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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

'ये अश्लील है '


कौन सोच सकता था कि जो चौदह वर्षीय किशोर बाला भाभी की दो वर्षीय बिटिया को गोद में उठाये  लाड़ करता घूमता है वही उसके साथ दुष्कर्म कर डालेगा .ठीक-ठाक घर का शालीन सा प्रतीत होता किशोर .उसके माता-पिता ने भी इस घटना का पता चलते ही अपना सिर पीट डाला था . आज तो उसका घिनौना  चेहरा याद आते ही मन में आता है कि उसका चेहरा नोच डालूँ पर तभी याद आता है पुलिस को दिया गया उसका बयान .उसने स्वीकारा था कि ' वो फिल्मों में देखे गए कामुक दृश्यों से प्रेरित होकर ही ये कुकर्म कर गया . उसने इस कुकृत्य केलिए बच्ची को ही क्यों चुना ? इसका उत्तर देते हुए उसने कहा था कि चूंकि छोटी बच्ची न  तो उसके इरादे भांप सकती थी न विरोध कर सकती थी ..इसीलिए उसने अपनी हवस मिटाने के लिए उसे चुना  . '' इसे याद करते ही सोच में पड़   जाती हूँ कि क्या इस किशोर को सजा देने मात्र से समाज में बच्चियों व् महिलाओं के विरूद्ध बढ़ते ऐसे कुकर्मों पर लगाम लगाई जा सकेगी ? अंदर से उत्तर आता है नहीं .शायद इस पर लगाम लगाने के लिए फिर से माता-पिता को अपनाना होगा  वही मर्यादित आचरण वो बच्चों को नैतिक रूप से इतना दृढ़ कर दें कि कामुकता का नग्न दर्शन भी उनके मन को भ्रमित न कर पाएं .ऐसे दृश्यों को देख-सुनकर वे स्वयं इनकी ओर से दृष्टि हटा लें और कान बंद कर ले ...ये कहते हुए कि -ये अश्लील है !

शिखा कौशिक 'नूतन'

बुधवार, 10 जून 2015

बलात्कारी..पति ?-कहानी


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पंचायत अपना फैसला सुना चुकी थी .नीला के बापू -अम्मा , छोटे भाई-बहन बिरादरी के आगे घुटने टेककर पंचायत का निर्णय मानने को विवश हो चुके थे .निर्णय की जानकारी होते ही नीला ने उस बंद -दमघोंटू कोठरी की दीवार पर अपना सिर दे मारा था और फिर तड़प उठी थी उसके असहनीय दर्द से .चार दिन पहले तक उसका जीवन कितनी आशाओं से भरा हुआ था . उसका इंटरमीडियट का परीक्षा-परिणाम आने वाला था .वो झाड़ू लगाते ,कच्चा आँगन लीपते   , कपडे धोते , बर्तन मांजते और माँ के साथ रोटी बेलते ... बस डिग्री कॉलेज में प्रवेश के सपने देखती . अपने पूरे कुनबे  में नीला पहली लड़की थी जिसने इंटरमीडिएट तक का पढाई का सफर पूरा किया था .दलित घर की बेटी , जिसके बापू-अम्मा  ने मजदूरी कर-कर के, पढ़ाया था ...उस कोमल कली  नीला को इस बात का अंदाज़ा तक न था कि  कोई उसका सर्वस्व लूटने को  उसके आस-पास मंडराता रहता है .चालीस-पैतालीस साल के उस अधेड़ को गली के बच्चे चच्चा-चच्चा कहकर पुकारते थे .वो कभी चूड़ी बेचने के बहाने ,  कभी गज़रे ,कभी ईंगुर -चुटीले ,कभी साड़ी...जिस के भी द्वारा घरों में औरतों से गुफ्तगूं का मौका मिल जाये , वही उठाकर  बेचने नीला की गली में आ धमकता था .सबसे अच्छा लगता उसे चूड़ियाँ बेचना क्योंकि चूड़ी पहनाने के बहाने औरतों की नरम कलाइयां छूने का मौका जो मिल जाता उस दुष्ट को .नीला की अम्मा भी कभी-कभार उससे कुछ खरीद लेती .उस मनहूस दिन नीला घर पर अकेली थी .वो कुकर्मी दरवाज़े पर आया तो नीला ने बंद किवाड़ों के पीछे से ही कह दिया कि  ''घर पर कोई नहीं है ....कल को आना अम्मा तुमसे चूड़ी ले लेंगी .''  उस कुकर्मी की आँखें 'घर पर कोई नहीं है ' सुनकर चमक उठी थी वासना की आग में   .वो खांसता हुआ सा बोला था -  ''बीबी बहुत प्यासा हूँ ...किवाड़ खोलकर थोड़ा पानी पिला दो .'' मासूम नीला उसकी वासना प्यास को समझ न पाई और किवाड़ खोलकर उसके लिए पानी लेने चली गयी .वो दुष्कर्मी नीला के पानी लेने घर के अंदर की ओर  जाते ही घर में घुसा और अंदर से कुण्डी लगाकर अपना सामान फेंककर नीला के पास अंदर ही पहुँच गया .नीला कुछ समझ पाती इससे पहले ही वो बाज़ ऐसे झपटा कि मासूम चिड़िया छटपटाती रह गयी .
    जब घर के सब लोग वापस आये तब नीला पर हुए अत्याचार की व्यथा-कथा सुनकर सारे  मौहल्ले में हल्ला मच गया . नीला के बापू-अम्मा थाने पहुंचे तो वहां से उन्हें धकिया दिया गया .मामला पंचायत तक पहुंचा और पंचों ने ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि-'' देखो भाई इस आदमी ने अपना गुनाह मान लिया है .दारू पिए हुए था ये .हो गयी गलती ...फांसी पर चढ़ा दें क्या इसे ? लौंडिया को भी देखना चाहिए था कि नहीं . जवान लौंडियाँ ने घर के किवाड़ खोले ही क्यों जिब घर पर माँ-बाप नी थे ! बस बहक गया यु  तो ..मरद की जात..खैर छोद्दो यु सब ...इस ससुरे का ब्याह नी हुआ इब तक यु इधर-उधर मुंह मारता फिरे है ...आगे-पीछे भी कोई नी ...सुन भाई नीला के बाप इब इस बलात्कारी से ही नीला का ब्याह करने में गनीमत है थारी भी और म्हारी भी वरना बगड़ के सारे गांवों में थू-थू होवेगी ...और जिब यु ऊँची जात का होके भी नीला को ब्याहने को राज़ी है तो तेरे के परेसानी है !'' नीला की अम्मा ने चीखकर इसका विरोध किया था भरी पंचायत में -'' जुलम है यु तो ...कहाँ वो जंगली सुअर और कहाँ मेरी फूल सी बच्ची !'' पर कौन सुनता उसकी .पंच ये कहकर उठ लिए ' चल हट यहाँ से ...फूल सी बच्ची ..दाग लग लिया उसके ..कौन जनानियों के मुंह लगे !''
तन -मन पर ज़ख्म लिए नीला दुल्हन बनी.फेरे हुए जिन्हें वो बलात्कारी बमुश्किल ही पूरे कर पाया क्योंकि उसने उस वक्त भी दारू पी  हुई थी .नीला विदा होकर अपने ही गांव में कुछ दूर पर स्थित  ससुराल  पहुंची  तो लोग-लुगाइयों की खुसर-पुसर के बीच उसने दारू के नशे में टुन्न  बलात्कारी पति को सहारा देकर अंदर के कमरे में ले जाकर एक पलंग पर लिटा दिया . धीरे-धीरे आस-पड़ोस के लोग वहां से खिसक लिए .नीला ने घायल नागिन की नज़रों की भांति  इधर-उधर देखा और तेजी से जाकर घर के मुख्य किवाड़ों की कुण्डी लगा आई .उसने देखा घर के एक कोने की भंड़रियां में केरोसीन  के तेल की कनस्तरी रखी हुई थी ..उसने कनस्तरी उठाई और टुन्न पड़े बलात्कारी पति के ऊपर ले जाकर उड़ेल दी . वो टुन्न होते हुए भी एकाएक  होश में आ गया और उसने अपने पंजे में नीला की गर्दन दबोच ली पर नीला ने शेरनी की भांति अपना घुटना मोड़ा और उसके पेट पर इतना जोरदार प्रहार किया कि वो बिलबिला उठा और पेट पकड़ कर जमीन पर गिर पड़ा .नीला ने अपनी सुहाग की साड़ी झटाझट उतारी और उस बलात्कारी पति के ऊपर कफ़न की तरह डाल दी . वो उसकी उलझन में ही फंसा था कि नीला ने ब्लाउज में पहले से छिपाए हुए लाइटर को जलाया और उस बलात्कारी के कपड़ों से छुआ दिया .खुद नीला फुर्ती से कमरे से निकलकर बाहर आई और किवाड़ बंद कर बाहर से सांकल लगा दी .बलात्कारी पति आग में झुलसते हुए उसे गालियां  देता रहा और वो जोर जोर से चिल्लाती रही -'' अजी.. ..नहीं ऐसा मत करो ..मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है ..किवाड़ क्यों अंदर से बंद कर लिए .....कोई खिड़की भी नहीं जो देख सकूँ तुम क्या कर रहे हो ...हाय ये आग कैसी ....है तुमने खुद को आग लगा ली ...अजी ऐसा न करो ... मैं तो सुहागन बनते ही विधवा हो जाउंगी ..अजी किवाड़ खोल दो ..'' इधर नीला व् बलात्कारी पति की चींखें सुनकर आस-पड़ोस के लोग-लुगाई उनके घर के बाहर इकट्ठा हो चुके थे .सब बाहर से उनके घर का किवाड़ पीट रहे थे और नीला कमरे के किवाड़ की झरोख  में से देख रही थी बलात्कारी को उसका दंड मिलते हुए . जब नीला ने देखा कि वो अधमरा होकर जमीन पर गिर पड़ा है तब नीला ने झटाक से ऐसी किवाड़ खोले जैसे धक्का देकर उसने ही अंदर से बंद किवाड़ खोल लिए हुए .इसके बाद वो ब्लाऊज-पेटीकोट में ही बाहर का किवाड़ खोलने को दौड़ पड़ी .उसको ऐसी हालत में देखकर इकठ्ठा हुई औरतों में से एक ने अपनी ओढ़ी हुई सूती चादर उड़ा दी  और नीला बेसुध सी होकर फिर से अंदर भाग ली .उसके पीछे बाहर इकठ्ठा मर्द भी भागते हुए अंदर कमरे में पहुंचे और बलात्कारी पति को उठाकर सरकारी अस्पताल ले गए .वहां पहुँचते-पहुंचते उसके प्राण निकल चुके थे .वो पुलिस जिसने नीला के बाप को धकियाकर थाने से ये कहकर भगा दिया था कि ''तुम्हारी जनानियों  की भी कोई इज्जत -विज्जत होवे है के ..जा जाकर पंचायत में जाकर ले ले वापस अपनी इज्जत '' आज बड़ी मुस्तैदी के साथ अस्पताल में आ धमकी  . नीला का बयान दर्ज़ किया गया .नीला ने अपना बयान कुछ इस तरह दर्ज़ कराया -'' आस-पड़ोस के लोगों के जाते ही मेरे पतिदेव मेरे चरणों पर गिर पड़े और बोले- मैंने तेरे साथ बहुत गलत किया .मैं  तेरे लायक कहाँ ? मुझ जैसे बलात्कारी के लिए तू क्यों करवाचौथ को बरती रह्वेगी ? क्यों बड़-मावस   पर बड़ पूजके मेरी लम्बी उम्र मांगेगी ? क्यों सिन्दूर सजावेगी मांग में और चूड़ी पहरेगी ....मैं तो एक जनम को भी तेरा पति होने लायक ना फेर सात जन्मों की बात रहन दे ..इब मैं प्राश्चित करूंगा और ये कहकर वे तेल की कनस्तरी उठा लाये और खुद पर उड़ेल दी .मैंने मना करी तो मुझे धक्का दे दिया .मैं ज्यों ही उठती तब तक उन्होंने लाइटर से अपने कपड़ों में आग लगा ली .मैं दौड़कर उनके पास पहुंची तो मेरी साड़ी ने भी आग पकड़ ली . ये देखकर उन्होंने मेरी साडी खींच ली और मुझे कमरे से बाहर धकियाकर तुरंत किवाड़ बंद कर लिए .मैं किवाड़ों को पीटती रही कि मैंने तुम्हे माफ़ कर दिया है पर उन्होंने नहीं खोले .मेरे लगातार किवाड़ पीटते रहने के कारण अंदर की सिटकनी खुल गयी .तब मैंने देखा वे ज़मीन पर अधमरे से पड़े थे .मैंने लाज-शर्म छोड़ उसी अवस्था में जाकर घर के किवाड़ खोल दिए और ....'' ये कहते-कहते नीला ने अपनी कलाइयां अस्पताल की दीवार पर दे मारी जिसके कारण उनमे पहनी हुई चूड़ियाँ मौल कर वहां फर्श पर बिखर गयी और नीला की कलाइयों में कांच चुभने के कारण खून छलक आया .इतने में खबर पाकर नीला के बापू-अम्मा भी वहां आ पहुंचे और आते ही अम्मा ने नीला को बांहों में भरकर '' मेरी बच्ची तू तो सही-सलामत हैं ना '' कहते हुए उसका माथा चूमने  लगी . नीला ने अम्मा को एक ओर ले जाकर धीमे से उसके कान में कहा -'' अम्मा ये मेरा निर्णय था .पंचायत को मुझमे में दाग दिख रहा था ना तो लो दाग लगाने वाले को जलाकर खाक कर दिया मैंने .जंगली सूअर को उसके बाड़े में ही घुसकर काट डाला .बलात्कारी कभी पति नहीं हो सकता अम्मा ! वो केवल बलात्कारी ही रहता मेरे लिए .उसने जितने दर्द मेरे तन-मन को दिए थे आज मैंने उन सब दर्दों की सिकाई कर ली उसे आग में जलते देखकर .'' नीला के ये कहते ही अम्मा ने आँखों-आँखों में उसके द्वारा किये गए दुष्ट संहार पर असीम संतुष्टि व्यक्त की और उसे गले से लगा लिया . पुलिसवाले सारे मामले को आत्म-हत्या की धाराओं में दर्ज़ कर वहां से चम्पत हो लिए और वहां इकट्ठा लोग-लुगाई -'' के ...किब ....क्योंकर '' करते हुए बलात्कारी पति के अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गए .

शिखा कौशिक 'नूतन '

मंगलवार, 2 जून 2015

बदनाम रानियां -कहानी


बगल में बस की सीट पर बैठी खूबसूरत युवती द्वारा मोबाइल पर की जा रही बातचीत से मैं इस नतीजे पर पहुँच चूका था कि ये ज़िस्म फ़रोशी का धंधा करती है .एक रात के पैसे वो ऐसे तय कर रही थी जैसे हम सेकेंड हैण्ड स्कूटर के लिए भाव लगा रहे हो .टाइट जींस व् डीप नेक की झीनी कुर्ती में उसके ज़िस्म का उभरा हुआ हर अंग मानों कपड़ों से बाहर निकलने को छटपटा रहा था .न चाहते हुए भी मेरी नज़र कभी उसके चेहरे पर जाती और कभी ज़िस्म पर .मोबाइल पर बात पूरी होते ही उसने हाथ उठाकर ज्यूँ ही अंगड़ाई ली त्यूं ही उस बस में मौजूद हर मर्द का ध्यान उसकी ओर चला गया . सबकी नज़रे उसके चेहरे और उसके ज़िस्म पर जाकर टिक गयी .शायद वो चाहती भी यही थी . वो बेखबर सी बनकर पर्स से लिपस्टिक निकाल कर दुसरे हाथ में छोटा सा आइना चेहरे के सामने कर होंठों को और रंगीन बनाने लगी . मेरे लिए बहुत ही असहज स्थिति थी . एक शरीफ मर्द होने के कारण मैं उससे थोड़ी दूरी बनाकर बैठना चाहता था पर दो की सीट होने के कारण ये संभव न था .उस पर वो युवती मुझसे सटकर बैठने में ही रुचि ले रही थी .
सड़क के गड्ढों के कारण एकाएक बस उछली और संभलते-संभलते भी उसके लिपस्टिक लगे होंठ मेरी सफ़ेद कमीज के कन्धों पर आ छपे .मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर उसके ''सॉरी'' कहते ही न जाने क्यों मेरे मर्दाना मन में कुछ गुदगुदी सी होने लगी . मैं चुप होकर बैठ गया और कहीं न कहीं मुझमें भी उसके प्रति या यूँ कहूँ उसके खूबसूरत ज़िस्म के पार्टी आकर्षण पैदा होने लगा . अविवाहित होने के कारण किसी लड़की की छुअन ने मेरे तन-मन दोनों को रोमांचित कर डाला जबकि मैं जानता था कि ये लड़कियां समाज में वेश्या-रंडी-छिनाल जैसी संज्ञाओं से विभूषित की जाती हैं . मैंने एक बार फिर से उसके चेहरे को गौर से देखा .बड़ी-बड़ी आँखें , गोरा रंग , धनुषाकार भौहें , होंठ के ऊपर काला तिल और सुडोल नासिका ...कुल मिलाकर गज़ब की खूबसूरत दिख रही थी वो . मैंने क्षण भर में ही अपनी नज़रें उसकी ओर से हटा ली तभी अचानक वो बिजली की सी रफ़्तार से सीट से खड़ी हुई और हमारी सीट के पास खड़े एक अधेड़ का गला दबोचते हुए बोली -'' क्या देखे जा रहा है हरामज़ादे इतनी देर से ......नंगी औरत देखनी है तो जा सिनेमा हॉल में ...परदे पर दिख जाएँगी तुझे ...खबरदार जो मेरी कुर्ती के अंदर झाँका .....नोट लगते हैं इसके ..समझा !!'' ये कहकर उसने धक्का देकर उसका गला छोड़ दिया .वो अधेड़ आदमी अपनी गर्दन सहलाता हुआ दूसरी ओर मुंह करके खड़ा हो गया और वो युवती फिर से और ज्यादा मुझसे सटकर सीट पर विराजमान हो गयी .
अब मैंने उसकी ओर ध्यान न जाये इसलिए अपना मोबाइल निकाला और व्हाट्सऐप पर जोक्स पढ़ने का नाटक करने लगा .सड़क के गड्ढों के कारण बस फिर से उछली और मैं मोबाइल संभालते हुए लगभग गिरने ही वाला था कि उस युवती ने अपनी नरम हथेलियों से मेरी बांह पकड़ कर मुझे सहारा दिया . पल भर को मन मचल गया -'' काश ये नरम हथेलियाँ यूँ ही मुझे थामे रहे '' पर तुरंत होश में आते हुए मैंने ''थैंक्स '' कहते हुए उसकी ओर देखा तो वो मुस्कुराकर बोली -'' तुम कुंवारे हो या शादीशुदा !'' मैं उसके इस प्रश्न पर सकपका गया .दिमाग में उत्तर आया -'' तुझसे मतलब '' पर जुबान विनम्र बनकर बोली -'' अभी अविवाहित हूँ !' ये सुनते ही उस युवती ने जींस की जेब में से अपना विजिटिंग कार्ड निकालकर मेरे हाथ पर रखते हुए कहा -'' ये मेरा एड्रेस और नंबर है ...जब भी दिल चाहे आ जाना तेरी सारी आग बुझा दूँगी .'' मेरा दिमाग उसकी इस बात पर तेज़ाबी नफरत से भर उठा .मैं कड़वी जुबान में बोला -'' घिन्न नहीं आती तुम्हें अपने इस ज़िस्म से ..क्यों करती हो ऐसा गन्दा काम ? '' युवती मेरी बात पर ठठाकर हंस पड़ी और मेरे बालों को अपनी बारीक उंगलियों से हौले-हौले सहलाते हुए बोली -'' गन्दा काम ...क्या गन्दा है इसमें ? मेरा ज़िस्म है ...मैं कुछ भी करूँ...मर्द की हवस मिट जाती है और मेरे घर का चूल्हा जल जाता है ..क्या बुरा है ? रोज़ सुबह नहा-धो कर शुद्ध हो जाती हूँ मैं . अरे तुम सब मर्दों को तो मेरी जैसी औरतों का अहसानमंद होना चाहिए ..हम अपना बदन नोंचवा कर आदमी की अंदर की वासना को तृप्त न करें तो तुम जैसे नैतिकतावादियों की माँ-बहन-पत्नी-बेटी न जाने कब किसी दरिंदे की हवस की शिकार हो जाएँ ....खैर छोडो ये बकवास बातें ! ....तुम आना चाहो तो कार्ड पर लिखे मोबाइल नंबर पर कॉल कर देना ...उसी पर पैसे और दिन तय कर लेंगें .'' उसकी बातों ने मुझे गहरे अवसाद में डाल दिया था .अब मेरे बदन में रोमांच की जगह आक्रोश ने ले ली थी .मैं सोचने लगा -'' आखिर कैसे इसे समझाऊं कि वो जो कर रही है सही नहीं है पर उसके तर्क भी दमदार थे .आदमी नैतिकता का झंडा उठाये युगों-युगों से औरत को दो श्रेणियों में बांटता आया है -अच्छी औरत और बदजात औरत .देवी के आगे सिर झुकाने वाले कितने ही मर्दों ने उसकी प्रतिमूर्ति औरत के बदन को जी चाहे नोंचा-चूसा और उसके बाद उसे पतिता कहकर उसके मुंह पर थूककर चलते बने . न पीछे मुड़कर कभी देखा कि कहीं उस पतिता के गर्भ से तुम्हारी ही संतान ने जन्म न ले लिया हो !'' मेरे ये सोचते-सोचते उस युवती ने मेरे कंधें पर हाथ रखते हुए बड़ी अदा के साथ पूछा -'' कहाँ खो गए चिकने बाबू ? देखो मेरे भी कुछ उसूल हैं .मैं मर्द से पहले ही पूछ लेती हूँ कि वो कुँवारा है या शादीशुदा .यदि वो शादीशुदा है तो मैं उसके साथ डील नहीं करती क्योंकि मुझे उन सती -सवित्रियों से नफरत है जो अपने मर्दों को तो संभाल नहीं पाती और हुमजात औरतों को बदनाम करती हैं कि हमने उनके मर्दों को फंसा लिया . मैं केवल कुंवारे मर्दों से डील करती हूँ . कार्ड पर मेरा नाम तो पढ़ ही लिया होगा .मेरा असली नाम रागिनी है जिसे मैंने कार्ड पर '' रानी '' छपवाया है .दिन में मैं एक दफ्तर में काम करती हूँ जहाँ और महिला सहकर्मियों की तुलना में मुझे ज्यादा वेतन मिल जाता है क्योंकि मैं बॉस और उसके क्लाइंट्स द्वारा मेरे जिस्म से खिलवाड़ करने से नाराज़ नहीं होती ..नाराज़ होकर कर भी क्या लूंगी ..वे मुझे दो दिन में बाहर का रास्ता दिखा देंगें और रात को मैं अनजान मर्दों की हवस को शांत करने की मशक्कत करती हूँ .इसमें मिलने वाले पैसों का कोई हिसाब नहीं .अभी मैं चौबीस साल की हूँ ...मेरे पास पैसे कमाने के करीब-करीब उतने ही साल हैं जितने किसी क्रिकेट खिलाडी के पास होते हैं ..मतलब करीब सोलह साल और ......चालीस के बाद कौन मेरे इस जिस्म का खरीदार मिलेगा ! मुझे इन्ही सोलह सालों में अपने बैंक-बैलेंस को बढ़ाना हैं ताकि चालीस के बाद मैं भूखी न मरूं .'' युवती बहुत सहज भाव में ये सब कह गयी पर मुझे एक-एक शब्द ऐसा लगा जैसे कोई मेरे कानों में गरम तेल उड़ेल रहा हो . मैं कहना चाहता था -'' बंद करो ये सब ...चुप हो जाओ ...ऐसी बातें सुनकर मुझे लग रहा है कि एक मर्द होने के कारण मैं भी तुम जैसी औरतों का अपराधी हूँ .आखिर मर्द इतना कमजोर कैसे हो सकता है ? अपनी बहन-बेटी-पत्नी-माँ की अस्मिता की रक्षा हेतु सचेष्ट मर्द अन्य औरतों को क्यों मात्र एक मादक बदन मानकर उसका मनमाना उपभोग करने को आतुर है .'' तभी एक झटके के साथ बस रूक गयी और वो युवती सीट पर से खड़ी हो गयी . उसे शायद यहीं उतरना था .अपना पर्स उठाकर वो चलते हुए मुझसे बोली -'' सॉरी तेरा बहुत दिमाग खाया पर यकीन कर यदि मेरे साथ एक रात बिताएगा तो मैं तेरे सारे शिकवे-गिले दूर कर दूँगी .'' ये कहकर उसने झुककर मेरे गाल पर किस चिपका दिया और तेजी से आगे बढ़कर बस से उतर गयी . मैं भी न जाने किस नशे में उसके पीछे -पीछे वहीं उतरने लगा . बस से उतर कर मैंने चारो ओर देखा तो वो कहीं नज़र न आई . मुझे खुद पर आक्रोश हो आया -'' आखिर कितना कमजोर है मेरा चरित्र जो एक कॉल-गर्ल के पीछे गंतव्य से पूर्व ही बस से उतर लिया ...अरे उसके लिए तो मैं केवल एक रात का साथी मात्र हूँ जो उसके मनचाहे पैसे देकर उसके जिस्म का उपभोग कर सकता हूँ ....पर क्या मैं भी और मर्दों की भांति एक औरत के जिस्म को एक रात में नोच -खसोट कर अपनी हवस पूरी कर पाउँगा ....या अपनी ही नज़रों में गिर जाऊंगा कि मैंने भी औरत को केवल एक जिस्म माना ....नहीं .मैं ऐसा कभी नहीं कर पाउँगा ..मैं उसके तर्कों के आगे झुककर ये मानता हूँ कि यदि ये कॉल-गर्ल न होती तो समाज में इज़्ज़त के साथ रह रही महिलाओं की अस्मिता खतरे में पड़ जाती क्योंकि मर्द की हवस की आग वेश्यालयों में शांत न की जाती तो घर-बाहर हर जगह बहन-बेटियों को दबोचने का सिलसिला जारी रहता पर कब तक ऐसी रानियां खुद बदनाम होकर अपने बदन को दरिंदों के हवाले करती रहेंगी ...मर्द भी कभी कुछ करेगा या नहीं ? शरुआत मुझे खुद से करनी होगी .'' ये सोचते हुए मैंने रानी का दिया कार्ड टुकड़े-टुकड़े कर डाला और हवा में उछाल दिया .

शिखा कौशिक 'नूतन '

शनिवार, 2 मई 2015

जीवन-यात्रा


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जीवन-यात्रा

मशहूर उद्योगपति की पत्नी और दो किशोर पुत्रों की माँ हेम जब भी एकांत में बैठती तब उसकी आँखों के सामने विवाह के पूर्व की  घटना का एक-एक दृश्य घूमने लगता .कॉलेज में उस दिन वो सरस से आखिरी बार मिली थी .उसने सरस से कहा था कि -'' चलो भाग चलते हैं वरना मेरे पिता जी मेरा विवाह कहीं और कर देंगें !'' इस बात पर सरस मुस्कुराया था और नम्रता के साथ बोला था -'' हेम ये सही नहीं है .हम अपना सपना पूरा करने के लिए तुम्हारे पिता जी की इज़्ज़त मिटटी में नहीं मिला सकते .घर से भागकर तुम सबकी नज़रों में गिर जाओगी और मैं एक आवारा प्रेमी घोषित हो कर रह जाऊंगा .अगर हमारा प्यार सच्चा है तो तुम अपने पिता जी को समझाने  में सफल रहोगी अन्यथा वे जहाँ कहें तुम विवाह-बंधन में बंध जाना .'' हेम सरस की ये बातें सुनकर रूठकर चली आई थी .उसने आज तक न पिता से सरस के बारे में कोई बात की थी और अब निश्चय कर लिया था कि पिता जी जहाँ कहेंगें वहीँ विवाह कर लूंगी पर . हेम के  आश्चय की सीमा न रही थी कि अब पिता जी ने उसके विवाह की बात करना ही छोड़ दिया था फिर एक दिन माँ हेम के कमरे में आई एक लड़के का फोटो हाथ में लेकर और हेम को दिखाते हुए बोली -'' तुम्हारे पिता जी ने इस लड़के को तुम्हारे लिए पसंद कर लिया है .'' हेम ने पहले तो गौर से फोटो को नहीं देखा पर एकाएक उसने माँ के हाथ से लगभग छीनते  हुए फोटो को ले लिया और हर्षमिश्रित स्वर में बोली -'' ये तो सरस हैं .'' माँ फोटो हेम से वापस लेते हुए बोली -'' हां ! ये सरस है और इसमें तुझसे ज्यादा समझ है . तू क्या सोचती है तेरे पिता जी को ये नहीं पता था कि तू सरस से प्रेम करती है और घर से भाग जाने  तक तो तैयार  थी .अरे ........ये सब  जानते  थे  .सरस की भलमनसाहत ही भा  गयी इन्हें और अपने एकलौते होने वाले दामाद को अपने साथ बिजनेस में लगा लिया .वहां भी सरस ने अपनी योग्यता साबित की .तेरा तो नाम ही हेम है पर सरस तो सच्चा सोना है !'' माँ के ये कहते ही हेम माँ से लिपटकर कर रो पड़ी थी .आज जब हेम ये सब अतीत में हुई बातों में खोयी थी तभी किसी ने उसके कंधें पर हौले से हाथ रखा तो वह समझ गयी ये सरस ही हैं .उसके मन में आया -'' सरस के बिना उसकी जीवन -यात्रा कितनी रसहीन होती इसकी कल्पना करना भी कठिन है !''

शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

खोखली उदारवादिता -लघु कथा


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गौतम उदारतावादी स्वर में बोला -''लिव-इन कोई गलत व्यवस्था नहीं...आखिर कब तक वही पुराने..घिसे-पिटे सिस्टम पर समाज चलता रहेगा ..विवाह ....इससे भी क्या होता है ? गले में पट्टा डाल दिया बीवी के नाम का और मियां जी घूम रहे है इधर-उधर मुंह मारते हुए .'' सुरेश असहमति में सिर हिलाता हुआ बोला -'' भाई मुझे तो लिव-इन बकवास की व्यवस्था लगती है . दो दिन मौज मनाई और हो लिए अलग ....नॉनसेंस !'' गौतम उसकी हंसी उड़ाता हुआ बोला -'' ये.............ये ही है परंपरावादियों की कमजोरी ..साला आज कोई स्वीकार नहीं करेगा और बीस साल बाद कहेंगें ...लिव -इन ही ठीक व्यवस्था है .'' सुरेश कुछ कहना ही चाहता था कि अंदर से गौतम की पत्नी की आवाज़ आई -'' अजी सुनते हो ..जवान लड़की अब तक घर नहीं लौटी जरा देख कर तो आओ ...रात के नौ बजने आ गए !'' गौतम का चेहरा ये सुनते ही गुस्से से तमतमा उठा .वो भड़कता हुआ बोला -'' अब बता रही हो ..डूब कर मर जाओ ...अभी देखता हूँ ..क्या कहकर गयी थी वो ..कहाँ गयी है ?'' गौतम की पत्नी अंदर से ही बोली -'' कह रही थी शिवम के साथ थियेटर जाएगी ..कोई नाटक का मंचन है ...पर अब तक तो लौट आना चाहिए था !'' गौतम चीखता हुआ बोला -'' हद हो गयी ..मुझ से बिना पूछे ही किसी लड़के के साथ घूमने चल दी ...आज फिट करना ही होगा उसे .'' गौतम को भड़कते देख सुरेश उसे समझाते हुए बोला -'' थियेटर ही तो गयी है ..आ जाएगी ...ट्रैफिक का हाल तो तुम जानते ही हो ...अच्छा भाई मैं भी चलता हूँ !'' ये कहकर सुरेश गौतम के घर से निकल लिया और मन में  सोचने लगा -'' वाह भाई वाह ..लिव-इन ....लड़की का कुछ देर किसी लड़के साथ घूमना तक तो गंवारा नहीं और करते हैं लिव-इन की वकालत !!''

शिखा कौशिक 'नूतन'

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

''रिक्शावाले का प्यार !''


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रविता सीमा से मिलने उसके घर पहुंची तो सीमा की ख़ुशी का ठिकाना न रहा . एक दुसरे का हाल-चाल पूछते पूछते रविता बोली - '' पता है सीमा मैं जिस रिक्शा से आई हूँ उसका चालक बहुत ही रोमांटिक है .एक से एक रोमांटिक सॉन्ग गाता है . आई एम इम्प्रेस्ड !'' इस पर दोनों ठहाका लगाकर हंस पड़ी . सीमा अपनी हंसी रोकते हुए बोली -'' कहीं तुम उसी रिक्शा वाले की बात तो नहीं कर रही जो अपनी रिक्शा को बहुत सजाये रखता है ?'' रविता हाँ में गर्दन हिलाते हुए बोली -'' हाँ..हाँ....वही तो ...!!'' सीमा रविता की हथेली अपनी हथेली में लेते हुए बोली ''अरे यार वो किसी लड़की को इम्प्रेस्ड करने के लिए नहीं गाता ये गाने ..उसे तो अपनी हर सवारी से प्यार है ..कल मेरी दादी जी उसी रिक्शा से आई थी .उन्होंने जब कल उस रिक्शा से उतरते हुए उस रिक्शा वाले से उसके रोमांटिक गाने गाने के बारे में  पूछा कि '' मैं क्या तुझे सोलह साल की नज़र आती हूँ तब उसने दादी जी से कहा था कि उसे तो अपनी हर सवारी से प्यार हो जाता है .चाहे वो दादी जी हो या दादाजी ....कोई युवती हो या कोई युवक ..उसके लिए सब बस एक सवारी हैं और वे ही उसका चढ़ता-उतरता प्यार हैं .'' रविता सीमा की इस बात पर मुस्कुराते हुए बोली -'' कुछ भी कहो लॉजिक है बन्दे की बात में .'' इस पर सीमा और रविता फिर से ठहाका लगाकर हंस पड़ी .

शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

''जागरूक महिलाएं !''


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भावना को सब्ज़ी मंडी से लौटते  हुए अचानक अपनी सहेली अनु मिल गयी .इधर-उधर की बातों के बाद दोनों की बातों के केंद्र में दोनों के बच्चे आ गए .भावना मुंह बनाते हुए बोली - क्या बताऊँ ! मेरा बेटा आठ साल का है और फेसबुक पर दिन-रात पता नहीं अपनी गर्ल-फ्रेंड  से क्या चैट करता रहता है .मैं रोकती हूँ तो कहता है सुसाइड कर लूँगा !'' अनु बड़ा सा मुंह खोलकर ''हा !'' करती हुई बोली -'' क्या बताऊँ मेरी बेटी ने भी नाक में दम कर रखा है . मोबाइल पर  व्हाटस एप पर दिन भर आँख गड़ाए रहती है . अभी सातवें साल में है . पढ़ने को कहो तो बहाने बनाती है . तंग करके रख दिया है !'' भावना उसके सुर में सुर मिलाते हुए बोली - हां ये तो है .वैसे भी कितना टाइम हम बच्चों पर लगा सकते हैं .घर के काम के बाद कुछ शॉपिंग , किटी पार्टी और पसंद के सीरियल ..सब कुछ छोड़ दें क्या !'' अनु भावना का समर्थन करते हुए बोली -'' ...और क्या .हम कोई सिक्टीस -सवेन्टीस की माँ है क्या ? जिनकी अपनी लाइफ ही नहीं होती थी...सुबह से शाम तक बस बच्चे..बच्चे..बच्चे  ...आफ्टर ऑल ..हम आज की जागरूक महिलाएं हैं . ''

शिखा कौशिक 'नूतन'

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

''कॉलेज जाना है या शादी ब्याह में !''


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''माँ मैं कौन सी पोशाक पहनूं ?'' चिया ने चहकते हुए माँ से पूछा तो माँ ने उदासीन भाव से कहा -'' कुछ भी जो शालीन हो वो पहन लो . चिया ने आर्टिफिशल ज्वेलरी दिखाते हुए माँ से पूछा -'' माँ ये माला का सैट कैसा लगेगा मुझ पर ? माँ ने उड़ती-उड़ती नज़र चिया की ज्वेलरी पर डाली और सुस्त से स्वर में बोली -'' हां...............ठीक-ठाक ही है .'' चिया ने अपने लम्बे नाख़ून जो नेल पॉलिश से सजाये थे माँ की ओर करते हुए कहा - माँ देखो ना कैसे लग रहे हैं !'' माँ ने उखड़ते हुए कहा -'' क्या चिया ...कब से दिमाग खाए जा रही है ....पोशाक , ज्वैलरी ,नाखून ...बेटा एक बार कोर्स की किताबे भी देख ले ...कॉलेज जाना है तुझे कहीं शादी -ब्याह में नहीं ..समझी !'' चिया ने माँ की ओर चिढ़ते हुए देखा और आईने  के सामने के खड़ी  होकर बाल संवारने लगी .

शिखा  कौशिक  'नूतन '

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

भगवान की गलती !


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सिया ने माँ से पूछा -'' मैं कालेज की फ्रेंड्स के साथ बाहर कैम्प में चली जाऊं माँ दो दिन के लिए ?'' माँ बोली -'' पिता जी से पूछो ? ''  सिया रसोईघर से कमरे में आई और पिता जी से पूछा कैम्प में जाने के लिए तो वे भड़क कर बोले -'' अरे  सिया की माँ ! तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं जो बकवास बातों के लिए बेटी को मेरे पास मुझसे पूछने भेज देती हो . तुम्हे पता नहीं मैं इस सबके लिए कभी आज्ञा नहीं दूंगा !'' सिया की आँखों में पानी आ गया वो रोते हुए रसोईघर में चली गयी .सिया ने देखा माँ की आँखों में भी नमी थी .सिया को लगा उसने आज बहुत बड़ी गलती कर दी .उसके कारण माँ को भी पिता जी से डांट खानी पड़ी . तभी सिया का दो वर्ष छोटा भाई शोर मचाता हुआ घर में आया और पिता जी से बोला -'' पिता जी मुझे कालेज फ्रेंड्स के साथ बाहर जाना है कैम्प में .मैं चला जाऊं ? '' पिता जी मुस्कुराते हुए बोले -'' इसमें भी कोई पूछने के बात है बेटा ? इस उम्र में मस्ती नहीं करोगे तो क्या हमारी उम्र में करोगे .'' सिया ये सारा वार्तालाप सुनकर मन ही मन खुद को कोसते हुए बोली -'' गलती मैंने नहीं भगवान ने की है ...मुझे लड़की बनाकर .'' और माँ से लिपट कर फिर से रो पड़ी !

शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

''और फूल बिखर गया ''


''और फूल बिखर गया ''
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उस कँटीले जंगल में वो अल्हड़ सी कली निर्भीक होकर मंद-मंद आती समीर के साथ झूल लेती और जब हंसती तो उसके चटकने की मधुर ध्वनि से हर काँटा ललचाई नज़रों से उसे देखने लगता .वो खुद को पत्तों में छिपा लेना चाहती पर कहाँ छिप पाती !! फिर वो कली खिलकर फूल बन गयी .काँटों ने उसे धमकाते हुए कहा -'' हम तुम्हारी रक्षा करेंगें वरना कोई  तुमको तोड़ कर ले जायेगा ...ज्यादा मत मुस्कुराया करो ....न इठलाया करो .न चंचल पवन के झोंको से मित्रता रखो ...तुम कोमल सा एक फूल भर हो ...तुम पर भँवरे भी मंडराने आयेंगें .जो तुम्हारा रस चूसकर निर्लज्जता के साथ तुम्हारा उपहास उड़ाते हुए तुम्हें छोड़कर चले जायेंगें .फूल बनी वो कली उनकी बातें सुनकर सोच में पड़ गयी . ...घबरा गयी . उसका सौंदर्य घटने लगा .सर्वप्रथम उसकी सुरभि नष्ट हो गयी फिर पंखुड़ियों के रंग फीके पड़ने लगे .कली बने फूल  की पंखुड़ियां स्वयं पर लगी पाबंदियों के दुःख के कारण बिखरने लगी . अपने अंतिम क्षणों में कली बने फूल ने देखा कि काँटों ने भी उससे मुंह फेर लिया था .

शिखा कौशिक 'नूतन'

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

''शायद यही प्यार है !''-लघु कथा

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रमन आज अपने जीवन के साठ वें दशक में प्रवेश कर रहा था . उसकी जीवन संगिनी विभा को स्वर्गवासी हुए पांच वर्ष हो चुके थे .रमन आज तक नहीं समझ पाया कि एक नारी की प्राथमिकताएं जीवन के हर नए मोड़ पर कैसे बदलती जाती हैं . जब उसका और विभा का प्रेम-प्रसंग शुरू हुआ था तब विभा से मिलने जब भी वो जाता विभा उससे पूछती -'' आज मेरे लिए क्या खास लाये हो ?'' और मैं मुस्कुराकर एक खूबसूरत सा फूल उसके जूड़े में सजा देता .विवाह के पश्चात विभा ने कभी नहीं पूछा कि मैं उसके लिए क्या लाया हूँ बल्कि घर से चलने से पहले और घर पहुँचने पर बस उसके लबों पर होता -'' पिता जी की दवाई ले आना , माता जी का चश्मा टूट गया है ..ठीक करा लाना ,  और भी बहुत कुछ ..मानों मेरे माता-पिता मुझसे बढ़कर अब विभा के हो चुके थे . बच्चे हुए तो बस उनकी फरमाइश पूरी करवाना ही विभा का काम रह गया -''बिट्टू को साईकिल दिलवा  दीजिये ....मिनी को उसकी पसंद की गुड़िया दिलवा लाइए ...'' रमन ने मन में सोचा  -'' मैं चकित रह जाता आखिर एक प्रेमिका से पत्नी बनते ही कैसे विभा बदल गयी .अपने लिए कुछ नहीं और परिवार की छोटी-से छोटी जरूरत का ध्यान रखना . शायद इसे ही प्यार कहते हैं जिसमे अपना सब कुछ भुलाकर प्रियजन से जुड़े हर किसी को प्राथमिकता दी जाती है .'' रमन ने लम्बी साँस ली और विभा की यादों में खो गया क्योंकि यही उसके जीवन के साथ वे दशक में प्रवेश का सबसे प्यारा उपहार था .

शिखा कौशिक 'नूतन'

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

हम इंसान हो गए -लघु कथा


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हम इंसान हो गए -लघु कथा

खुशबू कालेज जा रही थी . बीच रास्ते में उसकी सेंडिल की हील निकल गयी . पीछे से आती एक बाइक रुकी .खुशबू ने मुड़कर देखा तो ये साहिल था .साहिल बाइक से उतरा और उसकी सेंडिल हाथ में लेता हुआ बोला -चलो इसे ठीक करा देता हूँ पास में ही एक मोची बैठता है .खुशबू थोड़ा लज्जित होते हुए बोली -अरे आप क्यों मेरे सेंडिल हाथ में लेते हैं किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा कि नीच जाति की लड़की की सेंडिल एक ब्राह्मण लड़का हाथ से उठा रहा है .साहिल ठहाका लगाता हुआ बोला -'' चुप से चलती हो या तुम्हें भी उठाना पड़ेगा .'' इस घटना के दो साल बाद साहिल और खुशबू ने प्रेम-विवाह किया तब खुशबू साहिल को वरमाला पहनाते हुए बोली थी -'' आज से तुम मेरी नीच जाति के हो गए या मैं ब्राह्मण हो गयी ?'' साहिल ने उसकी वरमाला पहनते हुए कहा था -'' आज से हम इंसान हो गए .

डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 5 अप्रैल 2015

अहंकार और प्यार -लघु-कथा

अहंकार और प्यार -लघु-कथा
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बैंक अधिकारी रजत ने ज्वेलरी की दुकान से डायमंड रिंग खरीदी और इस भाव से भरकर उस पर एक नज़र डाली कि-''कोई भी पति अपनी पत्नी के लिए वेडिंग ऐनिवर्सरी का इससे ज्यादा महगा गिफ्ट नहीं ले सकता !'' रजत घर पहुँचा तो उसने पाया उसकी वाइफ पायल ने आज सब कुछ अपने हाथों से उसके पसंद का बनाया था खाने में . उसने पायल के समीप पहुँच कर कहा -'' हाथ आगे करो ..मैं तुम्हें कुछ गिफ्ट देना चाहता हूँ !' पायल ने सकुचाते हुए हाथ आगे किया तो रजत ने पाया उसकी रिंग फिंगर पर पट्टी बंधी थी .रजत ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा -'' ये चोट कैसे लगी ?'' पायल मुस्कुराते हुए -'' अरे कुछ नहीं ..ये तो खाना बनाते हुए लग गयी ..आज बहुत दिन बाद आपके लिए कुछ बना रही थी ना ...नौकरों के कारण आदत ही नहीं रही कोई काम करने की !'' रजत ने डायमंड रिंग सकुचाते हुए पायल के आगे करते हुए कहा -'' ये छोटा सा गिफ्ट तुम्हारे लिए .'' और मन में सोचा -''पायल ने चोट लगने के बावजूद मेरे लिए मेरी पसंद का खाना बनाया इसमें उसका प्यार झलकता है और मेरे गिफ्ट में मेरा अहंकार ..उस प्यार के आगे इस मंहगे गिफ्ट का कोई मूल्य नहीं !''


डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

''भाव ही सबसे सुन्दर ''-लघु कथा

''भाव ही सबसे सुन्दर ''-लघु कथा
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लड़के ने कहा 'तुम्हारी आँखें बहुत सुन्दर हैं !'' लड़की मुस्कुराई और बोली -'' आँखें नहीं ...इनमें तुम्हारे प्रति झलकता प्यार का भाव सुन्दर है !'' लड़का बोला -'' तुम्हारे होंठ गुलाब की पंखुड़ियों के समान सुन्दर हैं !'' लड़की हँसी ,उसके गालो पर लाली छा गयी और वो बोली -''मेरे होंठ सुन्दर नहीं ..ये तुम्हारे कोमल भाव हैं मेरे प्रति जिसके कारण तुम्हें ये गुलाब की पंखुड़ियां लग रहे हैं ..नहीं तो ये बहुत साधारण हैं !'' लड़के ने कहा -'' तुम्हारे गालो पर आई ये लालिमा कितनी मादक है !'' लड़की ने कहा-''ये तो तुहारे द्वारा की जा रही प्रशंसा के कारण उत्पन्न लज्जा भाव का कमाल है !'' लड़का झुंझलाकर बोला -''ओफ्फो !!! मैं तुम्हारी सुंदरता की प्रशंसा कर रहा हूँ और तुम हो कि भाव ..भाव ...भाव लिए बैठी हो !'' लड़की ठहाका लगाकर बोली -'' जो जीवित है उसमे जो भी सुंदरता है वो भावों की है ..देह की नहीं ! तुम ऐसा करना जब मैं मर जाऊं तब इस देह के प्रशंसा करना तब तुम्हें पता चलेगा कि भावों से रहित सुन्दर देह कितनी वीभत्स होती है !!''


शिखा कौशिक 'नूतन'

रविवार, 29 मार्च 2015

सबसे सुन्दर लड़का -लघु कथा

सबसे सुन्दर लड़का -लघु कथा

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वो खूबसूरत लड़की जब सड़क पर चलती थी तब अपने में ही खोई रहती . उसको खबर न होती कि कोई लड़का उसका पीछा कर रहा है . एक दिन एक संकरी गली में उस पीछा करने वाले लड़के ने आगे आकर उसका रास्ता रोक लिया .वो घबराई .उसकी नीली झील सी आँखों में आंसू भर आये .उसने हाथ जोड़कर  कहा - ''मुझे जाने  दो '' .यदि किसी ने मुझे तुमसे बात करते देख लिया तो मेरी बदनामी हो जाएगी .मैं लड़की हूँ ना !'' लड़का थोड़े रोष में बोला -'' तुम क्या समझती हो मैं तुम्हे बदनाम करने के लिए तुम्हारा पीछा करता हूँ .तुम तो इतनी बेखबर होकर चलती हो सड़क पर कि न जाने कब कोई गुंडा-मवाली  तुम्हे कहीं ऐसी ही सूनसान गली में दबोच ले और तुमको हवस का शिकार बना ले .मैं कई दिन से तुम्हे यही समझाने के लिए तुम्हारा पीछा कर रहा हूँ कि तुम एक लड़की हो इसलिए नज़रे उठाकर , सावधान रहकर ,आत्म-विश्वास के साथ सड़क पर चलो .समझी !'' खूबसूरत लड़की ने आँखें उठाकर देखा दुनिया का सबसे सुन्दर लड़का उसके सामने खड़ा था .  

डॉ.शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 28 मार्च 2015

ख़राब लड़की



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 ख़राब लड़की -story
इक्कीस वर्षीय सांवली -सलोनी रेखा को उसी लड़के ने कानपुर बुलाकर क़त्ल कर दिया जिसने उससे शादी का वादा किया था . लड़के के प्रेम-जाल में फँसी रेखा न केवल क़त्ल की गयी बल्कि अपने शहर में बदनाम भी हो गयी कि वो एक ख़राब लड़की थी .कातिल लड़के के प्रति लोगों की बड़ी सहानुभूति थी कि 'रेखा ने पहले मर्यादाओं का उल्लंघन कर विवाह से पूर्व उस बेचारे से शारीरिक सम्बन्ध बनाये और अब उस पर शादी का दबाव डाल रही थी .इसी कारण वो 'बेचारा' मेरठ छोड़कर 'कानपुर' में जाकर कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने लगा था .क़त्ल न करता तो क्या करता ?ऐसी ख़राब लड़की से शादी के लिए उसके घर वाले तैयार नहीं थे .'' घिन्न आती है मुझे ऐसी सामाजिक सोच से जो अपराधी से सहानुभूति केवल इसलिए रखती है क्योंकि वो स्त्री-पुरुष संबंधों में होने वाले किसी भी अपराध के लिए पूर्ण रूप से स्त्री को ही दोषी ठहरा देती है .
रेखा ,मुझसे व् मेरी सहपाठिनी राधा से तीन क्लास जूनियर थी .अब जब स्नातकोत्तर किये हुए हमें कई वर्ष बीत चुके हैं तब रेखा के क़त्ल के बारे में इंटर कॉलिज में अध्यापन कर रही राधा ने ही मुझे ,एक दिन मेरे घर की बैठक में पड़े  दीवान पर बैठे-बैठे ,बताया था कि -'' रेखा की इस दुर्गति का असल जिम्मेदार उसका नकारा पिता ही है .बचपन से ही रेखा के पिता ने रेखा ,रेखा की माता जी व् उसके दो छोटे भाइयों के पालन-पोषण से अपने हाथ झाड़ लिए थे .रेखा की माता जी ने सिलाई-कढ़ाई का काम कर बच्चों के पालन-पोषण का भार  खुद पर ले लिया .रेखा का पिता ऊपर से उन पर दबाव बनाता कि वे मेरठ में लिया गया मकान बेचकर गांव जाकर उसके बड़े भाई-भाभी की सेवा करें .जब रेखा की माता जी ने बच्चों की पढ़ाई का वास्ता देकर इंकार किया तो उसने उन्हें मारा-पीटा जिससे क्षुब्ध होकर रेखा के बारह वर्षीय भाई ने एक बार अपने इस नकारा पिता पर चाकू से प्रहार भी कर दिया था .'' राधा ने मेरी हथेली अपनी हथेली से कसते हुए प्रश्न किया -'' रेखा ऐसे हालातों में पली-बढ़ी थी . तू ही बता नंदी क्या ख़राब लड़की किशोरावस्था से ही घर की जिम्मेदारी उठाने का साहस कर सकती है ?'' मैंने राधा के प्रश्न पर इस समाज की सोच पर बिफरते हुए कहा -'' रेखा को ख़राब लड़की कहना हर उस लड़की का अपमान है जो मेहनत  कर के अपने परिवार के पालन-पोषण में सहयोग करती है .क्या खराबी थी उसमे ? जिसे जीवन साथी चुना उसे विवाह पूर्व अपना सब कुछ समर्पित करने की भूल कर बैठी ? इसमें वो कातिल लड़का भी तो बराबर का जिम्मेदार है .जब उसे विवाह नहीं करना था तो उसने रेखा से शारीरिक-सम्बन्ध क्यों बनाये ? और जब इस सब में उसे कोई आपत्ति नहीं थी तो विवाह करने में क्यों घर वालो की मर्जी का बहाना बनाने लगा ? रेखा की भूल यही थी ना कि उसने किसी लड़के से प्रेम किया , उस पर विश्वास कर अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया और उस पर विवाह का दबाव बनाया ...ये न करती तो क्या करती !!!'' रेखा ने पिता के रूप में ऐसा नकारा पुरुष पाया जो केवल वासना-पूर्ति के लिए किसी स्त्री के गर्भ में अपना बीज छोड़ देता है और जब वो बीज एक पौधा बनकर गर्भ से बाहर आता है औलाद के रूप में तब वो नकारा पुरुष उसकी जड़ें सींचने से इंकार कर देता है . राधा मैं तो कहती हूँ ऐसे इंसान को तो चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए !'' राधा मेरी इस भावुक टिप्पणी पर गंभीर होते हुए बोली -''नंदी क्या कहूँ ...ऐसा लगता है जैसे हम लड़कियां पुरुष प्रधान समाज की फौलादी जंजीरों से जकड़ी हुई हैं .पिछले वर्ष जब मैं रेखा से मिली थी तब उसने बताया था कि सारे रिश्तेदार उसके पिता पर उसके विवाह के लिए दबाव डाल रहे हैं पर वो ये कहकर टाल देता है कि रेखा अभी विवाह करना ही नहीं चाहती .उस ज़लील को ये दिख गया था कि रेखा ही कमा कर लाती है .यदि उसका विवाह कर दिया तो कैसे काम चलेगा ? फिर वो क्यों रेखा के विवाह के ..उसके भविष्य के बारे में सोचता ! रेखा ने ऐसी परिस्थितयों में जब स्वयं वर ढूढ़ लिया तब यही नकारा पिता पूरे समाज में उसे बदनाम करने में जुट गया .''रेखा ख़राब लड़की है '' ये ठप्पा सबसे पहले उस नीच -मक्कार पिता ने ही रेखा पर लगाया .जिस पिता का कर्तव्य था कि यदि बेटी को बहकते देखे तो उसे समझा-बुझाकर सही मार्ग पर लाये ..वही उसका बैरी बन बैठा . रेखा का दुर्भाग्य तो देखो नंदी ....पिता के रूप में भी पुरुष से धोखा खाया और जीवन-साथी के रूप में भी जिस पुरुष को चुना उससे भी धोखा ही खाया .ऐसा लगता है नंदी कि पुरुष का स्वभाव धोखा देना ही है .'' मैं राधा के कंधे से सरकते हुए दुपट्टे को ठीक करते हुए बोली थी -'' ठीक कहती हो राधा ! अच्छी लड़की ,ख़राब लड़की -कितनी श्रेणियों में बाँट दी जाती है लड़की . उसकी विवशता ,अल्हड़पन का फायदा उठाने वाला पुरुष ही उसे पतिता ,नीच ,छिनाल की संज्ञा देकर गर्व की अनुभूति करता है . कई बार तो आश्चर्य होता है कि इतने युगों से समाज की इतनी स्त्री-विरोधी सोच के बीच भी स्त्री आज तक ज़िंदा कैसे है ? '' राधा दीवार पर लगी घडी में समय देखते हुए दीवार पर से खड़े होते हुए बोली - '' नंदी इस पर तो स्त्रियों से ज्यादा पुरुषों को आश्चर्य होना चाहिए कि आखिर गर्भ में निपटाया , पैदा हुई कन्या को ज़िंदा जमीन में गड़वाया , दहेज़ की आग में जलाया , तंदूर में भुनवाया , बदनामी की फाँसी पर चढ़ाया , बलात्कार का अस्त्र चलाया ...फिर भी स्त्री ज़िंदा कैसे है ? खैर ...चलने से पहले तुम्हें एक बात और बता दूँ ...रेखा के क़त्ल से भी उसका पिता लाभान्वित ही हुआ है .क़त्ल होकर भी वो ख़राब लड़की अपने पिता को लखपति बना गयी .रेखा के ज़लील पिता ने रेखा के कातिल को फाँसी पर न चढ़वाकर उससे सौदा कर लिया है बीस लाख में . रेखा का पिता कातिल लड़के के खिलाफ किया गया अपना केस वापस ले रहा है . नंदी तुम नहीं जानती रेखा अक्सर कहती थी कि वो घर में पालतू जानवर नहीं पालती  क्योंकि उनके मरने पर बहुत दुःख होता है पर रेखा के पिता के लिए पालतू ख़राब लड़की का मर जाना भी बहुत सुखदायी रहा ना नंदी !'' ये कहते हुए राधा ने अपने घर जाने के लिए कदम बढ़ा लिए और भारी मन से मैं राधा को जाते हुए देखती हुई सोचने लगी -'' हे ईश्वर जिस घर में बेटी की ऐसी दुर्गति हो उस घर में बिटिया कभी न हो ........'' मन से तभी एक और आवाज़ आई -'' तब तो एक घर क्या इस धरती पर ही कोई बिटिया न हो !!!''



शिखा कौशिक ''नूतन'

रविवार, 22 मार्च 2015

”प्रायश्चित-जनवाणी में प्रकाशित ”


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''नीहारिका का कन्यादान मैं और सीमा नहीं बल्कि तुम और सविता  करोगे क्योंकि तुम दोनों को ही नैतिक रूप से ये अधिकार है .'' सागर के ये कहते ही समर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा और हड़बड़ाते हुए बोला -'' ये आप क्या कह रहे हैं भाईसाहब !...नीहारिका आपकी बिटिया है .उसके कन्यादान का पुण्य आपको ही मिलना चाहिए .हम दोनों ये पुण्य आप दोनों से नहीं छीन सकते .'' सागर कुर्सी से उठते हुए सामने बैठे समर को एकटक दृष्टि से देखते हुए हाथ जोड़कर बोला -'' समर  तुम मेरी बहन के पति होने के कारण हमारे माननीय हो .तुमसे मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि नीहारिका का कन्यादान  तुम दोनों ही करना .मैं नीहारिका को भी अँधेरे में नहीं रखना चाहता .....सीमा...कहाँ है नीहारिका ? उसे यही बुलाओ !'' सागर के ये कहते ही सीमा  ने नीहारिका को आवाज़ लगाई .नीहारिका के ''आई माँ '' प्रतिउत्तर को सुनकर  सविता ,समर ,सीमा व् सागर उसके आने का इंतज़ार करने लगे .नीहारिका के स्वागत  कक्ष  में प्रवेश करते ही चारों  एक-दूसरे  के चेहरे  ताकने  लगे .
                     नीहारिका ने सब को चुप देखकर मुस्कुराते हुए कहा  -अरे भई इस कमरे में तो कर्फ्यू लगा है और मुझे बताया भी नहीं गया .'' नीहारिका के ये कहते ही सबके चेहरे पर फैली गंभीरता थोड़ी कम हुई और सब मुस्कुरा दिए .सविता ने अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए नीहारिका का हाथ पकड़कर उसे अपनी कुर्सी पर बैठाते  हुए कहा -''लाडो रानी..अब यहाँ बैठो और और सुनो भाई जी तुमसे कुछ कहना चाहते हैं .''  सविता के ये कहते ही नीहारिका भी एकदम गंभीर हो गयी क्योंकि उसने अपने पिता जी को ऐसा गंभीर इससे पहले दो बार ही देखा था .एक बार जब बड़ी दीदी प्रिया  की विदाई हुई थी और दूसरी बार तब जब मझली दीदी सारिका की विदाई हुई थी .दोनों बार पिता जी विदाई के समय बहुत गंभीर हो गए थे पर रोये  नहीं थे जबकि माँ व् बुआ जी का  रो-रो कर बुरा हाल हो गया था .''नीहारिका बेटा '' पिता जी के  ये कहते ही नीहारिका के मुंह से अनायास ही निकल गया -'' जी पिता जी ...आप कुछ कहना चाहते हैं मुझसे ?'' नीहारिका के इस प्रश्न पर सागर कुर्सी पर बैठते हुए बोला -''हां बेटा ..आज मैं अपने दिल पर पिछले चौबीस साल से रखे एक बोझ को उतार देना चाहता हूँ ...हो सकता है आज के बाद तुम्हें  लगे कि तुम्हारे पिता जी संसार के सबसे अच्छे पिता नहीं है पर मैं सच स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ .बात तब की है जब मेरी दो बेटियों का जन्म हो चुका  था  . और तुम अपनी माँ के गर्भ में आ चुकी थी .मैं दो बेटियों के होने से पहले ही निराश था .सबने कहा ''पता कर लो सीमा के गर्भ में बेटा है या बेटी ..यदि बेटी हो तो गर्भ की सफाई करा दो '' मैंने तुम्हारी माँ के सामने ये प्रस्ताव रखा तो उसने मेरे पैर पकड़ लिए .वो इसके लिए तैयार नहीं थी पर मुझ पर बेटा पाने का जूनून था .मैंने तुम्हारी माँ से साफ साफ कह दिया था कि यदि टेस्ट को वो तैयार न हो तो अपना सामान बांधकर मेरे घर से निकल जाये .तुम्हारी माँ मेरे दबाव में नहीं आई .ये देखकर मैं और भी बड़ा शैतान बन गया और एक रात मैंने प्रिया और सारिका सहित तुम्हारी माँ को धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया .तुम्हारी माँ दर्द से कराहती हुई घंटों किवाड़ पीटती रही पर मैंने नहीं खोला .ये तुम्हारी दीदियों को लेकर मायके गई पर वहां इसके भाई-भाभी ने सहारा देने से मना कर दिया और कानपुर सविता व् समर को इस सारे कांड की जानकारी फोन पर दे दी तुम्हारे मामा जी ने .सविता और समर जी यहाँ आ पहुंचे .सविता ने तब पहली बार मेरे आगे मुंह खोला था .उसने दृढ़ स्वर में  कहा था -'' भाई जी भाभी के साथ आपने ठीक नहीं किया .मेरे भी तीन बेटियां  हैं यदि ये मुझे इसी तरह धक्का देकर घर से निकाल देते तब मैं कहाँ जाती और आप क्या करते ? ये तो दो बेटियों के होने पर ही संतुष्ट थे .मेरी ही जिद थी कि एक बेटा तो होना ही चाहिए ....तब ये तीसरे बच्चे के लिए तैयार हुए .अब सबसे ज्यादा प्यार ये तीसरी बेटी को ही करते हैं और आपने इस डर से कि कहीं तीसरा बच्चा बेटी ही न हो जाये भाभी को फूल सी बेटियों के साथ रात में घर से धक्के देकर बाहर निकाल दिया ..पर अभी इन बच्चियों के बुआ-फूफा मरे नहीं है .मैं लेकर जाउंगी भाभी को बच्चियों के साथ अपने घर ...अब भाई जी ये भूल जाना कि आपके कोई  बहन भी है !'' मैं जानता था कि सविता मेरे सामने इतना इसीलिए बोल पाई थी क्योंकि उसे समर का समर्थन प्राप्त था .मैंने गुस्से में कहा था -'' जाओ ..तुम भी निकल जाओ .'' सविता ने अपना कहा निभाया और तुम्हारी माँ व् दीदियों को कानपुर ले गयी .वहीं  कानपुर में तुम्हारा जन्म हुआ .यहाँ मेरठ से मेरा तबादला भी कानपुर हो गया .स्कूल के एक कार्यक्रम में हमारे बैंक मैनेजर शर्मा जी को मुख्य-अतिथि के रूप में बुलाया गया .उनके साथ मैं भी गया .वहां तुम्हारी प्रिया दीदी ने नृत्य का एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया .प्रिया की नज़र जैसे ही मंच से मुझ पर पड़ी वो नृत्य छोड़कर दौड़कर मेरे पास आकर मुझसे लिपट गयी .वो बिलख-बिलख कर रोने लगी और मैं भी . मेरी सारी हैवानियत को प्रिया के निश्छल प्रेम ने पल भर में धो डाला . मैनेजर साहब को जब सारी स्थिति का पता चला तो उन्होंने बीच में पड़कर सारा मामला सुलझा दिया।
सीमा ने जब पहली बार तुम्हे मेरी गोद में दिया तब तुमने सबसे पहले अपने नन्हें-नन्हें हाथों से मेरे कान पकड़ लिए ..शायद तुम मुझे डांट पिला रही थी .सविता ,समर व् सीमा ने ये निश्चय किया था कि इस घटना का जिक्र परिवार में बच्चों के सामने कभी नहीं होगा  पर उस दिन से आज तक मुझे यही भय लगता रहा कि कहीं तुम्हें अन्य कोई ये न बता दे कि मैं तुम्हे कोख में ही मार डालना चाहता था . नीहारिका बेटा ये सच है कि मैं गलत था ..तुम चाहो तो मुझसे नफरत कर सकती हो पर आज अपना अपराध स्वीकार कर मैं राहत की साँस ले रहा हूँ ..मुझे माफ़ कर देना बेटा !'' ये कहते कहते सागर की आँखें भर आई .नीहारिका ने देखा सबकी आँखें भर आई थी .नीहारिका कुर्सी से उठकर सागर की कुर्सी के पास जाकर घुटनों के बल बैठते हुए बोली -पिता जी ..ये सब मैं नहीं जानती थी ...जानकार भी आपके प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं आई है बल्कि मुझे गर्व है कि मेरे पिता जी में सच स्वीकार करने की शक्ति है ...मेरे लिए तो आज भी आप मेरे वही  पिता जी है जो बैंक से लौटते  समय मेरी पसंद की टॉफियां अपनी पेंट की जेब में भरकर लाते थे और दोनों दीदियों से बचाकर दो चार टॉफी मुझे हमेशा ज्यादा देते थे और मैं भी पिता जी आपकी वही नीहारिका हूँ जो चुपके से आपके कोट की जेब से सिक्के चुरा लिया करती थी ...नहीं पता चलता था ना आपको ?'' नीहारिका के ये कहते ही सागर ने उसका माथा चूम लिया .समर भी ये देखकर मुस्कुराता हुआ बोला -'' अब नीहारिका तुम ही निर्णय करो कि तुम्हारा कन्यादान मैं और सविता करें या तुम्हारे माँ-पिता जी ?'' नीहारिका लजाते हुए बोली -'' फूफा जी ...ये आप दोनों ही जाने .'' ये कहकर वो शर्माती हुई वहां  से चली गयी .समर ने सागर के कंधें पर हाथ रखते हुए कहा -'' कन्यादान भाईसाहब आप ही करेंगें ..और अब तो आपने अपने हर अपराध का प्रायश्चित भी कर लिया है .'' समर के ये कहने पर सागर ने सीमा व् सविता की ओर देखा .उन दोनों की सहमति पर सागर ने भी लम्बी सांस लेकर सहमति में सिर हिला दिया .

शिखा कौशिक 'नूतन '