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रविवार, 30 नवंबर 2014

''तो नैना हमारे बीच होती...'' -कहानी


शानदार कोठी के लॉन में कुर्सियों पर आमने-सामने बैठी हुई नैना और पुनीता की जैसे ही आँखें मिली पुनीता गंभीरता की साथ बोली -'' हमेशा अपने ही बारे में सोचती रहोगी या कभी किसी और के बारे में भी सोचोगी ?'' आज पुनीता ने अपने स्वभाव के विपरीत नैना के निर्णय को चुनौती देते हुए ये कहा था क्योंकि किसी के जीवन से सम्बंधित फैसलों में हस्तक्षेप करना पुनीता को कभी पसंद नहीं था .इसीलिए नैना थोड़ा विस्मित होते हुए बोली -'' पुनीता ....ये तुम कह रही हो !!तुम तो हमेशा से यही कहती आई हो कि औरत को अपने बारे में भी सोचना चाहिए .  हो सकता है मेरा  तीसरी शादी करने का निर्णय इस समाज की सोच से कहीं आगे की बात हो ...बट इट्स माय लाइफ एंड आई थिंक इट्स ए राइट डिसीजन .''
नैना के इस प्रत्युत्तर ने पुनीता को विचलित कर दिया और वो पहले की अपेक्षा और ज्यादा कड़क होते हुए बोली -'' राइट डिसीजन ...माय फुट ..एक बार भी अपने चौदह वर्षीय बेटे अभि के बारे में सोचा है ?क्या है उसके पास ? स्वर्गवासी पिता की यादें और तुम ...बदकिस्मती से पिता का प्यार उसे बचपन  से ही नहीं मिल  पाया ...केवल दो साल का था अभि   जब राम चल बसे थे  नैना उसने  केवल तुमसे प्यार पाया है और अब एक नए व्यक्ति को लाकर अभि के जीवन में थोप देना चाहती  हो तुम ? क्या सोचती हो तुम ...अभि के लिए ये सब इतना आसान है ?वो उस नए व्यक्ति को पिता मान पायेगा ? वो बर्दाश्त कर पायेगा कि जिस  माँ पर पिछले बारह साल से  केवल उसका हक़ था अब वो किसी और के साथ एडजस्ट करे.......नैना यू आर मैड ..अभि बहुत भावुक बच्चा है .तुमने शायद नोट  नहीं किया  वो अखबार में ,टी.वी.चैनल्स  पर तुम्हारे और मिस्टर शेखर  के अफेयर की खबरे पढ़-सुन कर असहज  हो जाता है .तुम कैसी माँ हो जो बच्चे के बिहेवियर में आ रहे बदलाओं को महसूस नहीं कर पाती हो .अरे हां ...यू आर इन लव और इस चालीस पार के प्यार के चक्कर में भले ही अभि के दिल के टुकड़े टुकड़े हो जाये ..इसकी तुम्हे रत्ती भर भी चिंता नहीं.'' पुनीता के इस व्यंग्य पर नैना को इतना क्रोध आया कि वो अपनी बेस्ट फ्रेंड पर चीखते हुए बोली -शट     अप पुनीता ...चुप हो जाओ ...अभि से बढ़कर मेरे लिए कोई नहीं ..मैंने देखा है उसे पिता के प्यार के लिए तरसते हुए ..शेखर बहुत बड़े दिल वाले हैं .वो अपनी एक्स वाइफ को भी पूरा सम्मान देते हैं अपने बच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं .वो तो बच्चों को अपने पास रखना चाहते थे पर कोर्ट ने उनके बच्चों को उनकी एक्स वाइफ की कस्टडी में दे दिया .कितना बिजी रहते हैं शेखर पर जब भी हम मिलते हैं तब सबसे पहले अभि के बारे में ही पूछते हैं .अभि और शेखर कई बार मिल चुके  हैं और मुझे नहीं लगता दोनों के बीच कुछ भी असहज है .''
पुनीता नैना की बात पर असहमत होते हुए बोली -'' माई डियर ...इतनी भोली नहीं हो तुम ..सबसे पहले अभि को पूछते हैं ...नैना शेखर जानते हैं कि तुम्हारा दिल जीतना है तो अभि की बात करनी ही  होगी .ये अभि के प्रति स्नेह नहीं तुम्हारे प्रति आकर्षण का परिणाम है .ये एक पिता के भाव नहीं प्रेमी के भाव है ....बेवकूफ ...तुम बँट कर रह जाओगी नैना .क्या अभि को दे पाओगी पहले जैसा प्यार ?'' नैना लापरवाह सी होकर बोली -'' हां हाँ क्यों नहीं ..अभि हॉस्टल से आता ही कितने दिन के लिए है घर ...तुम नाहक परेशान हो रही हो ..ये मिडिल क्लास मैंटेलिटी है ..बच्चे के लिए पूरा जीवन विधवा बन कर काट दूँ तब तुम्हे चैन आएगा ! इतनी बड़ी कम्पनी की सी.ई.ओ . हो कर भी तुम्हारी सोच इतनी बैकवर्ड कैसे हो सकती है पुनीता ?'' पुनीता नैना की इस बात की हंसी उड़ाते हुए बोली -'' बैकवर्ड ...हा हा हा ..तुम्हे याद है नैना जब घरवालों की मर्जी से हुई तुम्हारी पहली शादी टूटी थी  तब सब तुम्हारे खिलाफ थे पर मैंने तुम्हारा साथ दिया था क्योंकि मैं जानती थी  कि साहिल उन मर्दों  में से था जो औरत को पैर की जूती समझते हैं फिर तुम बिजनेस वर्ल्ड में नाम कमाते हुए डॉ. राम से दिल लगा बैठी .तब तुम दोनों की शादी की सारी व्यवस्था मैंने ही की थी .तुम्हारे घरवाले इस अंतर्जातीय शादी के खिलाफ थे . तुम्हे याद है या नहीं ...तुम्हारे भाई ने मुझे गोली मार देने की धमकी तक दी थी पर मैं डरी  नहीं थी पर आज हालात अलग हैं माइ डियर ! आज अभि मेरे चिंतन के केंद्र में है .मैं नहीं चाहती कि तुम एक ख़राब माँ साबित हो .कल को तुम्हारा बच्चा तुम पर ये आरोप लगाये कि मेरी माँ ने अपनी लाइफ के बारे में तो सोचा पर मेरी नहीं .हॉस्टल में रहकर भी उसे ये सुकून रहता है कि उसकी माँ उसकी हर ख़ुशी-तकलीफ बाँटने के लिए लालायित होगी पर चौदह वर्षीय किशोर को ये समझाना बहुत मुश्किल है कि उसकी माँ किसी पुरुष से उसके हितार्थ शादी कर रही है .नैना ..नैना तुम क्यों नहीं समझती ....आखिर कब तक तुम अपने जीवन की सम्पूर्णता के लिए किसी पुरुष का सहारा लेती रहोगी ...तुम अब एक औरत नहीं ..एक माँ हो ...और ये कोई बैकवर्ड सोच नहीं ..ये सबसे बड़ा सत्य है ...जिस बच्चे को जन्म देकर इस संसार में लायी हो उसके अधिकारों के बारे में भी सोचो ..उसको भी इस समाज में मुंह दिखाना पड़ता है ..तुम्हारे हर आचरण की आंच उस पर पड़ती है .पिछली बार जब मिली थी मैं उससे तब बता रहा  था मुझे कैसे उसके सहपाठी तुम्हारे और शेखर के अफेयर को लेकर तंज कसते हैं उस पर ...नैना माना बच्चा स्वार्थी  होता है .वो माँ के प्यार को किसी के साथ नहीं बाँट सकता पर माँ तो स्वार्थी नहीं होती ना ..'' पुनीता के ये कहते ही नैना गुस्से में बौखलाते हुए कुर्सी से खड़ी होते हुए बोली -पुनीता दिस इज़ टू मच....तुम मेरी लाइफ में कुछ ज्यादा ही हस्तक्षेप कर रही हो ...मैंने कभी पूछा तुमसे कि तुमने शादी क्यों नहीं की ....फिर तुम क्या जानों बच्चे और माँ के बीच के सम्बन्ध को ? मेरा अभि उसमे ही खुश है जिसमे मैं खुश हूँ ...नाउ  लीव मी एलोन फॉरेवर !'' नैना के ये कहते ही पुनीता कुर्सी से उठकर कड़ी हो गयी और अपना पर्स उठकर बिना कुछ कहे वहां से निकल ली .कार से लौटते समय पुनीता ने मन में निश्चय किया कि अब नैना से कभी नहीं मिलेगी .पुनीता का निश्चय डोल भी जाता यदि नैना उससे मिलने आ जाती या केवल एक कॉल कर देती पर नैना ने ऐसा कुछ नहीं किया .अख़बारों और टी.वी. चैनल्स पर नैना और शेखर की शादी की तस्वीरें प्रमुखता से प्रकाशित व् प्रसारित की गयी .आखिर क्यों न होती ...शेखर राजनीति का चमकता हुआ सितारा  था और नैना बिजनेस टायकून पर पुनीता की नज़र ख़बरों में ...फोटो में ढूंढ रही थी अभि को ..जो कहीं नहीं था .एक साल बीता ,दो साल बीते .बीच में एक बार पुनीता देहरादून किसी काम से गयी तब अभि से मिलने गयी थी उसके स्कूल .माँ को लेकर उसका ठंडा रिएक्शन देख कर अंदर से कांप उठी थी पुनीता .बेटे का ये रिएक्शन सह पायेगी नैना ? प्रश्न ने झनझना डाला था पुनीता के दिल और दिमाग को और एक दिन टी.वी. ऑन करते ही उस पर प्रसारित ब्रेकिंग न्यूज़ देखकर पुनीता का दिल धक्क रह गया था . खबर ही ऐसी थी .नैना एक पांच सितारा होटल में मृत पाई गयी थी .शेखर पार्टी के एक सम्मलेन के चक्कर में उस होटल में नैना के साथ ठहरे हुए थे .नैना के चिकित्सीय परीक्षण को लेकर तरह-तरह की खबरे आ रही थी .नैना ने आत्म-हत्या की या उसकी हत्या हुई -इसको लेकर मीडिया डॉक्टर से लेकर पुलिस विभाग तक की भूमिका स्वयं ही निभा रहा था पर पुनीता जानती थी कि नैना की हत्या नैना ने ही की है .पुनीता जानती थी अभि से कितना प्यार करती थी नैना इसीलिए शेखर से उसके विवाह पर एतराज था पुनीता को . खबर देखकर सबसे पहले यही विचार आया था पुनीता के दिल में ''नहीं कर पाई ना नैना बर्दाश्त बेटे का उपेक्षापूर्ण बर्ताव ! अभि का दोष नहीं है ..वो शेखर को जीवन में स्थान दे सकता था पर पिता का मान ..बहुत मुश्किल था .इधर बेटे के दिल में अपने लिए घटते प्यार और उधर शेखर की बेवफाई का कल्पित भय .......कितना उलझकर रह गयी थी तुम नैना ! अभी  कुछ दिन पहले ही तो अख़बारों और सोशल मीडिया में छा गया था तुम्हारा शेखर का एक और महिला के साथ मिलने-जुलने को लेकर किया गया ट्वीट ....नैना तुम खोखली हो गयी थी और इसका अनुमान मुझे पहले से था ...खोखलापन कहाँ जीने देता है इंसान को !उसी का परिणाम है ये हादसा .'' पुनीता ने ये सोचते सोचते मुंह अपनी हथेलियों से ढँक लिया था और रो पड़ी थी .
               नैना की तेरहवी पर जब उसकी कोठी पर पहुंची थी पुनीता तब अभि दौड़कर आया था पुनीता के पास और उसने पूछा था -'' मौसी व्हाई मॉम हैज़ डन  दिस ? ....मेरा भी ख्याल नहीं किया .'' पुनीता उसे सांत्वना देते हुए बोली थी -'' रोओ  नहीं बेटा ..यही ईश्वर की इच्छा थी !'' पर मन में पुनीता के बस इतना आया था '' अभि तेरा ख्याल किया होता तो शायद नैना हमारे बीच ही होती आज .''


शिखा कौशिक 'नूतन'

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

''कन्या-दान'-कहानी

Welcome To National Duniya: Daily Hindi News Paper
PUBLISHED IN ' NATIONAL DUNIYA '' NEWS PAPER ON 23 NOVEMBER 2014
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''नीहारिका का कन्यादान मैं और सीमा नहीं बल्कि तुम और सविता  करोगे क्योंकि तुम दोनों को ही नैतिक रूप से ये अधिकार है .'' सागर के ये कहते ही समर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा और हड़बड़ाते हुए बोला -'' ये आप क्या कह रहे हैं भाईसाहब !...नीहारिका आपकी बिटिया है .उसके कन्यादान का पुण्य आपको ही मिलना चाहिए .हम दोनों ये पुण्य आप दोनों से नहीं छीन सकते .'' सागर कुर्सी से उठते हुए सामने बैठे समर को एकटक दृष्टि से देखते हुए हाथ जोड़कर बोला -'' समर  तुम मेरी बहन के पति होने के कारण हमारे माननीय हो .तुमसे मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि नीहारिका का कन्यादान  तुम दोनों ही करना .मैं नीहारिका को भी अँधेरे में नहीं रखना चाहता .....सीमा...कहाँ है नीहारिका ? उसे यही बुलाओ !'' सागर के ये कहते ही सीमा  ने नीहारिका को आवाज़ लगाई .नीहारिका के ''आई माँ '' प्रतिउत्तर को सुनकर  सविता ,समर ,सीमा व् सागर उसके आने का इंतज़ार करने लगे .नीहारिका के स्वागत  कक्ष  में प्रवेश करते ही चारों  एक-दूसरे  के चेहरे  ताकने  लगे .
                     नीहारिका ने सब को चुप देखकर मुस्कुराते हुए कहा  -अरे भई इस कमरे में तो कर्फ्यू लगा है और मुझे बताया भी नहीं गया .'' नीहारिका के ये कहते ही सबके चेहरे पर फैली गंभीरता थोड़ी कम हुई और सब मुस्कुरा दिए .सविता ने अपनी कुर्सी से खड़े होते हुए नीहारिका का हाथ पकड़कर उसे अपनी कुर्सी पर बैठाते  हुए कहा -''लाडो रानी..अब यहाँ बैठो और और सुनो भाई जी तुमसे कुछ कहना चाहते हैं .''  सविता के ये कहते ही नीहारिका भी एकदम गंभीर हो गयी क्योंकि उसने अपने पिता जी को ऐसा गंभीर इससे पहले दो बार ही देखा था .एक बार जब बड़ी दीदी प्रिया  की विदाई हुई थी और दूसरी बार तब जब मझली दीदी सारिका की विदाई हुई थी .दोनों बार पिता जी विदाई के समय बहुत गंभीर हो गए थे पर रोये  नहीं थे जबकि माँ व् बुआ जी का  रो-रो कर बुरा हाल हो गया था .''नीहारिका बेटा '' पिता जी के  ये कहते ही नीहारिका के मुंह से अनायास ही निकल गया -'' जी पिता जी ...आप कुछ कहना चाहते हैं मुझसे ?'' नीहारिका के इस प्रश्न पर सागर कुर्सी पर बैठते हुए बोला -''हां बेटा ..आज मैं अपने दिल पर पिछले चौबीस साल से रखे एक बोझ को उतार देना चाहता हूँ ...हो सकता है आज के बाद तुम्हें  लगे कि तुम्हारे पिता जी संसार के सबसे अच्छे पिता नहीं है पर मैं सच स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ .बात तब की है जब मेरी दो बेटियों का जन्म हो चुका  था  . और तुम अपनी माँ के गर्भ में आ चुकी थी .मैं दो बेटियों के होने से पहले ही निराश था .सबने कहा ''पता कर लो सीमा के गर्भ में बेटा है या बेटी ..यदि बेटी हो तो गर्भ की सफाई करा दो '' मैंने तुम्हारी माँ के सामने ये प्रस्ताव रखा तो उसने मेरे पैर पकड़ लिए .वो इसके लिए तैयार नहीं थी पर मुझ पर बेटा पाने का जूनून था .मैंने तुम्हारी माँ से साफ साफ कह दिया था कि यदि टेस्ट को वो तैयार न हो तो अपना सामान बांधकर मेरे घर से निकल जाये .तुम्हारी माँ मेरे दबाव में नहीं आई .ये देखकर मैं और भी बड़ा शैतान बन गया और एक रात मैंने प्रिया और सारिका सहित तुम्हारी माँ को धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया .तुम्हारी माँ दर्द से कराहती हुई घंटों किवाड़ पीटती रही पर मैंने नहीं खोला .ये तुम्हारी दीदियों को लेकर मायके गई पर वहां इसके भाई-भाभी ने सहारा देने से मना कर दिया और कानपुर सविता व् समर को इस सारे कांड की जानकारी फोन पर दे दी तुम्हारे मामा जी ने .सविता और समर जी यहाँ आ पहुंचे .सविता ने तब पहली बार मेरे आगे मुंह खोला था .उसने दृढ़ स्वर में  कहा था -'' भाई जी भाभी के साथ आपने ठीक नहीं किया .मेरे भी तीन बेटियां  हैं यदि ये मुझे इसी तरह धक्का देकर घर से निकाल देते तब मैं कहाँ जाती और आप क्या करते ? ये तो दो बेटियों के होने पर ही संतुष्ट थे .मेरी ही जिद थी कि एक बेटा तो होना ही चाहिए ....तब ये तीसरे बच्चे के लिए तैयार हुए .अब सबसे ज्यादा प्यार ये तीसरी बेटी को ही करते हैं और आपने इस डर से कि कहीं तीसरा बच्चा बेटी ही न हो जाये भाभी को फूल सी बेटियों के साथ रात में घर से धक्के देकर बाहर निकाल दिया ..पर अभी इन बच्चियों के बुआ-फूफा मरे नहीं है .मैं लेकर जाउंगी भाभी को बच्चियों के साथ अपने घर ...अब भाई जी ये भूल जाना कि आपके कोई  बहन भी है !'' मैं जानता था कि सविता मेरे सामने इतना इसीलिए बोल पाई थी क्योंकि उसे समर का समर्थन प्राप्त था .मैंने गुस्से में कहा था -'' जाओ ..तुम भी निकल जाओ .'' सविता ने अपना कहा निभाया और तुम्हारी माँ व् दीदियों को कानपुर ले गयी .वहीं  कानपुर में तुम्हारा जन्म हुआ .यहाँ मेरठ से मेरा तबादला भी कानपुर हो गया .स्कूल के एक कार्यक्रम में हमारे बैंक मैनेजर शर्मा जी को मुख्य-अतिथि के रूप में बुलाया गया .उनके साथ मैं भी गया .वहां तुम्हारी प्रिया दीदी ने नृत्य का एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया .प्रिया की नज़र जैसे ही मंच से मुझ पर पड़ी वो नृत्य छोड़कर दौड़कर मेरे पास आकर मुझसे लिपट गयी .वो बिलख-बिलख कर रोने लगी और मैं भी . मेरी सारी हैवानियत को प्रिया के निश्छल प्रेम ने पल भर में धो डाला . मैनेजर साहब को जब सारी स्थिति का पता चला तो उन्होंने बीच में पड़कर सारा मामला सुलझा दिया।
सीमा ने जब पहली बार तुम्हे मेरी गोद में दिया तब तुमने सबसे पहले अपने नन्हें-नन्हें हाथों से मेरे कान पकड़ लिए ..शायद तुम मुझे डांट पिला रही थी .सविता ,समर व् सीमा ने ये निश्चय किया था कि इस घटना का जिक्र परिवार में बच्चों के सामने कभी नहीं होगा  पर उस दिन से आज तक मुझे यही भय लगता रहा कि कहीं तुम्हें अन्य कोई ये न बता दे कि मैं तुम्हे कोख में ही मार डालना चाहता था . नीहारिका बेटा ये सच है कि मैं गलत था ..तुम चाहो तो मुझसे नफरत कर सकती हो पर आज अपना अपराध स्वीकार कर मैं राहत की साँस ले रहा हूँ ..मुझे माफ़ कर देना बेटा !'' ये कहते कहते सागर की आँखें भर आई .नीहारिका ने देखा सबकी आँखें भर आई थी .नीहारिका कुर्सी से उठकर सागर की कुर्सी के पास जाकर घुटनों के बल बैठते हुए बोली -पिता जी ..ये सब मैं नहीं जानती थी ...जानकार भी आपके प्रति सम्मान में कोई कमी नहीं आई है बल्कि मुझे गर्व है कि मेरे पिता जी में सच स्वीकार करने की शक्ति है ...मेरे लिए तो आज भी आप मेरे वही  पिता जी है जो बैंक से लौटते  समय मेरी पसंद की टॉफियां अपनी पेंट की जेब में भरकर लाते थे और दोनों दीदियों से बचाकर दो चार टॉफी मुझे हमेशा ज्यादा देते थे और मैं भी पिता जी आपकी वही नीहारिका हूँ जो चुपके से आपके कोट की जेब से सिक्के चुरा लिया करती थी ...नहीं पता चलता था ना आपको ?'' नीहारिका के ये कहते ही सागर ने उसका माथा चूम लिया .समर भी ये देखकर मुस्कुराता हुआ बोला -'' अब नीहारिका तुम ही निर्णय करो कि तुम्हारा कन्यादान मैं और सविता करें या तुम्हारे माँ-पिता जी ?'' नीहारिका लजाते हुए बोली -'' फूफा जी ...ये आप दोनों ही जाने .'' ये कहकर वो शर्माती हुई वहां  से चली गयी .समर ने सागर के कंधें पर हाथ रखते हुए कहा -'' कन्यादान भाईसाहब आप ही करेंगें ..और अब तो आपने अपने हर अपराध का प्रायश्चित भी कर लिया है .'' समर के ये कहने पर सागर ने सीमा व् सविता की ओर देखा .उन दोनों की सहमति पर सागर ने भी लम्बी सांस लेकर सहमति में सिर हिला दिया .

शिखा कौशिक 'नूतन '

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

''वो खूबसूरत लड़की''-लघु कथा



सिल्क की साड़ी में वो खूबसूरत लड़की ज्यों ही  बस में चढ़ी एक बुज़ुर्ग की नज़र उस पड़ी .उनके मन में भाव आये -''बिलकुल मेरी बिटिया जैसी '' .बस धीरे-धीरे चल पड़ी .अपने पापा के साथ सफर कर रहे एक बच्चे ने उसे देखा और चिल्लाया -''मौसी  यहाँ आ जाइये ..सीट खाली है .'' वो खूबसूरत लड़की उस बच्चे के बगल में जाकर बैठ  गयी  बस ने रफ़्तार पकड़ ली  .सुहानी हवाओं  ने सफर को  आरामदायक बना दिया तभी एक युवक की वासनामयी दृष्टि उस खूबसूरत लड़की पर पड़ी और बस धड़धड़ाकर झटका खाकर रुक  गयी .बस का पहिया कीचड में धँस गया था .


शिखा कौशिक 'नूतन' 

रविवार, 2 नवंबर 2014

[PUBLISHED IN JANVANI'S RAVIVANI WEEKLY MAGAZINE ]-औरत

औरत
[PUBLISHED IN JANVANI'S RAVIVANI WEEKLY MAGAZINE ]

''.आइये थानेदार साब गिरफ्तार कर लीजिये इस हरामी आदमी को ...ये ही बहला-फुसलाकर लाया है मेरी औरत को और वो भी हरामज़ादी सारे ज़ेवर  ,पैसा मेरे पीछे घर से चोरी कर इसके गैल  हो ली ....पूछो इससे कहाँ है वो ?'' शहर की मज़दूरों की बस्ती में गुस्से से आगबबूला होते सोमनाथ ने ये कहते हुए ज्यूँ ही उसके घर से थोड़ी दूर ही रहने वाले बब्बी की गर्दन पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो थानेदार साब रौबीले अंदाज़ में बोले -'' तू ही सब कुछ कर लेगा तो हमें क्यों बुलाया यहाँ ! चल पीछे हट  और एक तरफ चुपचाप खड़ा रह ...  वरना एक झापड़ तेरी कनपटी पर भी लगेगा .'' थानेदार साब के घुड़की देते ही सोमनाथ गुस्से की पूंछ दबाकर चुपचाप थोड़ा पीछे हट लिया .थानेदार साब ने अपने  घर की चौखट पर खड़े बब्बी को घूरते हुए पूछा -'' कहाँ  है  बे  इसकी  औरत ?'' बब्बी लापरवाह अंदाज़ में सिर खुजलाता हुआ बोला -'' मुझे क्या मालूम थानेदार साब  ...आप चाहें तो मेरा  घर खंगाल लें ..मुझे नहीं  मालूम सोम  की बहू के बारे में और  सच  कहू  तो अच्छा ही हुआ कहीं चली गई वो भली औरत वरना  ये ज़ालिम  तो उसकी  जान  ही ले  लेता  ..... गरभ  से थी वो और ये सुबह- सुबह  उसकी लात-  घूंसों से कुटाई कर काम पर चलता बना।  क्या करती वो  मज़बूर औरत..... चली गयी होगी कहीं। ''बब्बी की इस बात पर सोमनाथ फिर से फुंकारता हुआ थानेदार साब के पीछे से ही चिल्लाया -''बकवास मत कर बब्बी .....सच बोल ..... तेरा इशक चल रहा था ना उससे  .... मेरी औरत .... मेरी  जमा -पूँजी सब हड़प किये बैठा है .... सच बता दे वरना तेरा थोपड़ा नोंच डालूँगा। '' सोमनाथ की इस फुंकार पर बब्बी भी क्षोभयुक्त स्वर में बोला -''सोम ऊपरवाले  का ही लिहाज़ कर ले .... तेरी औरत की शकल तक नहीं देखी कभी गौर से मैंने .... गाय है वो तो .... मेरे पर लगा ले लांछन पर सीता मैय्या जैसी अपनी औरत के लिए ऐसा कहते तेरी ज़ुबान क्यूँ न कट गई .... पूरी बस्ती से पूछ लो थानेदार साब जो कोई भी उस देवी के चरित्तर पर उंगली उठा दे .... बेशरम कहीं का .... आ जा तू भी तलाशी ले ले थानेदार साब के साथ मेरे घर की। '' बब्बी की चुनौती पर सोमनाथ बल्लियों उछलने लगा और भड़कता  हुआ बोला -'' हाँ हाँ मैं भी देखूँगा .... मेरे दोस्तों ने ही बताया मुझे कि मेरे मजदूरी पर जाते ही तू मेरे घर में गया था और आखिरी बार तेरे साथ ही देखी गयी थी वो छिनाल .... बेशरम मैं हूँ या तू .... बस्ती वालों ऐसा आदमी यदि इस बस्ती में रहा तो यकीन मानों किसी की भी बहू-बेटी सलामत न रहेगी। '' तमाशा देखने वाले बस्ती के स्त्री -पुरुष सोमनाथ की इस बात पर भिनभिनाने लगे तो  थानेदार साब जोर से चिल्लाये -''भीड़ इकट्ठी मत करो यहाँ .... सिपाही खदेड़ इन डाँगरों को यहाँ से। '' थानेदार साब के आदेश पर सिपाही ने डंडा उठाया ही था कि ''खी -खी '' ''हो -हो '' के शोर के साथ वहां मज़ा ले रहे बच्चे -बड़े -औरतें सब तितर -बितर  हो लिए। थानेदार साब ने तोंद पर से खिसकी हुई अपनी पैंट ऊपर कमर पर चढ़ाते हुए बब्बी से कहा -''चल हट चौखट से .... रस्ता दे.... मैं खुद देखूँगा तेरे घर का कूना -कूना .... गयी तो गयी कहाँ इसकी औरत .... चुहिया है क्या जो बिल में घुस कर बैठ गयी या चींटी जो दिखाई न दे। '' ये कहते हुए थानेदार साब बब्बी को एक तरफ कर उसके कोठरीनुमा घर में दाखिल हो गए। सोमनाथ की औरत क्या उसका चुटीला तक वहां नज़र न आने पर थानेदार साब का चेहरा गुस्से में तमतमाने लगा। बब्बी के घर से निकलते हुए सोमनाथ को लताड़ते हुए थानेदार साब बोले -''यहाँ तो नहीं मिली तेरी औरत .... किस आधार पर इसके घर की तलाशी के लिए बुला लाया हमें ?  खाली समझ रखा है हमें !'' थानेदार साब के ये कहते ही सोमनाथ हाथ जोड़ते हुए बोला -'' नहीं  साब  ऐसा न कहिये .... इसी बदमाश ने इधर -उधर की है मेरी औरत .... बेच न दी हो इस साले ने .... दलाल कहीं का। '' सोमनाथ के ये कहते ही एक जोरदार तमाचा उसके गाल पर लगा। तमाचे की झनझनाहट से उबरकर जब सोमनाथ ने तमाचा मारने वाले का चेहरा देखा तो पाया ये उसकी माँ ही थी। सोमनाथ की माँ उसपर बिफरते हुए बोली -''शरम कर शरम .... बब्बी तो  भगवान है भगवान .... ये न होता तो आज मेरी बहू इस संसार में न होती। बब्बी ने ही बहू को ठीक टेम से दवाखाने पहुँचाया और मुझे गाँव में इस सब की खबर करवाई। झूठ बोलते शरम तो न आई होगी तुझे .... जेवर -पैसा .... अरे बहू को तो अपनी सुध तक न थी .... और वे तेरे आवारा दोस्त .... दर्द से तड़पती बहू की मदद करने तो एक भी  आया .... मरे भड़काने आ गए .... हे भगवान बेटा ही जनना था तो बब्बी जैसा जनती .... तूने ने मेरी कोख कलंकित कर दी .... अच्छा हुआ जो तेरे बापू ये सब देखने से पहले ही गुज़र गए वरना इब गुज़र जाते .... बब्बी ने तो बड़े भाई का फ़र्ज़ निभाते हुए एक बोतल खून भी दिया बहू को .... बब्बी न होता तो न बहू बचती और न उसका गरभ। '' ये कहते हुए सोमनाथ की माँ सिर पकड़कर ज़मीन पर बैठ गयी और सोमनाथ शर्मिंदा होकर बब्बी के चरणों में झुक गया।

शिखा कौशिक 'नूतन '