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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

साक्षात् देवी -एक लघु कथा

साक्षात् देवी -एक लघु कथा 
jai mata dijai mata di


शुचि  का  मूड  सुबह  से  ही  ख़राब  था  .उसके यहाँ बर्तन साफ करने वाली जमुना मौसी की बेटी का विवाह बीस हजार रूपये का इंतजाम न होने के कारण आगे टलने के कगार पर था और शुचि के पतिदेव विपुल ने उन्हें बीस हजार रूपये उधार  देने से इंकार कर दिया था .शुचि जानती  थी की आज  कल  विपुल को  व्यापार  में घाटा  झेलना  पड़  रहा  है  वरना  वो  भी  किसी की मदद करने में पीछे नहीं हटता .ऐसी ही ख़राब मूड में वो घर के कम में लग गयी थी और विपुल अपने कार्य स्थल को रवाना हो गया .दिन में दो बजे अचानक विपुल को घर लौटा देख शुचि उसके स्वास्थ्य को लेकर सशंकित हो उठी पर विपुल के चेहरे पर आई चमक देखकर वह भी खिल उठी .विपुल चहकता हुआ बोला-''....शुचि जल्दी से तैयार हो जाओ ..हम अभी जमुना मौसी के घर चलेंगे .....उनकी बिटिया का विवाह अब नहीं टलेगा .....याद है मैंने आने वाले नवरात्रों में देवी मैया  को जोड़ा व् कंगन चढाने  की प्रतिज्ञा की थी पर अब जब असली कन्या देवी रूप में हमारी भेंट  स्वीकार  कर रही रही तब मैं साक्षात् देवी की उपेक्षा का पाप अपने सिर  पर ले सकता हूँ ?....शुचि का ह्रदय  आनन्द  से भर उठा और नेत्र श्रृद्धा जल से नम हो गए .वो हाथ जोड़कर देवी मैय्या को नमस्कार करती हुई बोली-''विपुल देवी मैय्या ने ही आपको यह अच्छी सोच प्रदान की है .देखना आज जमुना मौसी के रूप में माता हमारी झोली आशीषो से भर देगी !''

                                                 शिखा कौशिक 
                               [मेरी कहानियां ]
                     

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

''अच्छा फिर फोन मत करना ...!'-एक लघु कथा

''अच्छा फिर फोन मत करना ...!'-एक लघु कथा 

[फोटो सर्च से साभार ]
''हैलो.....हैलो .....बेटा कब आ रहे हो इण्डिया ?...बहुत मन कर था तुमसे,बहू व् पोते से मिलने का .''...''माँ अभी तो टाइम नहीं मिल पायेगा ...यूं नो आई एम् वैरी  बिजी .......आप करती क्या हो सारे दिन वहां ?डैड की डैथ के  बाद से आप हो भी बिलकुल अकेली गयी हो ........आप किसी ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर जाइये ....मन भी लग  जायेगा आपका .हमारे आने  का कोई प्रोग्राम नहीं है ..शायद ही समय मिले .आपके पोते की जिद पर  नेक्स्ट   वीक यूरोप भ्रमण की योजना है .अपना ध्यान रखना .....कोई परेशानी हो तो फोन कर देना  .माँ प्रणाम !'' 


दो  महीने बाद -


''हैलो ...हैलो ....माँ...प्रणाम! क्या बात है दो महीने से कोई फोन नहीं आया .मैंने अगले वीक इण्डिया आने का प्रोग्राम बनाया है .आपकी बहू और पोता भी आ रहे हैं .''...... माँ गंभीर स्वर में बोली  ''अरे बेटा खुद  ही बोलते जाओगे या मेरी भी सुनोगे...यहाँ आने का प्रोग्राम बनाने से पहले मुझसे पूछ तो लेते .अभी मेरे पास टाइम नहीं है ......बहुत बिजी हूँ .ओल्ड एज होम में शिफ्ट कर गयी हूँ .रोज नए  काम  ....नए परिचय  .....अब तो ये ही मेरा परिवार है .मेरी मृत्यु पर भी आने की जरूरत नहीं .यहाँ मैंने सब  इंतजाम कर लिया है .अच्छा फिर फोन मत करना ...!'

                                                                           शिखा कौशिक 
                                                           [मेरी कहानियां ]

बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

बहू से आशा -एक लघु कथा

बहू  से आशा  -एक लघु कथा   

''बहू .....बहू रानी  कहाँ  हो  ....जरा  यहाँ  तो  आओ !'' दिव्या ने ज्यों ही
 अपनी सासू माँ की आवाज सुनी अपना फेवरेट  सीरियल छोड़कर व्  पास सोये अपने दो  साल के बेटे '' राम '' के सिर पर स्नेह से हाथ फेरकर उनके कमरे की ओर चल दी .
....''आपने मुझे बुलाया मम्मी जी ?''दिव्या ने सासू माँ के कमरे में प्रवेश करते हुए पूछा .''हाँ बहू ....लेटे-लेटे आज बड़ा मन कर आया कि 'श्री रामचरितमानस '' की कुछ चौपाइयां    सुनूँ .आँखों से मजबूर न होती तो खुद ही पढ़ लेती .....तुम्हे परेशानी तो नहीं  होगी  ?'' ....''अभी  आई मम्मी जी ...परेशानी कैसी ?दिव्या ने मुस्कुराते हुए कहा .
सासू माँ हँसते हुए बोली ''....अरे कोई जबरदस्ती नहीं है ....अभी कुछ टी.वी. पर देख रही हो तो देखकर आ जाना .''...''नहीं मम्मी जी यदि आज अपनी इच्छाओं को आपकी आकांक्षाओं से ऊपर स्थान दूँगी तो कल को 'राम' की बहू से क्या आशा रखूंगी ?यह कहकर  दिव्या टी.वी.को स्विच ऑफ करने  हेतु अपने कमरे की ओर बढ़ चली .
                                                                  शिखा कौशिक 
                                                  [मेरी कहानियां ]

सोमवार, 29 अगस्त 2011

भारी-लघु कथा

Free Stock Photo: Tornado and lightning


जोरदार तूफ़ान शुरू हो चुका था .साठ वर्षीय सूरज सिंह तेजी से घर की ओर ही आ रहा था.धूल उड़ने के कारण आँख भी ठीक से नहीं खुल पा रही थी .घर कुछ ही दूर रह गया था.तूफ़ान इतना तेज था कि पीछे को धक्का दे रहा था.सूरज सिंह को घर का द्वार धुंधला सा नज़र आया और उसके बाहर आंधी से जूझता  हुआ नीम का पेड़ .सूरज सिंह अभी पेड़ के करीब पहुंचा ही था कि सालों पुराना पेड़ भड़भड़ाता   हुआ उस पर ही गिर पड़ा .सूरज सिंह की आवाज गले में ही अटक गयी .बड़ी मुश्किल से दबे दबे ही वह केवल इतना पूछ पाया -''अहसानफरामोश पेड़ तुझे पिछले कितने ही सालों से सुबह शाम पानी से सींचता रहा और तूने  मुझे  ही दबा डाला .''उसे लगा जैसे पेड़ भी जवाब दे रहा है -''मूर्ख ! अहसानफरामोश मैं नहीं तू है .याद कर तूने कैसे बेइज्जत कर अपने पिता को घर से निकाल  दिया था ?उन्होंने भी तो तुझे बचपन से लेकर जवानी तक खूब लाड़- प्यार और  अपने खून की गाड़ी कमाई से सींचा था पर तूने अंतिम दिनों में उन्हें घर से निकाल दिया .तेरे कारण  सड़कों पर भटक-भटक कर मरना उन्हें जितना भारी पड़ा था उससे ज्यादा भारी नहीं हूँ मैं दुष्ट !'' तूफ़ान थमने पर लोगों ने जब सूरज सिंह को पेड़ के नीचे से निकाला  तब तक उसके प्राण -पखेरू उड़ चुके थे .

                                             शिखा कौशिक 

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

'गुडिया मुझे माफ़ कर देना !''

''गुडिया मुझे माफ़ कर देना !''

[फोटो सर्च से साभार ]

सुधा और दीपक दो दिन की यात्रा के पश्चात्  घर पहुंचें.शाम के पांच  बजने आये थे .फरवरी का  माह था अत: हवाओं में शीतलता बची  हुई थी .दीपक ने घर के किवाड़  खुलवाने को अपने बेटे को आवाज लगाई -''बिट्टू ......बिट्टू ....'' तीन-चार  आवाज पर भी जब किवाड़ नहीं खुले तो सुधा ने भी आवाज लगाना  शुरू कर दिया ''....तानी....तानी....किवाड़ खोलो बेटा .''जब इस पर भी किवाड़ नहीं खुले तो दीपक ने किवाड़ों पर जोर से धक्का मारा और किवाड़ तेजी से खुल गए .दीपक ने बमुश्किल अपने को गिरने से बचाया .''....आखिर कहाँ मर दोनों ?''सुधा आपा खोते हुए बोली .दीपक ने उसे समझाते हुए कहा  '......अरे  गुस्सा क्यों करती हो !यही आस-पड़ोस में गए होंगे कहीं .....तुम देखो जरा....मैं पान का  बीड़ा बंधवाकर अभी वापस आता हूँ .''यह कहकर दीपक घर से बाहर निकल लिया .सुधा ने सारा सामान एक ओर रखा और स्वागत कक्ष  में पहुँच कर देखा वहां कोई नहीं था .वह तानी के कमरे की ओर चल दी .कमरे में पहुँचते ही जो उसने देखा उसके पैरों तले की जमीन खिसक गयी .उसकी सत्रह वर्षीय बेटी तानी बेहोश नग्न अवस्था में लहुलुहान बिस्तर पर पड़ी थी.सारा कमरा इस  बात की गवाही दे रहा था कि तानी ने अपनी इज्जत बचाने के लिए काफी संघर्ष किया होगा .सुधा के मुंह से चीख निकलने  ही वाली थी कि उसने अपने होंठ भीच लिए .उसने तुरंत कमरा अन्दर से बंद किया और एक चद्दर से तानी का शरीर ढक दिया .पास स्टूल पर रखे पानी के गिलास से पानी ले तानी के मुंह पर छिड़का तो वह कुछ होश में आई और बडबडाने लगी -''..........बिट्टू भैया मुझे छोड़ दो .......छोड़ दो ....मै मम्मी से कह दूँगी  .....''और फिर बेहोश हो गयी .सुधा का दिल जोर से धड़कने लगा .उसने तानी के चेहरे पर धीरे से चपत लगा होश में लाने  का प्रयास किया ''......बेटा उठ ....देख मैं .....मम्मी ....''लगातार सुधा की आँखों से आंसू बहे जा रहे थे .तानी को होश आया तो सुधा से लिपट गयी .....''मम्मी ...मम्मी देखो बिट्टू भैया ने क्या किया ...?''सुधा उसके मुंह पर हाथ रखते हुए बोली ''.......बेटा चुप हो जा .....कुछ नहीं हुआ !'''  तानी को साहस बंधाती हुई सुधा खुद फफक -फफक कर रो पड़ी तभी स्वागत कक्ष से दीपक की आवाज सुनाई दी''....सुधा कहाँ हो तुम /अब तुम भी रल गयी क्या ?...''सुधा तानी को चुप रहने का निर्देश दे स्वागत कक्ष तक किसी प्रकार चलकर आई पर वहां पहुँचते ही उसके पैरों ने जवाब दे दिया और दिल ने भी.गहरी सांस भरते हुए किसी प्रकार बोली -''दीपक....दीपक....बिट्टू ने ....तानी के साथ .....बहुत गन्दा ...कम कर दिया !''यह कहते कहते वह फर्श पर निढाल हो बैठ गयी .दीपक के मुंह से बस इतना निकल पाया ''क्या कह रही हो ?पागल हो गयी हो क्या ?''इतने में बिट्टू बाहर से आता दिखाई दिया .पहले सुधा की नज़र उस पर पड़ी उसने मुंह फेर लिया पर तभी बिजली की तेजी से उठी और बिट्टू के पास पहुँच कर चांटों से उसका मुंह लाल कर दिया .लगातार रोती सुधा को  तभी दीपक ने पीछे हटाया और बिट्टू की गर्दन पकड़ते हुए दीवार के पास सटाकर बोला -''हरामजादे .......अपनी सगी बहन के साथ मुंह काला करते शर्म न आई ?''गर्दन कसी होने के कारण बिट्टू की साँस उखड़ने लगी थी .सुधा ने किसी तरह दीपक के हाथ की पकड़ ढीली करवाई इस प्रयास में उसे भी धक्का लगा .दीपक बिट्टू के मुंह पर  थूकते हुए बोला ''कमीने ...दूर हो जा मेरी नज़रों से '''.दीपक के हाथ गर्दन से हटते ही बिट्टू अपने कमरे की और दौड़ पडा  .दीपक सोफे पर सिर पकड़ कर बैठ गया फिर अचानक कुछ दृढ  निश्चय कर उठ खड़ा हुआ और सुधा से बोला -''....देखो अभी तुम तानी के पास जाओ ...मैं बाज़ार होकर  आता हूँ .''सुधा ने दीपक की आँखों में ऐसा कठोरपन आज तक नहीं देखा था .कुछ भी पूछने की हिम्मत न कर सकी .सुधा चुपचाप तानी के पास चली गयी .थोड़ी देर में दीपक हाथ में एक दूध से भरा गिलास लेकर तानी के कमरे में पहुंचा .तानी का  चेहरा देखकर उसकी आँखों में नमी आई पर तुरंत वही कठोरपन वापस आ गया .सुधा को वो गिलास पकड़ते हुए बोला -''यह तानी को पिला दो इसकी हालत में सुधार  हो जायेगा   '' सुधा ने प्रश्नवाचक नज़रों से दीपक की ओर देखा ....''पिला दो ''कड़क  आदेश  था यह दीपक का     .सुधा   ने कांपते  हाथों  से  वह  गिलास   लेकर तानी   के पास   पहुँच  उसे  बड़े  प्यार  से उठाते  हुए  कहा  -''  तानी  बेटा ! ले  उठ  ये  पी  ले .....सब  ठीक  हो  जायेगा  .''सुधा  के  ममतामय  इन  शब्दों  के आश्वासन   पर  अर्द्ध -चेतनायुक्त  तानी वह सारा  दूध   पी गयी  .और  फिर  .....अगले  दिन   तानी की  चिता  को  आग  देते  हुए  दीपक  मन  ही  मन  माफ़ी  मांग  रहा  था  -''मेरी  गुडिया  मुझे  माफ़  कर  देना  मैं  इसी  तरह  अपने  और  तेरे  गौरव  की  रक्षा  कर सकता  था  !''
                                     शिखा कौशिक

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बहन का सवाल ! -एक लघु कथा

बहन  का  सवाल ! -एक लघु कथा

रजत ने गुस्से  में तमतमाते हुए घर में घुसते ही आवाज  लगाईं  -मम्मी 'सारा' कहाँ है ? मम्मी थोडा घबराई   हुई किचन से बाहर आते हुए बोली -''...............क्या हुआ  रजत ?.....चिल्ला क्यों रहा है ........सारा तो अपने कमरे में है .तुम दोनों भाई-बहन में क्या चलता रहता है भगवान ही जानें ! उसके पैर में मोच है सचिन अपनी बाइक पर छोड़कर गया है कॉलेज से यहाँ घर ....''रजत मम्मी की बात अनसुनी करते हुए सारा के कमरे की ओर बढ लिया .सारा पलंग पर बैठी हुई अपने पैर को सहला रही थी .रजत ने कमरे में घुसते ही कड़क वाणी में कहा -''.....सारा कितनी बार मना किया है कि किसी  भी लड़के की बाइक पर मत बैठा करो !तुम मुझे कॉल कर देती मैं आ जाता तुम्हे लेने .....मेरा कॉलिज दूर ही कितना है तुम्हारे कॉलिज से !आज के बाद यदि तुम्हे किसी लड़के की बाइक पर पीछे बैठा देखा तो अच्छा न होगा !...''यह कहकर आँख दिखाता हुआ रजत सारा के कमरे से चला गया .सारा के गले में एक बात अटकी ही रह गयी -''....भैया केवल आपने ही नहीं देखा था मुझे .....मैंने भी देखा था आपको सागरिका को आपकी  बाइक पर पीछे बैठाकर जाते हुए .मैंने जानबूझकर    नज़र चुरा ली थी ....मै आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहती   थी ......पर जब  आप अपनी बहन का  किसी और लड़के की बाइक पर बैठना पसंद  नहीं करते फिर किसी और की बहन को क्यों बैठा लेते हैं अपनी बाइक पर ?........केवल इसलिए की आप लड़के हो .....आप जो चाहो करो ....सब सही है !''
                                          शिखा कौशिक
                http://bhartiynari.blogspot.com/

रविवार, 26 जून 2011

''धोखा ''-एक लघु कथा

''धोखा ''-एक लघु कथा 
''चलो घर से भागकर शादी कर लेते हैं !'' रोहित के यह कहते ही ज्योति का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा.भावनाओं और क्रोध दोनों को संयमित करते हुए ज्योति कड़े शब्दों में बोली ''वाह !रोहित क्या यही तरीका है अपने सपनों को पूरा करने का ?अगर मेरे माता-पिता समाज के उलाहने सह भी लेंगे तो क्या मैं खुद को कभी माफ़ कर पाऊँगी उन्हें धोखा देने के लिए और ....मेरा भाई ...वो तो जहर ही खा लेगा .''    ......''तो फिर वे मेरे और तुम्हारे विवाह को राजी क्यों नहीं होते ?रोहित झुंझलाते हुए बोला ....''ये प्रश्न तो मैं भी तुम से कर सकती हूँ ...आखिर तुम्हारे माता-पिता क्यों तैयार नहीं हैं और ..........फिर तुम कैसे उनकी खिलाफत करकर ये विवाह करना चाहते हो?आखिर एक ऐसी लड़की को वे कभी ''बहु'' का सम्मान कैसे दे पाएंगे जो अपने माता-पिता की इज्जत को मिटटी में मिलाकर   घर से भागी हो .'' ज्योति के प्रश्न के उत्तर में रोहित उदास होता हुआ बोला ''तो क्या अपनी प्रेम-कहानी का अंत समझूं ?''.....''नहीं अब तो यह कहानी शुरू हुई है .हमें न घर से भागना है और न घुटने टेकने हैं .हमें बस अपने परिवार से धोखा नहीं करना है .''आँखों से आश्वस्त करती ज्योति ने अपना पर्स उठाया और रोहित से विदा ली .अभी ज्योति को गए एक घंटा ही हुआ था की रोहित के मोबाईल पर उसकी कॉल आई .सुनकर रोहित हक्का-बक्का रह गया .उसने पास खड़ी अपनी बाइक स्टार्ट की और ज्योति के घर की ओर दौड़ा दी .ज्योति के घर पहुँचते ही बाहर खड़ी   एम्बुलेंस देखकर उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगे .ज्योति को घर के अन्दर से उसके पिता व् भाई किसी तरह सहारा देकर एम्बुलेंस तक ला रहे थे .रोहित ने बाइक वहीँ छोड़ी और उसी ओर बढ़ लिया .ज्योति के करीब पहुँचते ही वो सबकी परवाह छोड़ कर उसे झंकझोरते हुए बोला ''ज्योति ये तुमने क्या किया ?तुम तो किसी को धोखा नहीं देना चाहती थी फिर जहर खाकर मुझे क्यों धोखा दिया ?...ज्योति थोडा होश में आते हुए बोली ....''रोहित मैंने तो सबका मान रखना चाहा था ......पर...मेरे माता-पिता ने ही मुझे धोखा दे दिया ...ये मेरे मना करने पर भी मेरा रिश्ता कहीं ओर तय कर आये .....मैं उस नए बंधन को भी धोखे में नहीं रखना चाहती थी ...और ..इसीलिए ये जहर ......'''यह कहते -कहते ज्योति निष्प्राण हो बुझ गयी .
                                                                                                शिखा कौशिक 
                                                          http://shikhapkaushik.blogspot.com

शुक्रवार, 27 मई 2011

मीटिंग-लघु कथा



रजत ...आई कॉंट वेट एनी मोर !'' यह कहकर सोनाक्षी ने मोबाईल को स्विच ऑफ कर सोफे पर फेंक दिया .दोपहर से इन्तजार करते-करते अब रात के नौ बजने वाले थे और रजत घर नहीं लौटा था .रजत ने ही मूवी देखने का प्रोग्राम  बनाया था और बिजनेस मीटिंग के कारण इतनी देर हो गयी थी .सोनाक्षी ने कपडे बदले और बैडरूम में जाकर सो गयी .रात के साढ़े  ग्यारह बजे डोर बैल बजी तो उसकी नींद खुली .उसने मैजिक आई से देखा रजत ही था .डोर खोलते ही रजत का थका चेहरा देखकर वह सारा गुस्सा भूल गयी.रजत बैडरूम में जाते ही जूते उतारकर लेट गया .सोनाक्षी ने उसके माथे पर हाथ लगाकर देखा तो वह तप रहा था .सोनाक्षी ने फैमिली डॉक्टर से फोन पर बात कर घर में रखी दवाइयों में से एक दवाई रजत को दे दी .सुबह होते-होते रजत की तबियत में काफी सुधार आ गया .सोनाक्षी ने रजत को बैड से उठते देखा तो बोली -''अरे..उठ क्यों रहे हो ?आराम से लेटे रहो .आज सब मीटिंग कैंसिल  कर दो ..समझे !''रजत थोडा असहमत होता हुआ बोला ''...नहीं सोनू आज तो बहुत जरूरी मीटिंग है ...आज की मीटिंग कैंसिल करूँगा तो सब कुछ खो दूंगा ..''यह कहते हुए रजत  उठकर अपना ब्रीफकेस उठा लाया और खोलकर एक गिफ्ट पैक सोनाक्षी की ओर बढ़ा दिया .सोनाक्षी चकित होते हुए बोली ''ये क्या है ?'' ''खुद देखो !'' रजत ने माथे पर आए बाल हटाते हुए कहा .''.....अरे ..इतनी सुन्दर रिंग .....'' ''सिर्फ तुम्हारे लिए ''यह कहते हुए रजत ने सोनाक्षी के कंधे पर हाथ रखते  हुए कहा ''सॉरी... कल मैंने तुम्हारा दिल दुखाया था न ''.सोनाक्षी ने मुस्कुराते हुए रजत को आँखों ही आँखों में माफ़ करते हुए कहा ''अच्छा तो ये मीटिंग है .ये मीटिंग तो जीवन भर चलनी है....है न .''रजत भी मुस्कुरा दिया .

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

कोई हक़ नहीं -लघु कथा


कोई  हक़  नहीं -लघु कथा  

सोनाक्षी क्या कहती हो -विवाह बेहतर है या लिव इन रिलेशनशिप ? सिद्धांत के बेधड़क  पूछे गए सवाल से सोनाक्षी आवाक रह गयी उसने प्रिया की ओर  इशारा करते हुए कहा -''प्रिया से ही क्यों नहीं पूछ लेते !''सिद्धांत मुस्कुराता हुआ बोला ''ये सती-सावित्री के युग की है ये तो विवाह का ही पक्ष लेगी पर आज हमारी युवा पीढ़ी जो आजादी चाहती है वो तो लिव-इन रिलेशनशिप में ही है .'' प्रिया ने सिद्धांत को आँख दिखाते हुए कहा -''सिद्धांत मंगनी की अंगूठी अभी उतार कर दूँ या थोड़ी  देर बाद ..? इस पर सोनाक्षी ठहाका  लगाकर हँस  पड़ी और सिद्धांत आसमान की ओर  देखने लगा .सोनाक्षी ने प्रिया की उंगली में पड़ी अंगूठी को सराहते हुए कहा ''...वाकई बहुत सुन्दर है !सिद्धांत आज की युवा पीढ़ी  की बात तो ठीक है ....आजादी चाहिए पर सोचो यदि हमारे माता-पिता भी लिव-इन -रिलेशनशिप जैसे संबंधों को ढोते  तो क्या हम आज गरिमामय जीवन व्यतीत करते और फिर भावी पीढ़ी  का ख्याल करो जो बस यह हिसाब ही लगाती रह जाएगी कि हमारे माता पिता कब तक साथ रहे ?हमारा जन्म उसी समय के संबंधो का परिणाम है या नहीं ?हमारे असली माता पिता ये ही हैं या कोई और ?कंही हम अवैध संतान तो नहीं ?....और भी न जाने क्या क्या .....अपनी आजादी के लिए भावी पीढ़ी  के भविष्य को बर्बाद करने का तुम्हे या तुम जैसे युवाओं को कोई हक़ नहीं !'' सोनाक्षी के यह कहते ही प्रिया ने सिद्धांत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा -''अब कभी मत पूछना विवाह बेहतर है या लिव-इन-रिलेशनशिप .''सिद्धांत ने मुस्कुराते हुए ''हाँ'' में गर्दन हिला दी .
                                                 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

लघु कथा -डर


''मॉम क्या आप और डैड मुझसे गुस्सा होकर मुझे जान से भी मार सकते हैं ?''तेरह वर्षीय अपनी बेटी स्नेहा के मुख से ऐसी बात सुनकर उसकी मम्मी तृप्ति हैरान रह गयी .उन्होंने स्नेहा को पास बैठाकर बहुत प्यार से पूछा -'''ऐसा क्यों पूछ रही हो तुम्हे हम पर विश्वास नहीं !'' स्नेहा ने न में गर्दन हिलाते हुए मासूमियत के साथ कहा -''नहीं ममा ऐसी बात नहीं पर मेरी फ्रेंडस कह रही थी कि उन्हें अब अपने डैड-मॉम से डर लगने लगा है ..वो ...न्यूज पेपर में आ रहा था कि आरुषि तलवार के मर्डर केस में उसके पेरेंट्स पर ही शक किया जा रहा .मॉम क्या ऐसा हो सकता है ? तृप्ति ने स्नेहा के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा -नहीं बेटा कभी नहीं ......जाओ स्टडी करो .....ये सब बेकार की बातें हैं इन पर ध्यान मत दिया करो !'' स्नेहा उठकर अपने स्टडी रूम में चली गयी और तृप्ति मन में सोचने लगी ''......बेटा तुम्हारा और तुम्हारी फ्रेंडस का डर जायज है जब माली ही गुलशन उजाड़ेंगे तब फूल तो खिलने से डरेंगे ही ...''   

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

लघु कथा -हद

'वंदना ' देख रितेश ने मुझे कितने सुन्दर कंगन दिए हैं ?''चहकती हुई सुमन की बात सुनकर वंदना थोड़ी नाराज होते हुई बोली ''....सुमन ये सब ठीक नहीं ...तू जानती है ताऊ जी कितने गुस्से वाले हैं !..यदि उन्हें पता चल गया तू कॉलिज में किसी लड़के के साथ प्रेम लीला कर रही है वो तुझे जीते जी जमीन में गाड़ देंगे  और ताई जी तो कुछ बोलेंगी भी नहीं तेरे पक्ष में ...वो तो खुद घबराती हैं ताऊ जी से ....मेरी बात सुन रितेश से सब मतलब ख़त्म कर ले .....'' ''नहीं वंदना ...मैं रितेश के साथ धोखा नहीं कर सकती ' सुमन बात काटते  हुए बोली .........      ''तो मर .....' वंदना ने सुमन का हाथ झटका और उठकर वहां से चली गयी .अगले दिन वंदना कॉलिज गयी  तो पता चला कि सुमन कॉलिज नहीं आयी .अनजाने भय से उसका ह्रदय काँप गया .कॉलिज से लौटते  हुए वंदना सुमन के घर गयी तो पता चला कि वो कल ताऊ जी के साथ अपने मामा के घर चली गयी है .इस तरह एक महीना बीत गया फिर एक दिन वंदना के पिता जी ने घर लौटकर बहुत धीमे स्वर में बताया -''सुमन ने मामा के घर में आग लगाकर आत्महत्या कर ली कल रात .बहुत मुश्किल से मामला रफा-दफा हो पाया है पुलिस में वरना वे तो भाई साहब  को फंसा रहे थे कि उन्होंने मारा hai सुमन को .... उसे मार भी देते तो क्या ?घर की इज्जत सडको पर नीलाम  होने देते ?आखिर लड़की को अपनी हद में तो रहना ही चाहिए !''आँखों -आँखों  में वंदना को भी धमका डाला था उन्होंने .

सोमवार, 28 मार्च 2011

लघु कथा -दोषी कौन

अस्पताल के बर्नवार्ड में बेड पर अस्सी प्रतिशत जली हुई सुलेखा का अंतिम बयाँ लिया जा रहा था .सुलेखा तड़पते हुए किसी प्रकार बोल रही थी -''मेरी इस दशा के लिए मेरे ससुराल वाले ज्यादा दोषी हैं.या मेरे मायके वाले ....मैं यह नहीं जानती पर जन्म के साथ ही मैं एक लड़की हूँ यह अहसास मुझे कराया जाता रहा .मेरी माँ मुझसे बचपन से ही सावधान करती रहती ''ठीक से काम कर ...कल को अपने घर जाएगी तो मुझे बदनाम करेगी क्या ?''पिताजी कहते ''ठीक चाल-चलन रख वर्ना कैसे ब्याह होगा ?''......विदाई के समय माँ ने कान में धीरे से कहा था -''अब बिटिया वही तेरा घर है ...भागवान औरत वही है जिसकी अर्थी उसके पति के घर से निकले .अब बिटिया हमारी लाज तेरे ही हाथ में है .मायके की लाज को संभाले मैं जब ससुराल पहुंची तो पहले दिन से ही ताने मिलने लगे -''क्या लाई है अपने घर से !एक से एक रिश्ते आ रहे थे हमारी अक्ल पर ही पत्थर पड़े थे जो इसे ब्याह लाये ...''हर त्यौहार पर भाई सिंधारा लाता ...पूछता अच्छी तो है जीजी ?मैं कह देती ''हाँ'' तो पलट कर यह न कहता ''कहाँ जीजी तू तो जल कर कोयला हो गयी है !सच कहूँ माँ -बाप -भाई के इस व्यवहार ने मुझे बहुत दुखी किया .कल जब मेरे पति ने मुझसे कहा की ....जा मेरे घर से निकल जा ...तब एक बार मेरे मन में आया कि क्या यह मेरा घर नहीं !...पर तभी ये विचार भी मेरे मन में आया कि जिस घर में मैं पैदा हुई ,चहकी,महकी ....जब वही घर मेरा नहीं तब ये घर कैसे हो सकता है ?मैं दौड़कर स्टोर रूम में गयी और मिटटी का तेल अपने पर उड़ेल लिया और आग लगा ली .अब आप लोग ही इंसाफ करते रहना कि मेरी इस दुर्दशा के लिए ससुराल वाले ज्यादा दोषी हैं या मायके वाले ....''.

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

तारों भरा आकाश

संध्या कहाँ हो तुम ? उषा ने अपनी छोटी बहन को ऊपर छत से आवाज लगाई तो सीढियां चढ़ती हुई संध्या तेजी से वहीँ आ पहुची । ''''क्या है दीदी?'' ''अरे देख तो आकाश में आज कितने तारे चमक रहें !'' .दीदी के चेहरे पर चमक देखकर संध्या की आँख भर आई पर उसने आंसू छिपाते हुए कहा 'हाँ !दीदी इसे ही शायद ''विभावरी'' की संज्ञा दी जाती है ।'' उषा एकाएक रुआंसी हो आई ''...बब्बू होता तो शायद ताली बजाता होता और ....''यह कहते हुए संध्या के गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़ी .संध्या के ह्रदय में भी हूक सी उठी ''......काश बब्बू उस दिन स्कूल न जाता ।'' स्कूल बस व् ट्रक की सीधी टक्कर में कुछ अन्य बच्चों के साथ चार वर्षीय बब्बू भी हादसे का शिकार हो गया था .इस हादसे ने उषा और उसके पति मुकुल के दिल का सुकून व् जीवन के प्रति आस्था को छिन्न-भिन्न कर डाला था .उषा की उदासी देखते हुए ही उसके पिता जी उसे ससुराल से यही घर ले आये थे .संध्या का साथ पा उषा कुछ-कुछ तो अपने गम पर काबू करना सीख गयी थी पर इतना आसान तो नहीं होता जिगर के टुकड़े को भुलाना .उषा की माँ भी उसको देखकर मन ही मन में घुली जाती थी .उषा को समझाते हुए संध्या नीचे ड्राइंग रूम में ले आयी .नीचे आने पर उषा को तबियत ख़राब लगी तो बेडरूम में जाकर सो गयी .माँ,पिता जी व् संध्या चिंतित हो उठे .सुबह तक भी जब उषा का स्वास्थ्य गिरा गिरा रहा तो माँ के कहने पर पिता जी लेडी डॉक्टर को बुला लाये .डॉक्टर ने चेकअप कर मुस्कुराते हुए कहा ''उषा माँ बनने वाली है और आप परेशान हो रहे हैं ? ''उनके यह कहते ही सबकी आँखों में ख़ुशी के आंसू छलक आये .संध्या ने धीरे से उषा के कान में कहा '....लो दीदी फिर से आने वाला है जो तारों भरे आकाश को देखकर ताली बजाएगा !'' उषा ने संध्या को गले से लगा लिया .

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

लघु कथा-समय नया -सोच वही



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                                           [फोटो बुक्केट से साभार ]
......शर्मा जी और सब तो ठीक है बस समीर चाहता है कि कनक बिटिया बाल नए फैशन के कटवा ले ......यू नो .....आजकल के लड़के कैसी पत्नी पसंद करते हैं !'' यह कहकर समीर के मामा जी ने फोन काट दिया .शर्मा जी असमंजस में पड़ गए ....आखिर ये कैसी डिमांड है ? शर्मा जी के पास बैठी उनकी पत्नी मिथिलेश बोली ''क्या कह रहे थे भाईसाहब ?' शर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले ''मिथिलेश याद है तुम्हे शादी से पहले तुम किरण बेदी टाईप बाल रखती थी और मेरी जिद पर तुमने इन्हें बढा लिया था क्योंकि मै चाहता था कि तुममे लक्ष्मी जी का पूरा रूप दिखे पर .........आज देखो होने वाला दामाद चाहता है कि कनक अपने बाल कटकर छोटे करा ले .......कितने अजीब ख्यालात रखती है नयी पीड़ी !'' मिथिलेश व्यंग्य में मुस्कुराते हुए बोली ''नयी हो या पुरानी पीड़ी चलती तो पुरुष की ही है न !जाती हूँ कनक के पास ;उसे तैयार भी तो करना है बाल छोटे करवाने के लिए .''
                                                  शिखा  कौशिक  
                               [मेरी कहानियां ]