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शनिवार, 19 जनवरी 2019

स्वाभिमान - लघुकथा



एक स्व-वित्तपोषित महाविद्यालय  में समाजशास्त्र विषय की प्रवक्ता  डॉ राखी प्रतिदिन समय पर महाविद्यालय  पहुंच जाती थी पर आज समय से बस न मिल पाने के कारण उसे देर हो गई. स्कूल पहुंचते ही प्रिंसीपल सर के सामने पड़ते ही उसने देर से आने के लिए क्षमा मांगने के लिए ज्यों ही हाथ जोड़े, वे भड़कते हुए बोले - 'अरे मैडम ये न करें. आप लोग पहले गलती करते हैं और फिर ये सब नाटक करते हैं! "राखी का ह्रदय उनके  ऐसे कटु व्यवहार से बहुत आहत हुआ और वो स्वयं को संयमित करते हुए बोली - सर क्षमा करें पर आप  इस बात से भली-भांति परिचित हैं  कि महाविद्यालय परिवार का कौन सा सदस्य कैसा है? ये ठीक है कि आज देर से पहुंचने के कारण आपको हक है कि आप मुझे डांट लगा सकते हैं पर इतनी गुंजाइश तो छोड़ दीजियेगा कि मेरे ह्रदय में आपका सम्मान और मेरा स्वाभिमान बना रहे है.  "ये कहकर राखी लेक्चर लेने के लिए क्लास की ओर बढ़ चली.

डॉ शिखा कौशिक नूतन 

रविवार, 9 दिसंबर 2018

उचित निर्णय -कहानी


उचित निर्णय -कहानी

'' ....आज पूरे पांच वर्ष हो गए अन्नपूर्णा से न मिले लेकिन ह्रदय आज जितना व्याकुल  हो रहा  है उतना पिछले पांच वर्षों में कभी  नहीं हुआ  | अन्नपूर्णा तो और लोग कहते थे ...मेरे लिए तो केवल ' अन्नू ' थी वह -------मेरी प्रियेसी , मेरी दोस्त ----मेरा सर्वस्व | आज  भी याद है मुझे हम दोनों की वह अंतिम भेंट ---जब मैं अपने घर से निकलकर कार में बैठ रहा था और उसने मुस्कुराते हुए दूर चौराहे  से  हाथ हिलाया था | जब पंद्रह दिन बाद नेपाल  यात्रा  से वापस लौट  कर आया  पता नहीं मेरी अन्नू कहीं चली  गई  थी  | फोन मिलाया तो उसके पिता जी ने  यह  कहकर झटक कर रख  दिया  कि -' तुम अमीर लड़कों को हमारी  मिडिल  क्लास लड़कियां ही  मिलती हैं दिल बहलाने के लिए ! ख़बरदार जो यहाँ फिर फोन किया | शायद उन्हें मेरे और अन्नू के प्रेम-सम्बन्ध का पता चल गया था | हमारी कोठी से कुछ दूर किराये पर रहने वाले बैंककर्मी आनंद जी की इकलौती बेटी थी अन्नू | देखने में बेहद खूबसूरत और  गुणों  में  उससे भी बढ़कर पर मुझे तो  उसकी सादगी  पसंद  थी  | वो गंभीर  स्वभाव की जब कभी मुस्कुरा देती मानों गुलाब खिल उठते पर ----ये सब सोचने से क्या फायदा ---उसके पिता जी  ने  इस प्रकरण  के  बाद अपना स्थानांतरण  किसी  और  शहर  में  करा  लिया  था ,जो बहुत  कोशिश  के  बाद भी मैं  पता  न  कर पाया अन्यथा एक  बार अपने सच्चे प्रेम  के  भाव  से  उन्हें अवगत  अवश्य  करने का प्रयास  करता |
                                आज पांच वर्ष बाद व्याकुल होने का कारण एक  तो यही  था कि अब अन्नू  से इस जन्म  में  मिल पाने की हर आशा समाप्त हो चुकी थी और दूसरी ओर मम्मी-पापा काफी जोर दे रहे  थे कि अब मैं शादी कर ही लूँ .आखिर  एकलौते बेटे को लेकर उनके भी तो कुछ अरमान रहे होंगें ? बिजनेस की आड़ ले -लेकर तीन साल  से टालता रहा हूँ पर खुद से पूछता हूँ क्यों ? क्या अन्नू के  लिए  ----अब इस मृगमरीचिका  से  बाहर आना  ही  होगा | ये मन ही मन निश्चय कर कल रात मम्मी द्वारा दिखाए गए एक लड़की के फोटो को देखकर मैंने हामी भर दी | कल को मम्मी-पापा के साथ जाना है उसे देखने उसके घर --- ये सब सोचते-सोचते मैं कब सो गया कुछ जान न पाया  |
                              आज सुबह मम्मी ने मुझे और पापा को नाश्ते पर ही सख्त हिदायत दे दी कि -'' सही समय से लौट आना घर ---आज लड़की देखने जाना है |'' हमने हामी भर  दी | सांय चार बजे मैं व् पापा ऑफिस  से लौट आये | पापा की तबियत कुछ ढीली थी अतः मैं और माँ ही तैयार होकर अपनी कार से रवाना हो लिए | हमारी मंज़िल कुछ बीस किलोमीटर दूर थी | करीब पचास मिनिट में हम वहां सकुशल पहुँच गए | लड़की के पिता और भाई बंगले  के बाहर लॉन में ही बैठे थे ----शायद हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे |हमारी कार को अपने बंगले के आगे रुकता देखकर वे हमारा स्वागत करने हेतु हमारे समीप आ पहुंचे और अत्यंत शिष्टता के साथ हमें अंदर ड्राइंग रूम की ओर ले चले | मैं मम्मी  के पीछे सिर झुकार अत्यंत संकोच के साथ चल रहा था | मम्मी  काफी व्यावहारिक हैं पर मुझे तो बहुत झिझक हो रही थी | हम ड्राइंग रूम में जाकर विराजे | थोड़ी देर में लड़की को लेकर उसकी भाभी ने प्रवेश किया | लड़की   की माता जी का कुछ वर्ष पूर्व निधन  हो  चुका  था | मुझमें इतना भी साहस नहीं था कि मैं  एक  बार आँख उठाकर  लड़की की ओर देख लूँ | तभी लड़की की भाभी की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया जो हम से कुछ मिठाई लेने की विनती कर रही थी | मेरी आँखें एकाएक उठ गयी | साक्षात्  लक्ष्मीस्वरूपा मेरी अन्नपूर्णा !! मन में तूफ़ान उमड़ पड़ा -'' मेरी अन्नू पराई  हो चुकी  है |'' किसी तरह स्वयं को संयमित किया | अन्नू  ने कुछ विवशता से युक्त दृष्टि से मुझे निहारा और फिर कुछ बहाना बनाकर अंदर चली गयी | माँ  मेरे होने वाले ससुर जी से उनकी बहू की तारीफ करती  हुई बोली -'' बहू तो बहुत सुन्दर  व् शालीन लाएं हैं आप | '' वे  मुस्कुराते  हुए बोले  -'' मेरे मित्र हैं  बहू  के पिता  | हमने बिना दहेज़ के ये विवाह किया  है ----बहू  वास्तव  में सर्वगुणसम्पन्न है |'' न जाने मुझे क्या होने लगा ? मैं एकाएक सोफे से उठकर खड़ा हो गया | मम्मी ने पूछा -'' क्या हुआ अभिषेक ? '' मैं बहाना बनाता  हुआ बोला  -'' कुछ नहीं मम्मी ----शायद पर्स कार में रह गया है ---मैं अभी लेकर आता हूँ |''ये  कहकर मैं वहां से निकल लिया | करीब पंद्रह मिनिट तक काफी सोच-विचार कर , अपने  को नियंत्रित  कर मैं वापस पहुंचा | लड़की वास्तव  में योग्य व् सुन्दर थी | काफी  वार्तालाप के  बाद रात नौ बजे हम वापस चल दिए | मम्मी  उस लड़की की तारीफ  किये  जा  रही थी लेकिन  मेरे दिल  व्  दिमाग  में  केवल अन्नू  थी | माँ ने  अगले दिन सुबह  नाश्ते पर पूछा -''  क्यों अभिषेक पसंद आयी लड़की ? '' मैं रूखा उत्तर देते  हुए  बोलै -'' नहीं  माँ ----मुझे पसंद  नहीं  आयी  ---कहीं और  बात चलाईये |'' बहुत  तरह से बातें बनाकर मैंने माँ  को  संतुष्ट किया लेकिन  मेरा  दिल  जनता  था कि मैंने ऐसा क्यों  किया ? मैंने  ऐसा केवल इसीलिए  किया था कि यदि इसी  तरह  अन्नू  मेरे सामने  आती  रही तो मैं  अपने  पर नियंत्रण नहीं  रख पाउँगा और  अब यह  न  तो मेरे हित में  है  और  न  ही अन्नू  के |

डॉ शिखा कौशिक 'नूतन'

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

औरत जात

सड़क पर नंगी लाश पड़ी थी. चारों ओर इकट्ठा लोग अनुमान लगा रहे थे - "लगता है बलात्कार करने के बाद मारकर  फेंक दिया है यहां.. आठ नौ साल की रही होगी.. पर मुद्दा ये है कि ये हिन्दू थी या मुस्लिम?" तभी भीड़ को चीरती हुई एक औरत ने लाश के पास पहुंचकर उसे अपने दुपट्टे से ढ़कते हुये कहा - मुद्दा ये नहीं कि ये हिन्दू थी या मुस्लिम.. मुद्दा ये है कि ये औरत जात थी. "
डॉ शिखा कौशिक नूतन 

रविवार, 17 दिसंबर 2017

गरमागरम मामला -लघुकथा

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कॉलेज के स्टाफ रूम में  पुरुष सहकर्मियों के साथ यूँ तो रोज़ किसी न किसी मुद्दे पर विचार विनिमय होता रहता था पर आज निवेदिता को दो पुरुष सहकर्मियों की
उसके प्रति की गयी टिप्पणी और उससे भी बढ़कर प्रयोग की गयी भाषा बहुत अभद्र लगी थी . हुआ ये था कि दिसंबर माह में पड़ रही सर्दी के कारण निवेदिता ने लॉन्ग गरम  कोट पहना हुआ था  ,इसी पर टिप्पणी करता हुआ  एक पुरुष सहकर्मी निवेदिता को लक्ष्य कर बोला- 'देखो मैडम को आज कितनी सर्दी लग रही है ,लॉन्ग गरम कोट ,नीचे पियोर वूलन के कपडे !''इस पर दूसरे पुरुष सहकर्मी ने भी उसका साथ देते हुए कहा-'' बहुत ही गरमागरम मामला है .'' ये सुनकर पहला पुरुष सहकर्मी ठहाका लगता हुआ बोला -'' अरे आप भी क्या कह रहे हो ....गरमागरम मामला .'' और उसके ये कहते ही दोनों मिलकर मुस्कुराने लगे और निवेदिता का ह्रदय पुरुष के इस आचरण पर क्षुब्ध हो उठा जो स्त्री को हर समय इस प्रकार प्रताड़ित करने से  बाज नहीं आता .निवेदिता ने सोचा कि वो इनसे पूछे कि क्या आप लोग अपनी बहन के साथ बाहरी पुरुषों को ऐसी मजाक करने की इजाज़त  दें सकेंगें ...यदि नहीं तो आप मेरे साथ ऐसी मज़ाक कैसे कर सकते हैं ?'' पर ये शब्द निवेदिता के मन में ही दबकर रह गए .

सोमवार, 29 मई 2017

शर्मिंदा-लघुकथा...

शर्मिंदा-लघुकथा...

''अरे चेयरमैन साब ! आपको क्या जरूरत थी आने की ......चपरासी को भेज देते ...मैं आपकी पसंद का सामान घर ही पहुंचवा देता .''  जनरल स्टोर पर पधारे विशिष्ठ अतिथि को देख स्टोर मालिक सोनू गदगद हो उठा . चेयरमैन साब मुस्कुराते हुए बोले ' अरे नहीं नहीं ....आज सोचा कस्बे में घूम आऊं .ये सामने रखा बाथ सोप दिखाना .''  नहाने के साबुन की ओर इशारा कर उन्होंने कहा .सोनू ने तुरंत उन्हें वैसे ही चार साबुन दिखा दिए और बोला  -'' बेस्ट सोप है ...ले लीजिये .'' उन्हें पसंद आये और उन्होंने पूछा -'' कितने के हुए ?'' सोनू सकुचाता हुआ बोलै -'' क्यों शर्मिंदा करते हैं ? आपसे पैसे लूंगा क्या ! " चेयरमैन साब के बहुत बार कहने पर भी उसने साबुनों के रूपये नहीं लिए और ठंडा - गरम मंगाने की जिद करने लगा पर चेयरमैन साब के पास अधिक समय नहीं था और वे विदा हो गये. उनके जाने के बाद एक गरीब आदमी सोनू के स्टोर  पर आया और वैसे ही नहाने के साबुन की ओर इशारा करता हुआ बोला - 'ये कितने का दिया भाई?' सोनू उपेक्षित से भाव में बोला - 'सत्तर  रूपये का है एक.' वो गरीब आदमी जेब से रूपये निकालकर सकुचाते हुये बोला - 'ये पैंसठ रूपये हैं... पांच बाद में लगा लेना.' उसकी विनती सुनकर सोनू उसे समझाते हुये बोला - '  भाई ...कोई सस्ता सा साबुन ले ले ..उधार मांगकर मुझे शर्मिंदा मत कर .'' उसकी इस बात पर गरीब आदमी उसके स्टोर से उतर कर चल दिया और वास्तव में मानवता शर्मिंदा हो उठी .

शिखा कौशिक 'नूतन' 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

सूजी हुई आँखें-कहानी

''...बहू अगर चाहती है तो बेशक तुम अलग घर ले लो ..लेकिन याद रखना एक दिन तुम्हें मेरे पास वापस आना ही होगा .'' माँ ने गंभीर स्वर में अपना निर्णय सुना दिया . सच कहूँ तो मेरी माँ से दूर जाकर रहने की रत्ती भर भी इच्छा नहीं थी लेकिन अनुभा के जिद करने के कारण  मैंने यही निर्णय लिया कि '' अलग ही रहा जाये ...कम से कम ऑफिस से जब शाम को थका हुआ घर वापस आऊंगा तब अनुभा की सूजी हुई आँखें तो नहीं होगी .अभी दो साल ही तो हुए थे हमारे विवाह को .माँ न जाने क्या-क्या कहती है अनुभा को दिनभर में कि मेरे पीछे वो रोती ही रहती है .यद्यपि अनुभा ने माँ कही गयी कोई बात मुझे आज तक नहीं बताई लेकिन हमेशा यही कहती ..अगर अलग घर ले लो तो मैं भी कुछ दिन और जी लूंगी .'' ये सब सुनकर मैं दिल ही दिल में डर जाता कि कहीं तनाव न झेल पाने के कारण अनुभा गलत कदम न उठा ले .माँ के आज्ञा देने के बाद शहर में ही एक फ्लैट ले लिया और मैं माँ को पुश्तैनी घर में अकेला छोड़ अनुभा के साथ उस फ्लैट में शिफ्ट कर गया .ये एक इत्तफाक ही था कि उस फ्लैट में सैटल होने के तीन दिन बाद ही हमें पता चला कि मैं पिता व् अनुभा माँ बनने वाली है .मैं चाहता था कि माँ को बता आऊं लेकिन कदम रूक  गए ...न जाने क्यों ऐसा लगा कि माँ को ख़ुशी नहीं होगी .हालाँकि मेरी और अनुभा की शादी माँ की मर्ज़ी से ही हुई थी लेकिन माँ दहेज़ में और भी बहुत कुछ चाहती थी जो उन्हें नहीं मिल पाया और इसका हिसाब उन्होंने अनुभा को तानें दे दे कर वसूलना चाहा .कभी कभी सोचता हूँ कि औरत की सबसे बड़ी दुश्मन औरत ही है क्या जो उसे बहू के रूप में तड़पाती है और यहाँ तक कि उसे जलाकर मारने में भी पुरुषों से पीछे नहीं रहती .पिता जी जीवित होते तो माँ की शिकायत उनसे कर सकता था पर वो तो मेरे विवाह से पूर्व ही स्वर्ग सिधार गए थे  .खैर छोडो अब मुझे अनुभा का विशेष ध्यान रखना होगा .
         कुछ दिन बीते ही थे कि एक दिन जब मैं ऑफिस से लौटकर आया तो अनुभा के मुंह से यह सुनकर कि '' कभी माँ से भी मिल आया कीजिये .'' मैं अचंभित रह गया .आखिर जिसके साथ रहने से अनुभा की ज़िंदगी कम होती थी आज उसी की चिंता हो आयी .मैंने  '' मिल आऊंगा '' का वादा किया और कॉफी बनाकर लाने का अनुभा से आग्रह किया .अनुभा की माँ से मिल आने की बात  पर आश्चर्य तो बहुत हुआ ,फिर ये सोचकर चुप हो गया कि मैं पुरुष स्त्रियों की मनोवृत्ति को क्या समझूँ !''दो दिन बाद रविवार को नाश्ते के समय अनुभा ने जब मुझसे ये कहा कि ''चलो आज माँ से मिल आये  .'' तब मैं उससे पूछे बिना न रह सका -'' एक बात बताओगी अन्नू जब उस घर में एक साथ रहते थे तब तो माँ का चेहरा तक नहीं देखना चाहती थी लेकिन ....पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ माँ से मिलने की बड़ी इच्छा हो रही है तुम्हारी !'' अनुभा कुछ गंभीर होती हुई बोली -'' जानते हो जब मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ तो मेरा मन करा कि सबसे पहले माँ को बताकर आये ...फिर मैंने भी यही सोचा कि जिसने मुझे इतने कष्ट दिए क्या उसके प्रति मैं विनम्र बन जाऊं ? ..लेकिन एक बात बताइये क्या इस ख़ुशी पर माँ का हक़ नहीं है ?'' अनुभा के इस जवाब ने मुझे लगभग चुप्पी साधने पर मजबूर कर दिया लेकिन मैं चाहता कि गर्भवती अनुभा को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुंचे अतः मैंने अनुभा को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि मैं अकेला ही जाऊंगा और यदि माँ ने अनुभा से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तब मैं अनुभा को भी किसी दिन माँ से मिलवा लाऊंगा .वादे के अनुसार मैं माँ से मिलने जब घर पहुंचा तो माँ मुझे गले लगाकर रो पड़ी और मैंने उसे ये खुशखबरी सुनाई कि वो दादी बनने वाली है तो फ़ौरन बोली -'' बहू को साथ ले आता तो कोई ज्यादा तेल खर्च हो जाता तेरी गाड़ी का ! ..अच्छा ऐसा कर ये रख सोने का कंगन ....मेरी ओर से बहू तो दे देना .'' मैं फिर विस्मय में पड़ गया कि जो माँ तरह-तरह के ताने देकर बहू को पल भर भी चैन की साँस न लेने देती थी वो आज कैसे उसकी शुभकांक्षिणी हो गयी ? मैंने कंगन अपनी पेंट की जेब में रखा और माँ से '' फिर आऊंगा'' कहकर घर से निकल लिया .अनुभा माँ का आशीर्वाद पाकर अत्यधिक प्रसन्न हुई .अब मुझे लग रहा थी कि मैंने ही बहुत स्नेह  करने वाली सास-बहू को एक दूसरे  से दूर कर रखा है अन्यथा इनका प्रेम तो अटूट है .
     ऐसे ही एक  दिन सुबह  से ही प्रोग्राम था मेरा व् अनुभा का माँ से मिलने जाने का .मैंने ऑफिस का काम जल्दी निपटाया और ठीक चार बजे घर पहुँच गया .दो बार डोर बैल बजायी पर अनुभा खोलेने ही नहीं आयी .मन में अनेक शंकाएं जन्म लेने लगी ...न जाने अनुभा क्यों इतनी देर कर रही है ! रोज़ तो डोर पर ही खड़ी हो जाती है मेरे इंतज़ार  में पर डोर खुलते ही मैं हक्का-बक्का रह गया क्योंकि द्वार अनुभा ने नहीं माँ ने खोला .'' माँ तुम यहाँ ?'' मेरे मुंह से अनायास ही ये निकल गया .माँ ने प्रश्न के उत्तर में एक और ही प्रश्न कर डाला -'' क्यों मैं नहीं आ सकती यहाँ ?' मैं क्या जवाब देता , मैंने झुककर माँ के चरण-स्पर्श किये और कपडे बदलने अंदर बैडरूम में चला गया . कपडे बदलकर लौटा तो माँ और अनुभा को एक साथ बैठकर बातें करते देखकर मुस्कुरा दिया .माँ अनुभा को अनेक सलाहें दे रही थी और अनुभा एक आज्ञाकारी बहू के रूप में सहमति में सिर हिलाये जा रही थी .माँ जब चलने को हुई तो मुझसे ज्यादा अनुभा ने आग्रह किया माँ से रुकने का .माँ ने पुनः आने का आश्वासन दिया .अनुभा माँ को मेरे साथ बाहर तक छोड़ने गयी .माँ को विदा कर जब मैं और अनुभा वापस ड्रांइग रूम में आये तो अनुभा मुझसे बोली -'' सुनिए क्यों न हम वापस घर चले ? मैं ये सुनकर काफी भड़क गया -'' अब वापस चले !!!अन्नू ये सब क्या है ? कभी माँ तुम्हारी शत्रु थी और अब तुम फिर वही जाना चाहती हो !!!.'' अनुभा मुझे ऐसे क्रोध में देखकर सहम सी गयी और धीमे स्वर में बोली -'' नाराज़ क्यों होते हो ...यदि माँ आज आकर मुझसे विनती न करती तो क्या मैं ऐसी बात करती ? आप नहीं जानते माँ कितनी परेशानी में रहती हैं ! आप क्या जाने एक औरत के ह्रदय की अवस्था को ...पति तो स्वर्ग सिधार गए और बेटा दूर जाकर ..'' अनुभा ये कहकर अंदर चली गयी और मुझे इस अपराधबोध में  डाल गयी कि मैं कितनी नालायक एकलौती संतान  हूँ जो अपनी माँ का ध्यान नहीं रखता !'' खैर मैंने निश्चय किया वापस लौटने का .
          माँ के पास लौटकर आये अब आठ माह हो चुके थे .अनुभा ने अक्टूबर माह की बारह तारीख को एक फूल सी बिटिया को जन्म दिया . मैं हर्ष से खिल  उठा और माँ ये सुनकर कि '' पोती हुई है '' मुरझा गयी .
    अब पुनः वही सिलसिला शुरू हो गया है कि जब मैं ऑफिस से लौटता हूँ तो अनुभा की आँखें वैसे ही सूजी हुई मिलती हैं .

शिखा कौशिक 'नूतन' 

रविवार, 9 अप्रैल 2017

बुलंद आवाज़ -कहानी

ये हत्या एक नेता की नहीं थी ; ये हत्या थी सौहार्द व् उदारतावाद के मूर्तिमान व्यक्तित्व की , जो परम्परागत सफ़ेद धोती पहने ;नंगे सीने ....घुस जाता था उस जुनूनी भीड़ में जो कभी हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर तो कभी ब्राह्मण-शूद्र के नाम पर मरने-कटने को तैयार हो जाती थी .उसने कभी भगवा पट्टा गले में न डाला पर उसके कहने पर हज़ारों गौमांस खाने वालों ने गौमांस खाना बंद कर दिया क्योंकि उसने उनके दिलों में पैदा की थी गाय के प्रति वही आदर-स्नेह की भावना ; जो एक हिन्दू परिवार में ' गाय' हमारी माता है ' कहकर बच्चे-बच्चे में संस्कार रूप से भरी जाती है . वो कट्टर हिंदूवादियों को भी ललकारते हुए कहता -'' श्री राम के ठेकेदार मत बनो ...बनना है तो श्री राम के भक्त बनो .' वो अक्सर कहता -'' मंदिर तो आज बन जाये अगर इस मुद्दे पर सियासत न हो .'' उसके शब्द जनता पर जादू सा असर करते .जनता दीवानी सी  होकर उसे घेरे रहती .
          माँ-बाप शिकायत करते कि ' बेटियों -बहुओं का तो घर से निकलना ही मुश्किल हो गया है .'' तब वो फुंकारता हुआ कहता '' बेटों को रोका है शरारतें करने से .....बेटों को सुधारो ...बेटी-बहुएं खुद सुरक्षित हो जाएँगी .''
          जब  मुसलमान औरतें छाती पीटती आती पति द्वारा अकारण तलाक देने पर तब वो भड़ककर कहता -'' रोने से क्या होगा ? एकजुट होकर लड़ो ....धार्मिक ग्रंथों में जिस समय जो लिखा गया था वो उस समय की परिस्थिति  के अनुसार सटीक रहा होगा .....सदियाँ गुज़र गयी है.........कुछ तो बदलो ....''
       उसके खिलाफ फतवे जारी हो गए और कट्टरपंथी हिन्दू उसे मुल्ला कहने लगे .पत्रकार कहते -'सुरक्षा ले लीजिये '' तो वो हँसता  हुआ कहता -'' मालूम है ना इंदिरा जी को उनके सुरक्षा कर्मियों  ने ही भून डाला था ....चलो एक बात को लेकर तो मैं निश्चिन्त हूँ कि मेरे मरने पर दंगें न होंगें क्योंकि सियासत करने वाले दोनों हाथ मेरे खिलाफ हैं .''
        उसके बेख़ौफ़पन  से सियासत के बाजार में मंदी का माहौल हो गया .सियासी दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे .सियासी रोटी खाने वालो के बुरे दिन आ गए .दंगों के लिए तैयार माल गोदामों में सड़ने लगा .सियासतदारों ने अपने चमचों से उस पर जूते फिकवाए .उसने जूता हाथ में लेकर जनता से पूछा- ' बताओ ये जूता हिन्दू का है या मुसलमान का ?'' जनता ठहाका लगाने लगी .उसके घर पर पत्थरबाज़ी करवाई  गयी , वो मुस्कुराते हुए बोला -'' चलो पत्थर दिलों से निकले इतने पत्थर , अब उनके दिल का बोझ कुछ तो कम होगा .'' उसके चरित्र पर भी हमला किया गया पर हर स्त्री में माता का रूप देखने वाले उस स्फटिक जीवनधारी को कौन लांछित कर सकता था !
           वो हर हमले के बाद मज़बूत होता गया .जनता के दिल में उसके लिए जगह बढ़ती गयी .उसकी आवाज़ और बुलंद होती गयी .अब सियासतदारों  के पास अंतिम उपाय यही रह गया था कि ''इस आवाज़ को हमेशा हमेशा के लिए खामोश  कर दिया जाये !'' उन्होंने उसके नंगे सीने को गोलियों से छलनी कर डाला .कमर पर बंधी सफ़ेद धोती भी खून से सन गयी .उसके आखिरी शब्द थे-'' ये गोलियां न हिन्दू की हैं ..न मुसलमान की ...ये सियासत की गोलियां हैं ...इनसे बचकर रहना देशवासियों .'' उसकी शवयात्रा में हिन्दू-मुसलमान सभी थे और उनके कानों में गूँज रही थी ...उसकी ही बुलंद आवाज़ .सियासत करने वाले क्या जाने ये आवाज़ें तो सदियों तक ऐसे ही गूंजती रहेंगी ..इन्हें जूतों , पत्थरों और गोलियों से कभी खामोश नहीं किया जा सकता है ........आमीन !   ...तथास्तु !

शिखा कौशिक 'नूतन'