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मंगलवार, 18 मार्च 2014

''अजी बावली है बीजेपी''- short -story


  ''अजी सुनते हैं आजकल  एक नारा ''अबकी बार। मोदी सरकार '' दिन-रात दूरदर्शन पर सुनते -सुनते मैंने भी ये मन बना लिया है कि मैं इस बेचारे को ही वोट दे दूँगी। इसका चुनाव निशान क्या है जी ? श्रीमती जी के ये पूछते ही उनके पतिदेव भड़कते हुए बोले -''मुझे क्या पता ?इस बेचारे से ही पूछ  लो। मैं तो बीजेपी को वोट दूंगा और उसका चुनाव -निशान है 'कमल '। ''पतिदेव के जवाब पर श्रीमती जी मुंह बनाते हुए बोली -''  अजी छोडो भी बीजेपी का राग अलापना। देख लेना अपने मोदी की ही सरकार बनेगी और आपकी बीजेपी धूल का फूल बनकर रह जायेगी। बड़े आये कमल वाले !'' पतिदेव श्रीमती जी के ये कहते ही ठहाका लगाते हुए बोले -''अरी बावली मोदी बीजेपी के ही तो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं !'' श्रीमती जी उलाहना देती हुई बोली -''अजी बावली मैं नहीं आपकी बीजेपी है जो नारा ये देने के बजाय ''अबकी बार -बीजेपी सरकार '' ये दे रही है -''अबकी बार -मोदी सरकार '' ...... !''

शिखा कौशिक 'नूतन '

सोमवार, 17 मार्च 2014

ऑनर किलिंग रुके कैसे ?-कहानी




रणवीर  का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुँच  गया और कॉलेज की कैंटीन में उसने अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए टेबिल की दूसरी तरफ  सामने की कुर्सी पर बैठे सूरज के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया .सूरज भी तिलमिलाता हुआ अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और टेबिल के ऊपर से झुककर रणवीर की कमीज़ का कॉलर पकड़ लिया .आसपास बैठे दोस्तों ने दोनों को पकड़कर अलग कराया .रणवीर सुलगता हुआ बोला '' ये ऑनर  किलिंग नहीं है ..ये सजा है बाप-भाई को धोखा देने की ..उन्हें समाज में बेइज्ज़त करने की , मर्यादाओं को ठेंगा दिखाने की और फिर तू बर्दाश्त कर लेगा अगर तेरी बहन ...!!!'' रणवीर  अपनी बात पूरी करता इससे पहले ही सूरज चीखता हुआ बोला -'' अपनी गन्दी जुबान बंद कर ..वरना !'' सूरज की ललकार पर रणवीर तपते लोहे की तरह उसे तपाता हुआ बोला - '' वरना..वरना क्या ?निकल गया सारा आधुनिकतावाद ..मानवतावाद ..भाई जिस पर पड़ती है वो ही जानता है .एक बाप ने बेटी पर विश्वास कर उसे पढ़ने भेजा और वो पढाई छोड़कर प्रेम -प्यार  के चक्कर में पड़ कर किसी के साथ भाग गयी .बाप ने जहर खा लिया .यदि बाप ऐसे में मर जाये तो क्या ऐसी विश्वासघातिनी बेटी पर बाप की हत्या का मुकदमा नहीं चलना चाहिए ? मैं भी किसी के क़त्ल का समर्थन नहीं करता पर जिस बाप की बेटी बाप को धोखा देकर किसी के साथ भाग जाये या जिस भाई की बहन ऐसा ज़लील काम कर जाये उसे ये मानवतावाद की बातें पल्ले नहीं पड़ती .वो या तो फांसी लगाकर खुद मर जाता है या बेटी-बहन और उसके प्रेमी को फांसी चढ़ा देता है .कारण वही एक  है-हर बाप और भाई अपने घर की लड़की पर विश्वास करते है कि वो ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे इस समाज के सामने उन्हें शर्मिंदा होना पड़े पर जब वो विश्वासघात कर... घर की इज्जत नीलाम कर ..किसी अजनबी पर विश्वास कर भाग जाती है ..सब मर्यादाएं तोड़कर.. तब केवल बाप-भाई को दोष देना कहाँ तक उचित है ऐसे कत्लों में ..क्या लड़की का यही कर्तव्य है ?..समाज की जो भी निर्धारित  मान्यताएं हैं वो किसी एक बाप-भाई ने तो बनाई नहीं ..सदियों से चली आ रही है ..उनसे कैसे एकदम नाता तोड़ दें वे बाप-भाई  ?'' सूरज थोडा ठंडा होता हुआ बोला -'' मैं कब मर्यादाओं के उल्लंघन की बात कर रहा हूँ पर बाप-भाई को ये तो देखना चाहिए कि यदि लड़की द्वारा चुना गया जीवन -साथी योग्य है तब क्यूँ समाज की फ़िज़ूल बातों  पर खून गर्म कर दोनों को मौत के घाट उतारने पर उतारू हो जाते हैं ? तुम मानों या न मानों यदि संवाद का माध्यम खुला रहे बेटी व् बाप-भाई के बीच में तो घर से भागने वाले प्रेमी-युगलों की संख्या शून्य रह जायेगी और  एक बात अन्य भी  गौर करने योग्य है कि  पंचायतों के फरमान पर खुले-आम फांसी पर लटकाये गए प्रेमी-युगलों को देख कर  भी घर से भागने वाले प्रेमी-युगलों की कमी नहीं है बल्कि दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है .इससे तो यही साबित होता है कि -भय से बढ़ती प्रीत '' सूरज की इस बात पर रणवीर व्यंग्यात्मक स्वर में बोला -'' ..''प्रेमी-युगल''  ...माय फुट..माँ-बाप ने भेजा पढ़ने को और ये रचाने लगे प्रेम-लीला .जो किसी और की लड़की को ले भागा यदि उसकी बहन किसी गैर लड़के से मुस्कुराकर बात भी कर ले तो उस लड़के को सबक सिखाकर ही घर लौटता  है उस बहन का भाई  और फिर सगोत्रीय विवाह ..कैसे स्वीकार कर लिया जायेगा ? प्रेम के नाम पर कल को यदि भाई-बहन के सम्बन्धों की मर्यादा  को कोई तार-तार करने लगे तो क्या हम  मानवतावाद ...मानव के अधिकार के नाम पर स्वीकार कर लेंगें  ?नहीं ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा !!!'' सूरज सहमत होता हुआ बोला -''तुम्हारी बात ठीक है पर मर्यादित आचरण की नींव घर-परिवार  से ही पड़ेगी .जब परिवार में लड़कों को तो छूट दे दी जायेगी कि जाओ कुछ  भी करो और लड़कियों के ऊपर सख्ती रखी जायेगी तो लड़कियों की सोच यही तक सीमित रह जायेगी कि उनका सशक्तिकरण का रूप केवल उनके द्वारा स्वयं चयनित वर है ..शादी-विवाह ..इससे आगे वे अपने जीवन का उद्देशय ही नहीं जान पाती तब तक ऐसी घटनाएं घटती  ही रहेंगी ...इन्हें नहीं रोका जा सकता है .मर्यादा -पालन का सारा बोझ लड़की के कंधें पर रख देना भी उसके विद्रोह का एक कारण है .परिवार की इज्जत केवल लड़की का आचरण ही नहीं लड़के का चरित्र भी है .जब तक परिवारों में मर्यादा -पालन का पाठ दोनों को ही समान रूप से नहीं सिखाया जायेगा तब तक लड़कियों को इज्जत के नाम पर मौत के घाट उतारने से कुछ नहीं होने वाला !'' रणवीर गम्भीरता के साथ बोला -'' हाँ..हाँ बिलकुल लड़कियों को भी अपनी बात परिवार में बिना झिझक  रखने का पूरा अधिकार होना चाहिए .यदि वे सही हैं तो उनका समर्थन किया जाना चाहिए पर इसके लिए बहुत बड़े सामाजिक-परिवर्तन की आवश्यकता  है ...पितृ-सत्तात्मक समाज में तो ये असम्भव सा जान पड़ता है पर एक बात पर मुझे  अचरज  होता है कि बाप-भाई को दुश्मन मानकर घर से भागने वाली लड़की क्या कभी ये नहीं सोचती कि जिसके साथ तू भाग रही है यदि इसने  तुझे धोखा दे दिया तो तू कहाँ जायेगी ..वापस उन्ही दुश्मन बाप-भाई के पास !!!'' सूरज रणवीर के सुर में सुर मिलाता हुआ बोला -'' बिलकुल ठीक ...बल्कि अपनी पसंद से विवाह को नारी-सशक्तिकरण का नाम देती हैं जबकि सशक्त तो तब भी पुरुष ही हुआ ना कि लो अपनी मर्जी से जिसे चाहा ले भागा...निभेगी तो निभाऊंगा वरना पल्ला  झाड़ लूँगा ..क्या कहते हो ? रणवीर की नज़र तभी दीवार पर लगी घडी पर गयी और वो हड़बड़ाता हुआ बोला- ''अरे  इतना  टाइम  हो गया ..भाई सूरज इस बहस का निष्कर्ष बस यही निकलता है कि बाप-भाइयों को भी बेटी व् बहनों के दिल में ये विश्वास पैदा करना होगा कि हम तुम्हारे सही फैसले पर तुम्हारे साथ हैं और तुम्हे भी अपना पक्ष परिवार में रखने का पूरा हक़ है ..तभी कोई हल निकलेगा इस क़त्ल -ए-आम का ..ये भी सच है कि लड़कियों को भी ऐसा कदम उठाने  से पहले सौ बार सोच लेना चाहिए क्योंकि कोई भी माँ-बाप अपने बच्चे का क़त्ल यूँ ही नहीं कर डालता .लड़कियों को ये भी सोच लेना चाहिए कि कहीं अपने सशक्तिकरण की आड़ में अपने शोषण का हाथियार ही हम पुरुषों के हाथ में न दे बैठे ..चल यार अब माफ़ कर दे मुझे.. मैंने गुस्से में आकर तेरे तमाचा जो जड़ दिया था उसके लिए .'' सूरज अपना गाल सहलाता हुआ बोला -'' लगा तो बहुत जोरदार था पर आगे से ध्यान रखूंगा जब भी इस मुद्दे पर तेरे से बात करूंगा हेलमेट पहन कर किया करूंगा .'' सूरज की इस बात पर रणवीर के साथ-साथ वहाँ खड़े और मित्रगण भी ठहाका लगाकर हंस पड़े !
PUBLISHED IN JANVANI  [RAVIVANI] 27APRIL2014


शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

''पति-पत्नी ''-लघु-कथा



आज अमर जब ऑफिस से घर लौटा तो पाया रिया भी ऑफिस से आ चुकी थी . अमर ने घर में घुसते ही कहा -'' मैडम आज मेरे पास एक गुड न्यूज है .'' अमर की इस बात पर रिया चहकते हुए बोली -'' और मेरे पास भी ..!'' अमर ने अपना बैग और कोट उतार कर सोफे पर रखा और बोला -''दैट्स वंडरफुल ...चलो पहले तुम सुनाओ ..लेडीज़ फर्स्ट !'' रिया मुस्कुराते हुए बोली ''..नो ..पहले तुम सुनाओ ..हसबैंड फर्स्ट !'' अमर ने सहमति में गर्दन हिलाते हुए कहा -'' ओ.के. ..तो सुनिये  मैडम ..मेरा प्रमोशन हो गया है !'' रिया ये खुशखबरी सुनकर तपाक से बोली -'' आई न्यू दिस ...आखिर तुम हो ही इतने बुद्धिमान !'' अमर ने टाई की नॉट ढीले करते हुए कहा -'' थैंक्स मैडम ...अब आप भी अपनी गुड न्यूज सुना ही दीजिये .'' रिया ने उत्साही स्वर में कहा -'' जनाब मुझे भी प्रमोशन मिला है !'' अमर रिया की इस खुशखबरी पर तारीफ के रैपर में तानें की टॉफी खिलाते हुए बोला -'' हां..हाँ भाई ..क्यूँ न होता तुम्हारा प्रमोशन ..तुम खूबसूरत ही इतनी हो !!!''

शिखा कौशिक 'नूतन'  

गुरुवार, 13 मार्च 2014

''बदचलन कहीं की'' - लघु -कथा


सत्यनारायण की बहुत समय बाद अचानक अपने पुराने मित्र श्याम लाल से बस में मुलाकात हो गयी .दोनों ही गांव से शहर जा रहे थे . श्याम लाल ने औपचारिक बातचीत के बाद उत्सुकता वश  आखिरकार सत्यनारायण से  पूछ ही लिया -''अरे भाई एक बात तो बता ..तेरे उस भांजे का  क्या हुआ जो किसी लड़की को ले भागा था ? बहुत शोर मचा था तब ..तीन साल हो लिए होंगे इस घटना को !'' सत्यनारायण  गम्भीर होते हुआ बोला -''होना क्या था भाई ...पंचायत ने बीच में पड़कर छुट-छुटाव करवाया ...दो साल पहले उसका ब्याह कर दिया था ..तब से सुधर गया है .बस अब अपने बाल-बच्चों में रमा रहता है ..लड़का भोला था ....बहक गया था  .'' श्यामलाल दोगुनी  उत्सुकता के साथ बोला -..और उस लड़की का क्या हुआ ..जो उसके साथ भागी थी ?'' सत्यनारायण कड़वा सा मुंह बनाता हुआ बोला -'' उसका क्या होना था ......सुना है उसके बाप ने ही जहर देकर मार डाला उसे और चुपचाप मामला निपटा दिया ...बदचलन कहीं की ...ऐसी लड़की भी कभी सुधरा करती हैं क्या ..!!!

शिखा कौशिक 'नूतन' 

बुधवार, 12 मार्च 2014

हूँ तो औरत जात ही ना !''--लघु कथा




एक कच्ची कोठरी में गुजर-बसर करने वाले राधे ने अपनी पत्नी को बाल संवारते हुए देखा और उसकी नज़र पत्नी की सूनी कलाई पर जाकर टिक गयी .पास ही दीवार पर टंगे कैलेण्डर में लक्ष्मी जी को देखकर राधे अपनी पत्नी से बोला -''काश मैं भी तुझे लक्ष्मी मैय्या जितने गहनों से लाद पाता पर देख तेरे पास तो पहनने के लिए कांच की चूड़ियाँ तक नहीं हैं .'' राधे की पत्नी मुस्कुराती हुई बोली -''दिल क्यूँ छोटा करते हो जी .....ये तो सोचो अगर मैं लक्ष्मी मैय्या जितने गहने पहन कर इस कोठरी में रहूंगी  तो किसी दिन डकैत आ धमकेंगे !'' राधे पत्नी की बात पर ठहाका लगता हुआ बोला -'' बावली कहीं की ...जो तुझे इतने गहने पहनाने की मेरी औकात होगी तो क्या तुझे इस कोठरी में रखूंगा ?'' राधे की इस बात पर उसकी पत्नी अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोली -'' हा!!! लो ..ये बात तो मेरे मगज में ही नहीं आई ...हूँ तो औरत जात ही ना !''

शिखा कौशिक 'नूतन' 

सोमवार, 10 मार्च 2014

पाक मोहब्बत -कहानी


Interfaith wallpaper

कृष्णपाल ने अपने घर के निचले हिस्से में एक मुस्लिम परिवार को किराये पर रख छोड़ा था .दो वर्ष पूर्व पत्नी की मृत्यु के बाद से कृष्णपाल के परिवार में केवल एक बेटा अमर व् बेटी रूपा थे .कृष्णपाल पास के ही कस्बे के एक इंटर कॉलेज में टीचर थे . किरायेदार मुस्लिम परिवार के मुखिया युसूफ थे .उनके परिवार में पत्नी ज़ाहिदा के अलावा बड़ा बेटा आलम ,बेटी ज़ेबा और उससे छोटा आरिफ थे . रूपा और ज़ेबा हमउम्र किशोरी थी और अमर आलम से चार-पांच साल छोटा था .सब बच्चों में सबसे छोटा था आरिफ जो ग्यारह वर्ष का था .रूपा की सबसे ज्यादा छनती थी आरिफ के साथ जो रूपा को रुपी आपी कहता और अमर को सबसे अच्छा लगता था ज़ेबा से बतियाना .आलम का मिज़ाज़ अलग था .वो न तो अपने अब्बा के इस फैसले से खुश था कि किसी हिन्दू के घर में किराये पर रहा जाये और न ही उसे ज़ेबा और आरिफ का -रूपा व् ज़ेबा से मेलजोल अच्छा लगता था .घर के पास के ही स्कूल में अमर बारहवीं का छात्र था और रूपा व् ज़ेबा ग्यारहवीं की छात्रा थी .आरिफ छठी कक्षा का छात्र था ..आलम ने पांचवी में फेल होने के बाद से ही पढाई छोड़ दी थी और अपने अब्बा के साथ उनकी लुहार की दुकान पर ही काम करता था . कॉलेज आते-जाते अमर का ज़ेबा के प्रति बढ़ता आकर्षण रूपा ने उसकी बातों से जान लिया था .रूपा ने अमर को समझाया भी था -'' भाई तू समझता क्यूँ नहीं !!!पिता जी को पता चलेगा तो तेरी हड्डी-पसली तोड़ देंगें ... . हम दोनों परिवारों के धर्म अलग -अलग हैं ...ये ठीक है हम ये नहीं मानते पर ज़ेबा के बड़े भाई आलम को तो देख ..दिल में आग लिए फिरता है हमारे लिए ...वो तो युसूफ चचाजान पिता जी के अच्छे दोस्त हैं जो उसे दबाये रखते हैं पर तू अगर ज़ेबा के साथ दोस्ती बढ़ाएगा तो ये युसूफ चचाजान को भी पसंद न आएगा ....ज़ेबा की अम्मी भी हम से थोडा परहेज़ रखती हैं ....मान जा ..पढाई पर ध्यान दे ..वरना सत्यानाश हो जायेगा ...'' पर अमर के ऊपर मोहब्बत का जूनून चढा था .उसे न तो समझना था और न वो समझा उधर ज़ेबा ने भी नासमझी का परिचय दिया और एक दिन दोनों चुपचाप घर से भाग गए .ये खबर पता चलते ही कृष्णपाल और युसूफ के पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी .दोनों उन्हें ढूढ़ने निकल पड़े और इधर आलम ने अपने आवारा दोस्तों को फोन कर घर पर बुला लिया ..आलम के बुरे इरादे जिसने छिपकर सुने थे वो था रुपी आपी का लाड़ला आरिफ .आरिफ बिना वक्त गवाए सीढ़ियां चढ़ता हुआ ऊपर भागा .उसकी रुपी आपी कमरे में बने छोटे से मंदिर के आगे हाथ जोड़े बैठे थी .बदहवास आरिफ ने कमरे में पहुँचते ही उसके किवाड़ अंदर से बंद कर लिए .रूपा घबरा गयी .आरिफ का सफ़ेद पड़ा चेहरा देखकर उसने आरिफ के कंधें पकड़कर झँझोरते हुए पूछा -'' क्या हुआ आरिफ ..इतना घबराया हुआ क्यूँ है ?'' आरिफ हांफता हुआ बोला -'' रुपी आपी ..आपी ..आप कहीं छिप जाइये ..आलम भाईजान ने अपने दोस्तों को फोन कर यहाँ बुलाया है ..वो फोन पर कह रहे थे कि आपको बर्बाद कर देंगें ....वो ऊपर आते ही होंगें ..उनके सिर पर शैतान चढ़ा हुआ है ..वो आपको नहीं छोड़ेगें ...आपी छिप जाओ ...मैं कह दूंगा आप यहाँ हो ही नहीं .'' आरिफ की बात सुनकर रूपा का सिर चकरा गया और सारा बदब पसीनों से भींग गया .उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ गए थे .उसने सूखे गले से पूछा -'' चचीजान कहाँ हैं आरिफ ..तेरी अम्मी कहाँ हैं ?'' आरिफ अपनी रुपी आपी को डर से थरथराते देखकर उसकी हथेली कसकर पकड़ते हुए फुसफुसाया -'' आपी अम्मी तो बेहोश पड़ी है ..उसे कोई सुध नहीं ...आप जल्दी से छिप जाइये !'' आरिफ के ये कहते ही रूपा के मुंह से निकला ''कहाँ छिप जाऊं ?''तभी उसका चेहरा सख्त हो गया मानों कोई कठोर निर्णय ले लिया हो दिल ही दिल में .उसने आरिफ को गले लगाते हुए कहा -'' मेरे भाई ..शुक्रिया तूने मेरी लाज बचाई ..जा जाकर कमरे के बाहर खड़ा हो जा ..मैं कहीं छिप जाती हूँ .'' ये कहकर रूपा ने कमरे के किवाड़ खोल दिए और आरिफ के बाहर निकलते ही किवाड़ अंदर से बंद कर लिए .उधर आवारा दोस्तों के आते ही उबलते खून को ठंडा करने के लिए हैवानियत के इशारे पर नाचता हुआ आलम ऊपर आ पहुंचा .उसके हाथ में तलवार थी और दिल में खूंखार इरादे .आरिफ को कमरे के बाहर किवाड़ों से सटा खड़ा देखकर उसने आरिफ का हाथ खींचकर एक ओर गिराते हुए कहा -पहरेदार बनकर खड़ा है ..पता भी है ज़ेबा को लेकर नहीं भागा तेरा वो अमर भाई ..हमारी इज्जत को लेकर भागा है ..सारी बिरादरी में नंगा कर दिया हमें ..अब उस अमर की बहन का क्या हश्र करते हैं हम.. देख ..!'' ये कहकर आलम और उसके दोस्त किवाड़ों पर लातें मारने लगे .आरिफ तेजी से उठा और आलम की टांग पकड़कर खींचते हुए बोला -''अल्लाह की कसम मेरे ज़िंदा रहते मेरी रुपी आपी का कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता.'' .ये सुनते ही आलम ने आव देखा न ताव और तलवार आरिफ के पेट में घुसेड़ डाली .आरिफ के चीत्कार से सारा मौहल्ला ठर्रा उठा और दूसरी ओर कमरे के किवाड़ खुलते ही आलम के दोस्तों के मुंह से चीख निकल पड़ी .रूपा की लाश छत के पंखें से लटक रही थी . मौत का ऐसा तांडव देखकर आलम के दोस्त भाग खड़े हुए और मौहल्ले वालों की सूचना पर पुलिस वहाँ आ पहुंची .कृष्णपाल व् युसूफ भी सूचना पाकर वहाँ आ पहुंचे .जेल जाते समय युसूफ ने अपने अब्बा और कृष्णपाल से बस इतना कहा -यदि किसी दिन ज़ेबा और अमर मिल जाएँ तो तो ठंडे दिमाग से कोई फैसला लीजियेगा .अमर व ज़ेबा ने नादानी में जो किया वो किया पर आप भूल जाइयेगा कि आप हिन्दू हैं या मुस्लिम ..तब केवल इंसान बनकर सोचियेगा बिलकुल मेरे आरिफ और उसकी रुपी आपी के तरह .आरिफ ने मुसलमान होते हुए भी अपनी हिन्दू बहन के लिए जान कुर्बान कर दी क्योंकि वे दोनों केवल इंसान थे हिन्दू या मुसलमान नहीं ..मेरे भाई आरिफ मैं हत्यारा हूँ तेरा और तेरी रुपी आपी का ..लेकिन तुम दोनों भाई-बहन की पाक मोहब्बत की हत्या कोई नहीं कर सकता .'' ये कहकर आलम पुलिस की जीप में बैठ कर चला गया और कृष्णपाल और युसूफ गले लगकर रो पड़े .
शिखा कौशिक 'नूतन '

आँखें -लघु कथा



''दादी माँ रुकिए !...उस कुर्सी पर मत बैठिये .. ..उस पर मधु मक्खी बैठी हुई है .'' ये कहकर किशोर शोभित ने कुर्सी पर से मधुमक्खी को उड़ा दिया और दादी माँ को उस पर सहारा देकर बैठाते हुए बोला -'' दादी माँ ..आज तो आपके मधु मक्खी काट ही लेती ..जरा ध्यान से देखकर बैठा कीजिये ..अब आपकी नज़र कमजोर हो गयी हैं !'' दादी माँ शोभित के सिर पर स्नेह से हाथ रखते हुए बोली -'' तू हैं ना ..फिर मुझे किस बात की चिंता !..पर एक बात बता तू तम्बाकू कब से खाने लगा ?...खबरदार जो आज के बाद तम्बाकू खाया .'' दादी ने शोभित का एक कान ये कहते हुए हल्के से खींच दिया .शोभित दंग होता हुआ बोला -'' आपको कैसे पता कि मैं तम्बाकू खाता हूँ ? ''दादी माँ मुस्कुराते हुए बोली -'' दिखाई देने वाली आँखें भले ही उम्र के साथ कमजोर हो जाएँ पर मन की आँखें उम्र बढ़ने के साथ तेज होती जाती हैं .....तेरी सांसों से तम्बाकू की बदबू आ रही है दुष्ट !'' शोभित अपने दोनों कान पकड़ते हुए बोला -'' आई स्वैर दादी माँ ! आगे से कभी तम्बाकू नहीं खाऊंगा .'' ये कहकर शोभित ने झुककर दादी माँ के चरण-स्पर्श कर लिए .

शिखा कौशिक 'नूतन'