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शुक्रवार, 17 जून 2022

यथा राजा तथा प्रजा - लघुकथा

 यथा राजा तथा प्रजा - लघुकथा 



राजभवन से निकलते ही प्रजा ने अपने सम्राट को घेर लिया. कुछ प्रजा ज़न अत्यंत भावुक होकर सम्राट के चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाने लगे - " महाराज भुखमरी, बढ़ते अपराध, बेरोजगारी के कारण हम बहुत त्रस्त हैं. प्रभु कृपा कीजिए. हमारी रक्षा कीजिए." सम्राट उन सब को आश्वस्त करते हुए बोले - " घबराये नहीं. मैंने मंहगाई, बेरोजगारी, अपराधों पर फिल्म बनाने के निर्देश दे दिए हैं. राष्ट्र हित में हुआ तो उन फ़िल्मों को टैक्स फ्री भी कर दूँगा. ठीक है! " प्रजा यह आश्वासन पाते ही हर्ष मग्न होकर नृत्य करने लगी।

शुक्रवार, 10 जून 2022

नंगी राजनीति - लघुकथा

 


राजनीति किसी इंसान को कैसे दरिन्दा बना देती है? आज और अभी सोलह वर्षीय स्नेहा ने अपनी आंखों से देखा था. नेता जी के समर्थक किस तरह चुनाव में उनका विरोध कर रही दलित बस्ती को तहस नहस कर के गए थे, यह झोपड़ी के कोने में दुबकी वह देखती रही थी पर उसके लहुलुहान पिता ने यह कहकर संतोष की सांस ली थी कि - अच्छा हुआ गुंडों की नज़र जवान बेटियों पर नहीं पड़ी नहीं तो हम नंगे ही हो जाते। "

सोमवार, 10 अगस्त 2020

स्मृति के योग्य - लघुकथा

एक सामयिक लघुकथा

नगर के मुख्य मार्ग पर बनी दीवार के सामने दो युवक बुरी तरह लड़ रहे थे. काफी भीड़ इकट्ठा हो गयी थी. वहां से गुजरते नगराध्यक्ष ने यह नज़ारा देखा तो वे रूक गये. उन्होंने दोनों युवकों को लड़ने से रोकते हुए पूछा - भाईयों क्यों आपस में कलह कर रहे हो? पहला युवक बोला - महोदय   इस दीवार पर हम अपने अपने पिताजी की स्मृति ताजा रखने के लिए उनका नाम अंकित करने को लेकर  झगड़ रहे हैं कि कौन इसका अधिकारी है? "नगराध्यक्ष महोदय सहजता के साथ दोनों को समझाते हुए बोले -" बस इतनी सी बात! अरे भाई जिसके पिताजी दौलत वाले रहे हों ; वह ही अपने पिताजी का नाम दीवार पर अंकित कर दे. दौलत वाले ही स्मृति में रखने के योग्य होते हैं. "यह कहकर नगराध्यक्ष महोदय वहां से चल दिये और इकट्ठा हुई भीड़ उनके न्याय की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगी. - डॉ शिखा कौशिक नूतन

मंगलवार, 3 मार्च 2020

नदी - लघुकथा

नदी - लघुकथा
 जब भी उदास होता रघु नदी किनारे जाकर बैठ जाता. कभी मां की तरह उसकी शीतल जलधारा दुख के ताप हर लेती . कभी बड़ी बहन सी कलकल करती मीठी बोली में सांत्वना सी देती. कभी भाभी बनकर चंचल लहरों के रूप में रघु को देवर की तरह छेड़ते हुए उछलती बूंदें चेहरा भिगा जाती और जब भी आंखों से छिटककर आंसू नदी के जल में समा जाते तब रघु को नदी अपनी प्रेयसी प्रतीत होती जिसके नीले स्वच्छ जल रूपी दर्पण में अपना उदास चेहरा देखकर वह मुस्कुरा देता.
-डॉ शिखा कौशिक नूतन

रविवार, 1 मार्च 2020

विद्यालय - लघुकथा

विद्यालय - लघुकथा
उस चारदीवारी से घिरी बिल्डिंग को मैंने विद्यालय का दर्जा कभी नहीं दिया. मेरे लिए तो मेरे प्रिय अध्यापक रामदेव जी ही विद्यालय के पर्याय थे. वे किसी वृक्ष के नीचे बैठाकर पढ़ा देते तो वही वृक्ष मेरा विद्यालय हो जाता. उनके सेवानिवृत्त होने के समय मैं ग्यारहवीं का छात्र था
. एक वर्ष में मैंने ईट - सीमेंट की उस बिल्डिंग को बिल्कुल वैसा ही पाया था जैसे आत्मा के बिना देह. सच्चाई यही है कि अच्छे अध्यापक ही विद्यालय का सजीव रूप हैं.
-डॉ शिखा कौशिक नूतन

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

जंगल - लघुकथा

शहर में एक तनावपूर्ण चुप्पी थी. ऑफिस से लौटते समय समर इस स्थिति को भांप चुका था. बस स्टैंड पर शाम के सात बजे अकेला ही खड़ा वह बस का इंतजार करने लगा. दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था आज जबकि सामान्य दिनों में भारी भीड़ का साम्राज्य रहता था वहां. तभी उसे तीन चार बाइकों पर सवार हथियार लहराते युवक अपनी ओर आते दिखाई दिये, जो पास आते ही इंसान से भेड़ियों में तब्दील हो गये. उन्होंने उसका नाम पूछा, पैंट उतरवाई और उस पर हमला बोल दिया. मारपीट व लूटपाट कर वे भेड़िये फरार हो गए और खून से लथपथ जमीन पर पड़े समर को लगा जैसे सारा शहर जंगल हो गया है.
-डॉ शिखा कौशिक नूतन 

आग - लघुकथा

गांव में बारिश हुई. लकड़ियां गीली हो गयी. मां दुखी होकर बोली - अब चूल्हा कैसे जलेगा? बेटा व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - मां चिंता मत कर. मैं नफरत की आग लगाकर सांप्रदायिकता फैलाने वाले नेता को फोन कर बुला लेता हूं, उसने सारे मुल्क में आग लगा डाली चूल्हे की क्या औकात है! - नूतन