ...रिया से पूछा था मैंने कि दुल्हे की भी दूसरी शादी है क्या ?...बाल बच्चे भी हैं क्या ?...तो बोली 'नहीं चाची जी ये इनकी पहली ही शादी है .'' सुरेखा मुंह बनती हुई बोली -'' हो न हो कोई कमी तो है इस लड़के में वरना एक विधवा से कोई कुंवारा क्यूँ ब्याह करने लगा भला ...सरकारी अधिकारी है बड़ा ..तेरे ताऊ बता रहे थे .'' सुशीला सुरेखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली -'' ताई जी ठीक कह रही हो कोई न कोई कमी तो जरूर है .'' उन मधुमक्खियों की घिन-घिन तब टूटी जब फेरे पूरे हो गए और मधुकर बाबू नवदम्पत्ति को आशीर्वाद देते हुए बोले -'' तुम दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे और बेटा तुमने जो भारतीय समाज की दकियानूसी सोच को दरकिनार कर मेरी विधवा बेटी के जीवन में फिर से खुशियां भरी हैं मैं इसके लिए तुम्हारा आभारी हूँ .'' दूल्हे राजा ने मधुकर बाबू के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा -'' मैंने कोई उपकार नहीं किया है .रिया मुझे मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनसंगिनी लगी इसीलिए मैंने उसका हाथ आपसे मांग लिया और मुझे पता है कि यहाँ उपस्थित लगभग सभी का यही मत होगा कि मुझमे कोई न कोई कमी जरूर है जो मैंने एक विधवा लड़की से विवाह का निश्चय किया .हाँ मुझमे बहुत बड़ी कमी है और वो है -मैं भारतीय समाज की दकियानूसी सोच के अनुसार नहीं चलता जो सोच ये कहती है कि एक विधवा लड़की को केवल बड़ी उम्र का ,विधुर पुरुष ही ब्याहकर ले जा सकता है .'' दूल्हे राजा की ये बातें सुन सत्या ,विभा,सुरेखा व् सुशीला एक दुसरे का मुंह ताकते हुए सोचने लगी -'' कहीं दूल्हे राजा ने हमारी बातें सुन तो नहीं ली ?''
शिखा कौशिक 'नूतन '

शनिवार, 23 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-चार]


उम्मीद के विपरीत माँ ने दिल कड़ा कर सब सह लिया .साहिल विस्मित था पर गौरवान्वित भी ऐसी माँ को पाकर .माँ ने न केवल खुद को सम्भाला बल्कि साहिल व् प्रिया को भी .माँ का दिया सम्बल ही था जो साहिल डैडी के सब अंतिम संस्कार संयमित होकर करता गया वरना न जिस्म में ताकत रही थी और न मन में कोई उमंग जीवन के प्रति . इस हादसे के बाद साहिल माँ व् प्रिया को अकेला छोड़कर विदेश नहीं जाना चाहता था पर सुरक्षा कारणों से उसे फिर जाना पड़ा .माँ व् प्रिया को लेकर जब भी वो भावुक हो जाता हिलेरी उसे ढांढस बंधाती. डैडी के बारे में बात करता हुआ तो वो तड़प ही उठता था तब हिलेरी उसका ध्यान किसी और तरफ ले जाती .ऐसी फ्रेंड हिलेरी की सलाह को टालना साहिल के लिए सबसे कठिन काम था पर राजनीति में आने की प्रेरणा उसे माँ से मिली थी .सत्ता को जहर मानती आई माँ ने जब देखा कि दादी व् डैडी के खून-पसीने से सींची गयी पार्टी साम्प्रदायिक पार्टियों के आगे झुकने लगी है तब उन्होंने पार्टी की कमान अपने हाथ में ली और राजनीति में एक नए दौर की शरुआत हुई . जनता ने भी माँ की मेहनत व् नीयत को समझा .'' बेटी विदेश की है तो क्या बहू तो हिंदुस्तान की है .'' कहकर भारतीय जनता ने अपना दो सौ प्रतिशत स्नेह माँ पर न्योछावर कर दिया .माँ ने भी तो जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने के लिए दिन-रात एक कर दिए . जनता के इसी प्यार ने साहिल को भी भारत वापस बुला लिया .माँ के संसदीय क्षेत्र का दौरा करते समय जब एक नौ वर्षीय बालक ने साहिल का हाथ पकड़कर पूछा था -'' भैय्या जी मेरे पिता जी का सपना है कि मैं खूब पढूं इसलिए मैं दस किलोमीटर पैदल चलकर जाता हूँ .क्या आप अपने पिता जी के अधूरे सपने पूरे नहीं करेंगें ?'' उसी क्षण साहिल ने राजनीति में सक्रिय होने का अंतिम निर्णय ले लिया था .साहिल ने मन ही मन कहा -'' हिलेरी तुमने एक प्रतिशत उम्मीद भी गलत ही की है .अब मैं पूर्ण ह्रदय से जनता को समर्पित हूँ .मेरी पूँजी है ''जनता का विश्वास'' जिसे मैं कभी नहीं लुटा सकता और रही बात विपक्षियों के घिनौने आरोपों की तो जिस दिन राजनीति में आया था उसी दिन इस दिल को वज्र कर लिया था .हिलेरी तुम दादी की हत्या और डैडी की हत्या की बात करके मुझे मेरे लक्ष्य से नहीं भटका सकती हो .मैं जान चूका हूँ कि डैडी के सपने मैं राजनीति में रहकर ही पूरे कर सकता हूँ क्योंकि जनसेवा का सर्वोत्तम माध्यम राजनीति ही है .मैं तुम्हारे मेल का जवाब कभी नहीं दूंगा ...कभी नहीं !!!!!!'' ये सोचते हुए साहिल ने कुर्ते की जेब में पड़े पर्स को निकाला और उसमें लगी डैडी की फोटो को चूम लिया .
समाप्त
शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-तीन]


मेल की आखिरी चार लाइन साहिल ने दस बार पढ़ी और विंडो को शट डाउन कर दिया .साहिल ने एक निगाह मेज पर पड़े जनता के प्रार्थना पत्रों पर डाली और फिर ऊपर छत के पंखे पर .' हिलेरी जैसी फ्रेंड साहिल के लिए और कोई नहीं हो सकती ' ये वो पिछले बीस साल से जानता है पर जब राजनीति या फ्रेंड चुनने की बात आई तब साहिल ने राजनीति को चुना .साहिल अच्छी तरह जानता था कि राजनीति में आने के निर्णय से हिलेरी के साथ उसकी फ्रेंडशिप टूट जायेगी पर राजनीति ही वो जगह है जिसमे सक्रिय होकर वो अपने डैडी को ज़िंदा महसूस कर पाता है . दादी की हत्या के बाद सहमे हुए माँ ,साहिल और प्रिया को डैडी ने ही फिर से हँसना सिखाया था .कितना घबरा गया था साहिल एक बार लॉन में खेलती हुई प्रिया की ओर राइफल लेकर जाते हुए सिक्योरिटी पर्सन को देखकर .साहिल चिल्लाता हुआ दौड़ा था उस ओर -'' डोंट किल माई सिस्टर !!!'' डैडी भी चौदह वर्षीय किशोर साहिल की चीख सुनकर अपने रूम से दौड़कर वहाँ पहुँच गए थे और आँखों ही आँखों में सिक्योरिटी पर्सन को वहाँ से जाने का इशारा किया था .साहिल डैडी से लिपट कर बहुत देर तक रोता रहा था .एक हादसा बच्चे के दिमाग पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ जाता है ये डैडी अच्छी तरह जानते थे . साहिल व् प्रिया की पांच साल तक शिक्षा घर पर ही हुई क्योंकि साहिल के पूरे परिवार को मार डालने की धमकियाँ रोज़ आतंकवादी संगठनों की ओर से रोज़ दी जा रही थी .पांच साल बाद साहिल को विदेश पढ़ने भेज दिया गया .इसी दौरान उसकी दोस्ती हिलेरी से हुई .कॉलेज कैम्पस में एक दिन मस्ती करते हुए सब दोस्तों के साथ साहिल ये योजना बना ही रहा था कि इस बार भारत लौटने पर डैडी के साथ क्या-क्या शेयर करेगा ,उन्हें यहाँ के बारे में ये बतायेगा ...वो बतायेगा ...'' तभी अचानक सुरक्षा कारणों से साहिल को तुरंत अति सुरक्षित जगह पर ले जाया गया और वहाँ वार्डन सर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए धीमे स्वर में कहा -'' योर फादर इज मोर .....उनकी हत्या कर दी गयी है .'' इक्कीस वर्षीय साहिल के दिल को चीरते हुए निकल गए थे ये शब्द .उसके मुंह से बस इतना निकला था -'' इज दिस ट्रू ? '' और वार्डन सरके ''यस'' कहते ही उसकी आँखों के सामने डैडी का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम गया था और कान में उनके अंतिम शब्द '' कम सून ...'' साथ ही दिखाई दिया था माँ का चेहरा और साहिल ने तुरंत माँ से बात कराये जाने का आग्रह किया था .फोन पर संपर्क सधते ही साहिल माँ से बस इतना कह पाया था -'' माँ मैं आ रहा हूँ ...टूटना मत .'' जबकि साहिल खुद टूट कर चूर चूर हो गया था .जिन संस्मरणों को डैडी के साथ शेयर करने की प्लानिंग कुछ देर पहले वो कर रहा था उनके चीथड़े चीथड़े उड गए थे बिलकुल डैडी के बम विस्फोट में उड़े शरीर की तरह .साहिल की सिक्योरिटी इतनी कड़ी कर दी गयी थी कि हिलेरी भी ऐसे वक्त में उससे मिल नहीं पाई थी .विशेष विमान से साहिल को भारत लाया गया था और एयर पोर्ट पर खड़ी प्रिया साहिल को देखते ही उसकी ओर दौड़कर जाकर लिपट गयी थी उससे .घंटों से आँखों में रोके हुए अपने आंसुओं के सैलाब को रोक नहीं पायी थी वो .प्रिया की आँखों में आंसूं देखकर साहिल के दिल में दर्द की लहर दौड़ पड़ी थी पर उसने बड़े भाई होने का कर्तव्य निभाते हुए प्रिया को सम्भाला था .साहिल को इस वक्त केवल माँ की चिंता थी .उस माँ की जो उसके डैडी के लिए अपना घर ,देश ,संस्कृति छोड़कर भारतीयता के रंग में रंग गयी थी .जिसने अच्छी बहू ,अच्छी पत्नी व् अच्छी माँ होने की परीक्षाएं उत्तम अंकों में पास की थी .जो डैडी के हल्का सा बुखार होने पर सारी रात जगती रहती थी ...वो माँ डैडी के बिना कैसे रह पायेगी ? यही एक प्रश्न साहिल के दिल व् दिमाग में उथल-पुथल मचाये हुए था .
[जारी है ...]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा- -ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-दो ]


जींस के ऊपर पहने सूती कुर्ते की जेब में मेज से उठाकर मोबाइल डाला और शॉल इस तरह लपेटा कि केवल नाक के ऊपर का चेहरा दिखाई दे रहा था .''चलो आज रात का भोजन मैं तुम्हारे घर ही करूंगा .'' साहिल के ये कहते ही सुरेश के आश्चर्य की सीमा न रही .वो साहिल के पीछे पीछे कमरे से बाहर आ गया . साहिल के कमरे से बाहर आते ही एस.पी.जी. के कमांडों सतर्क हो गए और साहिल के निजी सचिव चंद्रा जी भी अपने कमरे से निकल कर तेजी से वहाँ पहुँच गए .साहिल ने चेहरे से शॉल हटाते हुए कहा -'' रिलेक्स एवरीवन ...मैं एक घंटे में लौट आउंगा .'' साहिल से असहमत होते हुए तभी वहाँ पहुंचे सिक्योरिटी ऑफिसर बोले -'' बट वी कांट एलाउ यू टू गो एलोन सर .'' साहिल उन्हें आश्वस्त करता हुआ बोला -'' ऑल राइट ...यू मस्ट डू योर ड्यूटी ...पर ध्यान रहे किसी को कोई परेशानी न हो .'' ये कहकर साहिल अपनी गाड़ी से न जाकर सुरेश की बाइक पर ही उसके पीछे बैठकर उसके घर के लिए रवाना हो लिया पर शॉल से अपना चेहरा ढकना न भूला .सुरेश के घर पर साहिल का जो स्वागत हुआ उसने साहिल का दिल जीत लिया .सुरेश के माता पिता ने साहिल को उसकी दादी ,डैडी से सम्बंधित संस्मरण सुनाये तो जैसे साहिल वापस अपने उसी बचपन में पहुँच गया जब वो डैडी के साथ यहाँ आकर धूम मचाया करता था .सुरेश के माता-पिता साहिल की दादी व् डैडी की हत्या का जिक्र करते समय फफक -फफक कर रो पड़े . साहिल की आँखें भी भर आयी .सुरेश की माता जी ने साहिल के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा तो साहिल को लगा जैसे दिल्ली से माँ यही आ गयी हो .''सच माँ का स्पर्श एक सा ही होता है वो चाहे मेरी माँ हो या किसी और की '' साहिल ने मन में सोचा .सुरेश की पत्नी खाना परोस लाइ तब सबने नीचे बैठकर एक साथ भोजन किया .आज साहिल के पेट की भूख ही नहीं बल्कि आत्मा भी तृप्त हो गयी .सुरेश के घर से सबको प्रणाम कर व् फिर आने का वादा कर साहिल जब डाकबंगले की ओर रवाना हुआ तब उसके मन में एक सुकून था कि उसने दशकों पहले गांधी जी द्वारा चलाये गए छुआछूत विरोधी अभियान में एक बूँद बराबर ही सही पर योगदान तो किया .
डाकबंगले पर अपने कमरे में साहिल जब लौटा तब रात के नौ बजने आ गए थे .शॉल बैड पर फेंककर ,मोबाइल कुर्ते की जेब से निकालकर मेज पर रख साहिल फ्रेश होने के लिए बाथरूम में गया .इधर उधर नज़र दौड़ाई तो बाथ सोप कहीं नज़र नहीं आया .एक बात याद कर साहिल के होंठो पर मुस्कान आ गयी और उसने मन में सोचा -'' लो भाई यहाँ तो साबुन का एक टुकड़ा तक नहीं और लोग कहते हैं मैं दलित के घर से लौटकर विशेष साबुन से नहाता हूँ !!!'' केवल पानी से मुंह धोकर आईने में अपना चेहरा देखते समय साहिल के कानों में सुरेश की पत्नी के एक बात उसके कानों में गूंजने लगी -'' भैय्या जी अब तो भौजी ले आइये !'' यूं सार्वजानिक रूप से चालीस की उम्र पार कर चुके साहिल को ये बातें अच्छी नहीं लगती थी पर सुरेश की पत्नी के कहने में एक अपनापन था बिल्कुल प्रिया जैसा .प्रिया भी बहुत बार टोक चुकी थी और माँ तो इस मुद्दे पर साहिल से कुछ कहना ही नहीं चाहती थी क्योंकि वे अच्छी तरह जानती हैं अपने साहिल को . तौलिया से मुंह पोछते हुए साहिल वापस कमरे में आया और बिखरे बालों को बिना संवारे ही अपना लैपटॉप लेकर बैड पर बैठ गया .मेल खुलते ही इनबॉक्स में ''हिलेरी' का मेल देखते ही वो सुखद आश्चर्य में पड़ गया .'नौ साल बाद आज अचानक हिलेरी का मेल ' साहिल को यकीन ही नहीं हुआ .मेरा मेल मिला कहाँ से हिलेरी को ?ये सोचते हुए उसने वो मेल खोल लिया .स्पैनिश भाषा में लिखा व् अंग्रेजी में अनुवादित उस मेल का सारांश कुछ यूँ था -'' मन की बात अपनी भाषा में ही लिखी जाती है इसलिए स्पैनिश में लिख रही हूँ और मुझे पूरा यकीन हैं कि मेरे साथ रहते हुए जो स्पैनिश शब्द तुम सीख गए थे अब वे भी भूल गए होगे इसलिए नीचे इसका अनुवाद अंग्रेजी में कर दिया है .साहिल .....मुबारक हो रेप के आरोप से अदालत द्वारा बरी किये जाना .मैं ऐसे ही घिनौने आरोपों से तुम्हे बचाने के लिए राजनीति में न आने की सलाह दिया करती थी .मैं जानती हूँ कि तुम रेप जैसे घिनौने अपराध को करने की सोच भी नहीं सकते .साहिल राजनीति तुम जैसे भोले-भाले लोगों के लिए नहीं है .तुम्हारी दादी को उनके ही अंगरक्षकों ने गोलियों से भून डाला और तुम्हारे डैडी को कितनी क्रूरता से बम-विस्फोट में उड़ा दिया गया ....फिर भी तुम्हारी मॉम राजनीति में आयी और फिर तुम भी !!! तुम्हारे डैडी की हत्या पर तुम्हे तड़पते हुए मैंने देखा है .आज मैं सुकून से कह सकती हूँ कि मैंने तुम्हे सही सलाह दी थी ...विपक्षियों की गन्दी सोच 'रेप' तक जा पहुँचती है और तुम जैसा शालीन व्यक्ति अपने को पाक-साफ़ घोषित करने के लिए अदालतों का चक्कर लगाता है .तुम ये सब कैसे झेलते हो मुझे आश्चर्य होता है !!...यदि अब भी एक प्रतिशत भी तुम राजनीति छोड़कर यहाँ वेनेजुएला आने के बारे में सोचने को तैयार हो तभी इस मेल का जवाब देना ....तुम्हारा मेल तुम्हारी ऑफिशियल वेबसाइट से लिया है ......अलविदा ''
[जारी है ]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा-ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

राजनीति [भाग-एक]


शाम ढलने लगी थी .आधा नवम्बर बीत  चुका था .सुहानी हवाओं में बर्फ की ठंडक घुलने लगी थी .शॉल ओढ़कर साहिल खिड़की से बाहर के नज़ारों को देखने लगा .डैडी के साथ कितनी ही बार उनके  इस संसदीय क्षेत्र से सांसद रहते हुए साहिल ने इसी सरकारी डाकबंगले की खिड़की से रोमांचित होकर ये नज़ारे देखे थे .दूर दूर तक हरियाली ही हरियाली और उस पर संध्या की श्यामल चुनरी की छाया . साहिल की आँखों में एक सूनापन थोड़ी नमी के साथ उतर आया .ऐसा सूनापन साहिल ने पहली बार अपने डैडी की आँखों में तब देखा था जब दादी के अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी थी और डैडी के दादी की चिता को मुखाग्नि देने के बाद साहिल रोते हुए डैडी से लिपट गया था .चौदह साल के साहिल ने डैडी की आँखों में जो सूनापन उस समय देखा था वो ही उसके दिल में उतर गया था और जब तब उसकी आँखों में भी उतर आता है .साहिल ने आँखों में आयी नमी को शॉल के एक कोने से पोंछा और सरकारी डाकबंगले के उस कमरे में खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया .वही दीवार से सटी मेज पर फैले हुए कागजों को एकत्रित कर सलीके से क्रम में लगाया .ये कागज इस संसदीय क्षेत्र के दौरे के दौरान जनता द्वारा अपने सांसद साहिल को अपनी समस्याओं के समाधान हेतु दिए गए प्रार्थना पत्र थे .साहिल ने समस्याओं की गम्भीरता के आधार पर उनका ऊपर-नीचे का क्रम निर्धारित किया और मेज पर रखे अपने मोबाइल में आये मैसेज चैक किये .दो मैसेज छोटी बहन प्रिया के व् एक माँ का था .साहिल जानता है कि माँ व् बहन दोनों को ही हर पल उसकी चिंता लगी रहती है .साहिल ने दोनों को ही ''आई एम् ओ.के. एंड फाइन '' का मैसेज किया और दीवार पर लगी घडी से टाइम देखा .सात बजने आ गए थे .संध्या की श्यमल चुनरी अब रात की काली चादर बनकर खिड़की के दिखने वाले सारे नज़ारों को पूरी तरह ढक चुकी थी .साहिल ने कुर्सी से खड़े होते हुए खिड़की के किवाड़ बंद करने को ज्यों ही हाथ बढ़ाया तभी उसके कमरे के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी .साहिल खिड़की बंद करता हुआ ही बोला -'' कम इन प्लीज़ '' .ये डाक बंगले का ही कर्मचारी था .उसने आते ही साहिल को टोकते हुए रोका -'' अरे भैय्या जी ...आप रहने दीजिये ..हम बंद कर देंगें .'' साहिल मुस्कुराता हुआ बोला -''लो हो भी गई बंद ..!!'' साहिल के पास पहुँचते ही वो कर्मचारी साहिल के चरण-स्पर्श के लिए झुका .साहिल ने उसके कंधे पकड़ते हुए उसे रोका और बोला -'' अरे ये क्या करते हो भाई ?'' वह कर्मचारी गदगद होता हुआ बोला -'' नहीं भैया जी रोकिये मत पर आप हमें मत छुइये ...हम चमार हैं ..आप नहीं जानते बड़ी जात के लोग भले ही मुसलमान से अपने दुधारू पशुओं का दूध निकलवा लें पर हमसे परहेज़ करते हैं ...और तो और अपने बच्चों से कहते हैं भले ही किसी भी जात की लड़की से प्रेम ब्याह कर लेना पर चमार से नहीं ...और आप भैय्या जी हमें हाथ लगाते हैं !!!'' साहिल के चेहरे की मुस्कराहट क्षोभ में पलट गयी पर वो खुद के भावों को नियंत्रित करता हुआ बोला -'' छोडो ये सब ..क्या नाम है तुम्हारा ..नई नियुक्ति हो शायद ?'' साहिल के इस प्रश्न पर वो कर्मचारी विनम्रता के साथ उत्तर देता हुआ बोला -'' हां भैय्या जी ...आपके ही संसदीय क्षेत्र का हूँ ...सुरेश नाम है हमारा ..भैय्या जी आपके दर्शन करके आज हमारा जन्म सफल होई गया .'' साहिल के चेहरे पर मुस्कराहट वापस आ गयी और वो चुटीले अंदाज़ में बोला -'' तुम्हारा जन्म तो सफल हो गया पर मेरा कैसे होगा !! एक बात बताओ तुम्हारे घर रात का भोजन तैयार हो गया होगा ?'' सुरेश बोला -''हां भैय्या जी ..पर आप ये क्यूँ पूछते हैं ..कही ...'' साहिल उसकी बात पूरी करता हुआ बोला '' हाँ ..बिलकुल सही ...'' साहिल ने बैड के पास पड़ी अपनी चप्पलें पहनी .
[जारी है ...]
शिखा कौशिक 'नूतन'
[घोषणा-ये कहानी ,इसके पात्र सभी काल्पनिक हैं इनका वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है .]

सोमवार, 18 नवंबर 2013

मैनेज-लघु कथा


सुजीत ने रिंगटोन बजते ही जेब से मोबाइल निकाला और बटन दबाकर कॉल रिसीव करता हुआ बोला - '' माँ ...प्रणाम ...ठीक तो हो ?...पिता जी कैसे हैं ?'' माँ घबराई हुई सी आवाज़ में बोली -'' बेटा मैं तो ठीक हूँ पर तेरे पिता जी की तबियत काफी ख़राब है .तुम यहाँ आ जाते तो सहारा हो जाता . वैसे तो इलाज चल ही रहा है .'' सुजीत बहाना बनाता हुआ बोला -'' माँ तुम जानती हो ना मेरी जॉब के बारे में ...साँस लेने तक की फुर्सत नहीं है और तुम्हारी बहू नेहा भी नौकरी के चक्कर में बहुत व्यस्त रहती है . बिल्कुल टाइम नहीं मिलता उसको .आप प्लीज़ खुद ही मैनेज कर लो माँ ....और हां आपका पोता चिंटू क्लास में फर्स्ट पोजिशन लाया है ...पिता जी को बताना वो बहुत खुश होंगे .'' माँ थोड़े मायूस स्वर में बोली -'' नहीं आ सकते तो कोई बात नहीं ...मैं मैनेज कर लूंगी वैसे भी पिछले आठ साल से ....शादी के बाद से तुम ज्यादा ही व्यस्त हो गए हो .'' इस वार्तालाप के एक माह बाद सुजीत के मोबाइल पर फिर से माँ की कॉल आयी .सुजीत अनमने भाव से रिसीव करता हुआ बोला -'' प्रणाम माँ ....क्या बताऊँ यहाँ मैं बहुत परेशान हूँ ....पंद्रह दिन से चिंटू बीमार है .अच्छे से अच्छा इलाज करवा रहा हूँ पर तबियत अभी तक भी पूरी तरह ठीक होने में नहीं आयी है .'' माँ चिंतित स्वर में बोली -'' बेटा चिंता मत करो ...अब तुम्हारे पिता जी की तबियत काफी ठीक है ..तुमने तो पलटकर फोन करके पूछा भी नहीं ...चलो कोई बात नहीं ...तुम दोनों पर टाइम ही नहीं तो चिंटू की देखभाल क्या करोगे ...मैं और तुम्हारे पिता जी आ जाते हैं कुछ दिन के लिए वहाँ ...'' माँ की ये बात सुनकर सुजीत हड़बड़ाता हुआ बोला -'' माँ आप रहने दो क्यों चक्कर में पड़ती हो ...मैं और नेहा मैनेज कर लेंगें .'' ये कहकर सुजीत ने फोन काट दिया .
शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 16 नवंबर 2013

विश्वास-लघु कथा

रिया और राहुल को आपस में घुल मिलकर कॉलेज कैंटीन में बातें करते देखकर रॉकी के दिल में आग लग गयी और वो फुंकता हुआ रिया के पास पहुंचा .राहुल के प्रति उपेक्षा दिखाता हुआ रॉकी रिया से मुखातिब होते हुए बोला - '' मुझे रिजेक्ट कर इस मिडिल क्लास के साथ दोस्ती की है तुमने .एक्सप्लेन मी व्हाई ?'' रिया रॉकी की ओर देखते हुए बोली -'' रॉकी महगे गिफ्ट्स देकर किसी का दिल नहीं जीता जाता है .तुम्हे याद है एक समय था जब तुम मेरे बेस्ट फ्रेंड थे पर तुम्हारी एक आदत ने मुझे तुमसे दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया और वो है इंसान को सामान मानने की तुम्हारी गन्दी आदत .एक दिन ऐसे ही राहुल के साथ मुझे बातें करते देखकर राहुल के जाने के बाद एक घंटे तक तुमने मेरा दिमाग खा डाला था जैसे मैं कोई सामान हूँ और राहुल तुमसे छिपकर मुझे उठाकर ले जायेगा ...इतनी असुरक्षा का भाव दो फ्रेंड्स के बीच !.....पर राहुल ने मुझसे कभी तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पूछा .यहाँ तक कि ये भी नहीं कि तुम्हारी व् मेरी दोस्ती क्यों टूट गयी क्योंकि उसे मुझ पर विश्वास है कि मैं एक अच्छी फ्रेंड के रूप में उसे कभी धोखा नहीं दूँगी .उसने कभी कोई चुभता हुआ प्रश्न नहीं पूछा ....हम दोनों में आपसी विश्वास है ...हम अच्छे फ्रेंड हैं !'' रॉकी रिया की बाते सुनकर आसमान में देखने लगा और खिसियाता हुआ बोला -'' ऑल राइट ..एन्जॉय योर फ्रेंडशिप !!''
शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

गोरी दुल्हन काला दूल्हा -लघु कथा

हल्के गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज पहने गौरवर्णा नवविवाहिता अदिति अपने काले कलूटे पतिदेव के साथ पार्क में घूमने गयी पर उसे बड़ा अजीब लग रहा था .आते-जाते लोग उन दोनों को बड़े ध्यान से देख रहे थे जिसके कारण उसके पतिदेव का मूड उखड गया .किसी तरह इधर-उधर की बातें करते हुए बमुश्किल बीस-तीस मिनट काटे और घर वापस लौट लिए .घर के पास पहुँचते ही पीछे से एक मोटरसाइकिल पर दो शरारती किशोर निकले .जिन्होंने पीछे मुड़कर देखते हुए सीटी बजायी और हवा में ही ताना कस दिया '' हूर के साथ लंगूर , दिल्ली बहुत दूर '' . अदिति के काले कलूटे पतिदेव ने उन किशोरों को गुस्से से देखा और तेज चलकर अदिति से थोड़ी दूरी बना ली .घर पहुँचते ही पतिदेव ने अपना सारा गुस्सा अदिति पर उतारते हुए कहा -'' किसने कहा था यूँ हीरोइन बनकर जाने के लिए ...ढ़ंग के कपड़े नहीं हैं तुम्हारे पास ?'' इतना कहकर अदिति का जवाब सुने बिना वे टी.वी. ऑन कर समाचार देखने लगे .अदिति ने मन ही मन अपने माता-पिता को कोसा और सोचने लगी -'' शादी के वक्त तो गोरी लड़की चाहिए और अब अपने काले होने का गुस्सा मुझ पर उतार रहे हैं ये पतिदेव .अरे मैं तो चलो तुम्हारे अनुसार कपड़े पहन लूंगी पर जो भगवान् ने तुम्हे काजल मलकर भेजा है इसे किस साबुन से साफ कर पाओगे !! ये सोचते सोचते अदिति कपड़े बदलकर किचन में जाकर चाय बनाने लगी .
शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 10 नवंबर 2013

सरनेम 'गांधी' -कहानी


''पिया गांधी ...'' उपस्थिति दर्ज़ करती मैडम ने कक्षा में ज्यों ही पिया का नाम पुकारा ग्यारहवी की छात्रा पिया हल्का सा हाथ उठाकर ''यस मैडम '' कहते हुए अपनी कुर्सी से खड़ी हो गयी .सभी छात्राएं पिया की ओर देखने लगी .कक्षा में तीसरी पंक्ति में दायें किनारे पर खड़ी पिया को बड़ा अजीब लगा .अभी-अभी गुजरात से उत्तर प्रदेश शिफ्ट हुए परिवार में पिया और उसके माता-पिता के अलावा उसका प्यारा पॉमेरियन डॉगी ''बुलेट'' भी था .उत्तर प्रदेश के जिस शहर में आकर पिया का परिवार बसा था वो विकसित-विकासशील-पिछड़ेपन का संगम था .एक ओर गगनचुम्बी इमारतें ,मॉल और दूसरी ओर झोपड़पट्टी इलाका .खैर क्लास टीचर ने मुड़कर देखती छात्राओं को डांट लगायी और पिया से पूछा -''क्या तुम गांधी फैमिली से हो ?'' पिया ने मुस्कुराकर ''हाँ' कहा तो सारी क्लास हॅसने लगी और मैडम भी मुस्कुरा दी .अगले ही पल पिया सफाई देते हुए बोली -'' नो मैडम ...मेरा मतलब हम भी गांधी हैं .'' ये कहकर पिया ने पहले जल्दबाज़ी में दिए गए अपने उत्तर के लिए खुद को मन में कोसा '' क्यूँ नहीं समझ पायी मैडम के किये गए सवाल का निहितार्थ ? पापा ने ठीक ही किया जो अपने नाम के साथ ''गांधी'' सरनेम नहीं जोड़ा पर दादा जी की जिद पर मेरे नाम के आगे ये जोड़ दिया गया ...ओह माई गॉड !!'' यही सोचते-सोचते पिया का नए कॉलेज में पहला दिन गुजर गया था .
कॉलेज से लौटते समय पीछे से पिया की क्लास की एक छात्रा ने उसे आवाज़ लगाई -'' मिस गांधी ...मिस गांधी !!'' पिया के दिल में अपने लिए यह सम्बोधन सुनकर आग लग गयी .पिया के मन में आया -'' काश रिवाल्वर होती मेरे पास तो अभी इस लड़की के पेट में छह की छह गोली उतार देती .'' पर अपनी खीज़ अपने मन में दबाकर बनावटी मुस्कान अधरों पर लाकर पिया ने पीछे मुड़कर देखा .ये वही लड़की थी जो आज क्लास रूम में उसका उत्तर सुनकर सबसे ज्यादा मुड़ मुड़कर देख रही थी .तेजी से चलकर आयी साथी छात्रा ने पिया के समीप आते ही हांफते हुए कहा - 'हाय !...आई एम् टीना ..टीना अग्रवाल '' ये कहकर उसने पिया की ओर दोस्ती के लिए हाथ बढ़ा दिया .पिया ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा -'' एंड आई एम् पिया !'' टीना पिया को टोकते हुए बोली -'' पिया नहीं ...यू आर पिया गांधी ...यूं नो आई एम् मैड अबाउट गांधी सरनेम .इस सरनेम के जुड़ते ही नाम कितना खास हो जाता है ...सोचो काश मैं भी गांधी होती तो ....मिस टीना गांधी ...ओह माई गॉड ...कितना अच्छा लगता !!!'' टीना उत्साहित होकर बोले जा रही थी और पिया जान चुकी थी कि इस लड़की की दिलचस्पी केवल उसके सरनेम '' गांधी'' में है उसमे कतई नहीं . टीना एक गली के मोड़ पर रुकी और बोली -''मिस गांधी इसी गली में मेरा घर है ...प्लीज डू कम !'' पिया ने मुस्कुराकर हामी भर दी किसी दिन उसके घर आने के लिए और अपने घर की ओर कदम बढ़ा दिए .
घर पहुँचते ही बुलेट दौड़कर पिया पास आकर मचलने लगा .पिया ने झुककर उसे उठा लिया पर तभी सड़क से कुत्तों के भौकने की आवाज़ सुनकर बुलेट पिया की गोद से छलांग लगाकर गेट पर जाकर भौकने लगा .पिया ने यूनिफॉर्म चेंज की और फ्रेश होकर माँ के पास किचन में पहुँच गयी .माँ ने दाल, भात ,रोटी और शाक सभी कुछ बनाया था .खा-पीकर पिया अपने कमरे में पहुंची और स्कूल बैग से निकाल कर कॉपी-किताबें कोने में लगी एक टेबिल पर कायदे से लगाने लगी .एक किताब उठाकर उस पर लगी चिट पर लिखा अपना सरनेम देखकर पिया को टीना की बात याद आ गयी -'' इस सरनेम के जुड़ते ही नाम कितना खास हो जाता है .'' .
शाम ढलने लगी थी . अभी भी इस शहर की सुबह व् शाम पिया को अपनी सी नहीं लगती थी .पिया के मन में एक अजीब सी मायूसी छा जाती थी ये सोचकर कि अपने गुजरात में क्या अब भी वैसी ही सुबह व् शाम होती है ? माँ संध्या -वंदन में व्यस्त थी और पापा अब तक लौटकर नहीं आये थे घर .पिया बुलेट के साथ छत पर चली गयी .आकाश में उड़ती पतंगें देखकर अपने गुजरात के अंतर्राष्ट्रीय पतंग मेले की यादें ताज़ा हो आयी पिया के दिल में .पापा के साथ कितनी पतंग उड़ाई हैं उसने वहाँ .गोधरा हादसे और उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद से ही पिया के पापा का मन वहाँ से उखड गया था .श्री कृष्ण द्वारा बसाई गयी द्वारिका वाले गुजरात में खून की खेली गयी होली ने पिया के पापा को अंदर तक हिला डाला .अपने मुस्लिम दोस्त के साथ मिलकर कपड़ों का बड़ा बिजनेस करने वाले पिया के पापा के सामने ही कुछ उन्मादियों ने उनके दोस्त को काट डाला था .कई महीनों के इलाज के बाद नॉर्मल हो पाये थे पिया के पापा . उसी क्षण उन्होंने गुजरात छोड़ने का निश्चय कर लिया था .बिजनेस समेटते समेटते अब शिफ्ट हो पाये थे वे .दादा-दादी ज़िंदा होते तो अब भी शिफ्ट न करने देते पर गुजरात दंगों की आग बुझते बुझते वे दोनों भी चल बसे थे .दादा अंतिम दिनों में दंगों में क़त्ल किये जा रहे मासूमों के बारे में पढ़-सुनकर रो पड़ते और कहते '' मेरे गांधी की जन्म-भूमि पर ये क्या हो रहा है ?'' पिया के पापा का चेहरा लाल हो जाता और माँ दादा जी को समझाते हुए कहती -'' बापू जी अब गुजरात गांधी का नहीं रहा !!'' और ...और भी न जाने कितनी यादें उसी पल पिया के दिल में हलचल मचाने लगी . एक पतंग तभी कटकर पिया के पास आकर गिरी .पिया उसे उठाती उससे पहले ही बुलेट दौड़कर आया और पतंग को मुंह से पकड़कर -पंजे से दबाकर वही बैठ गया .पिया ने झुककर उससे पतंग छुड़ाने की कोशिश की तो पूंछ हिलाने लगा .नीचे से तभी माँ की आवाज़ आयी -'' पिया नीचे आओ ...आरती ले लो !'' पिया पतंग और बुलेट को वही छोड़कर जल्दी से सीढ़ियां उतर कर नीचे आ गयी .हाथ धोकर माँ के पास मंदिर में पहुंचकर हाथ जोड़े और आरती ली .थोड़ी देर में पापा भी दूकान बढाकर घर आ गए .माँ ने कॉफी बना ली .पापा ने पिया को छेड़ते हुए पूछा -'' और आज क्या कर आयी मेरी बिटिया नए कॉलेज में ?'' पिया झूठा गुस्सा दिखाती हुई बोली -'' क्या पापा ...आप भी ...आज मेरा मूड ठीक नहीं है ..आपने बिल्कुल ठीक किया था .. अपने नाम के आगे से '' गांधी '' सरनेम हटा कर '' कुमार'' जोड़ लिया था .यहाँ कॉलेज में मेरा सरनेम मेरे पूरे वज़ूद पर ही हावी हो गया है .यू नो पापा एक लड़की टीना तो मेरे सरनेम की दीवानी ही है .यहाँ उत्तर प्रदेश में '' गांधी'' सरनेम के दीवाने कुछ ज्यादा ही लगते हैं ...या हम पहले '' गांधी'' हैं जो गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश में शिफ्ट हुए हैं .'' पिया की बात पर उसके पापा ठहाका लगाकर हॅस पड़े .कॉफी का खाली मग मेज पर रखते हुए बोले -'' बेटा ' 'गांधी'' के दीवाने तो दुनियां भर में हैं ...वे थे ही ऐसे महापुरुष और मैंने जो सरनेम गांधी अपने नाम के साथ नहीं लगाया वो इसलिए नहीं कि मैं गांधी का दीवाना नहीं बल्कि इसलिए क्योंकि मैं गांधी को भगवान मानता हूँ और कोई मुझे माध्यम बनाकर उनका अपमान करे ये मुझे सहन नहीं होता था ...मेरे कुछ शिक्षक व् सहपाठी ऐसा कुत्सित प्रयास करते रहते थे इसीलिए मैंने सरनेम 'गांधी' हटाकर 'कुमार' जोड़ लिया अपने नाम के साथ ...पर बेटा मैं गलत था .तेरे दादा जी ने तेरे नाम के साथ ''गांधी' जुड़वाकर मुझे मेरी गलती का अहसास करवाया .तुम कभी मत हटाना ये सरनेम .जो तुम्हे माध्यम बनाकर महापुरुषों का अपमान करे उसे मुंह तोड़ जवाब देना ....यू मस्ट प्राउड ऑफ योर ग्रेट सरनेम !'' पिया के पापा ये कहकर चुप हुए ही थे कि कि उसकी माँ चुटकी लेते हुए बोली - '' पिया इनकी गलती की सजा आज तक मैं भुगत रही हूँ .ये सरनेम ''गांधी' न पलटते तो सब मुझे भी '' मिसेज गांधी '' पुकारते पर इन्होने तो ....अरे घडी देखो कितना टाइम हो गया ...पिया चलो भोजन कर लो और पापा के लिए भी परोस कर ले आओ ...मैं बाद में कर लूंगी पहले साड़ी में फॉल टॉक लूं ...तुम्हे अपने गुजरात की ये बात तो याद होगी ही ...वेलो उठे वीर , बल बुद्धि वड़े ,अने सुख्यु रहे अनु शरीर ....याद है कि नहीं !'' पिया मुस्कुराते हुए बोली '' माँ ये भी कोई भूलने की बात है क्या !'' ये कहकर पिया भोजन परोसने किचन की ओर चली गयी और उसकी माँ साड़ी लेने .
अगले दिन कॉलेज में पहुँचते ही प्रार्थना स्थल पर टीना ने कई अन्य सहपाठिनियों से पिया का परिचय कराते हुए कहा -'' ये सोमिया है और ये गरिमा ...और ये है तन्वी ...मिस गांधी !'' टीना के पिया को ''मिस गांधी'' कहते ही तन्वी भड़ककर बोली -'' टीना ये क्या तूने मिस गांधी... मिस गांधी लगा रखा है ...तुझे पता भी है इन्ही गांधी के कारण देश के दो टुकड़े हुए ...माय फादर टोल्ड मी ...इन्ही गांधी जी की ज़िद पर मिस्टर नेहरू को भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया और देख लो कश्मीर सहित पूरे भारत का हाल ...तू क्या मिस गांधी कहकर इस लड़की के पास खड़ी हो गर्व का अनुभव कर रही है अरे इन गांधी लोगों ने ही ..इनके परनाना ,दादी ,पापा और भी न जाने किस किस ने जनता के भरोसे का खून किया है ...साठ वर्षों तक हमने इन्हें सत्ता का सुख प्रदान किया और इन लोगों ने देश को गरीबी ,बेरोजगारी , चोरी ,साम्प्रदायिकता ,बड़े बड़े घोटाले दिए ....आई हेट गांधी एंड हिस डायनेस्टी ...मिस गांधी !!! '' तन्वी की कड़वी बातें सुनकर पिया की आँखे भर आई .टीना तन्वी को डांटते हुए बोली -'' व्हाट नॉनसेंस ....क्या बकवास करे जा रही है तन्वी ...इस सब से पिया का क्या लेना देना ?'' तन्वी व्यंग्य में बोली -'' ओह ...सो इनोसेंट ...तू गांधी सरनेम के पीछे यु ही दीवानी हुई जा रही है ! अरे हम सब जानते हैं '' गांधी फैमिली '' को भारत में राजपरिवार का दर्ज़ा प्राप्त है इसी कारण इस सरनेम का क्रेज़ है और तुम जैसे क्रेज़ी लोग हैं यहाँ ...फिर आलोचनाओं पर आँसूं क्यों टपकाते हो और तुम्हारे महान गांधी की असलियत तो '' रियल सोल — महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विथ इंडिया '' और 'दी रेड साड़ी ' में खोल कर रख दी हैं लखकों ने ...पढ़ी नहीं अब तक कितने चरित्र...'' तन्वी आगे बोलती इससे पहले ही पिया दहाड़ती हुई बोली -'' चुप हो जाओ तुम ...तुम इस लायक नहीं कि राष्ट्र पिता का नाम भी ले सको .अपना सर्वस्व लुटाकर देश को आजाद कराने वाले गांधी जी का नाम सम्मान से ले सकती हो तो लो वर्ना चुप रहो और रही 'गांधी फैमिली '' की बात तो उन्होंने '' गांधी'' सरनेम का मान देश ही नहीं दुनिया में भी बढ़ाया है .देश को बांटने वाले ,साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने वालों के आगे उन्होंने कभी सिर नहीं झुकाया और अपने प्राणों की आहूति दे दी . तुम जिन पुस्तकों का जिक्र कर रही हो उन्हें पढ़ने से अच्छा है कि हम इन महान देशभक्तों के प्रेरक प्रसंगों को पढ़कर इनसे कुछ देश सेवा की प्रेरणा लें .मेरे दादा जी कहते थे कि हम उन्माद में गोली चलाने वाले 'गोडसे' तो रोज़ पैदा कर सकते हैं पर गांधी जी जैसा महापुरुष सदियों में एक ही पैदा होता है जो देश की खातिर अपने सीने पर गोली खाता है .नाओ टेल मी अंडरस्टैंड और नॉट मिस .???..'' तन्वी कुछ बोलना ही चाहती थी कि प्रार्थना स्थल पर शिक्षक गण आने लगे और प्रार्थना आरम्भ हो गयी .प्रार्थना के बाद तन्वी ने क्लास में पहुँचते ही पिया से कहा -'' आई एम् सॉरी मिस गांधी !'' इस पर पिया ने उसे गले से लगा लिया तभी टीना ने पीछे से आकर पिया के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा -हे मिस गांधी ..यू आर ग्रेट ..तुमने तो कमाल ही कर दिया ..तुम्हारा नाम तो इंदिरा होना चाहिए था .....आई मीन आइरन लेडी !!'' पिया मुस्कुराते हुए बोली -'' तुम्हारे पास भी '' गांधी '' सरनेम लगाने का एक मौका है तुम गांधी सरनेम वाले लड़के से विवाह कर लो .'' इस पर टीना शरमा गयी और तन्वी ''यू आर राइट पिया .'' कहती हुई हंस पड़ी .
शिखा कौशिक 'नूतन