आगे ख़ुदा जाने कौन बेहतर है ?-एक लघु कथा |
''आ जाओ बाऊ जी.. ...मेरी रिक्शा में बैठ जाओ ...मैं छोड़ दूंगा .'' हड्डी हड्डी चमकते बदन वाले नफीस ने बीच राह में ख़राब हुई कार के पास खड़े सूटेड-बूटेड मोटे पेट वाले महाशय को संबोधित करते हुए कहा . वे अकड़कर बोले - '' कितने लेगा ....लीला होटल के पास है मेरा बंगला ?'' नफीस बोला -''...बाऊ जी वो तो बहुत दूर है ...पचास तो लूँगा ही .'' अपने ड्राइवर को कार ठीक कराकर बंगले पर ले आने का निर्देश देकर वे तीन पहियों की उस सवारी पर सवार हो गए .और नफीस पेंडिल दर पेंडिल चलाते हुए उन्हें उनके गंतव्य की ओर ले चला .बंगले पर पहुँचते ही वे महाशय रिक्शा से उतरे और सूट की जेब से बटुआ निकाल चार दस के नोट नफीस की ओर बढ़ाते हुए बोले -'' ले रख !' आवाज में ऐसी कड़क थी जैसे मुफ्त में उसे रूपये पकड़ा रहे हो .नफीस गिड़गिडाता हुआ बोला -'नहीं बाऊ जी ....ये तो जुल्म कर रहे हो आप .'' मोटे महाशय भड़कते हुए बोले -'अबे कैसा जुल्म .....रख ले !'' ये कहकर नोट नफीस के हाथ में थामकर वे अपने बंगले की ओर बढ़ लिएनफीस मन मसोसकर रिक्शा मोड़ वापस चल दिया तभी उसे एक आठ-दस साल के बच्चे ने हाथ देकर रुकने का इशारा किया .नफीस के रुकते ही वो मैले-कुचैले कपड़ों वाला बच्चा बोला -''चच्चा ..मयूर पार्क के पास जाना है ..चलोगे क्या ..कितना पैसा लोगे चच्चा ?'' नफीस उसकी बात पर हँसता हुआ बोला -''बैठ जा बेटे ..मैं उधर ही जा रहा हूँ .जो जी में आये दे देना .बच्चे ने जेब से निकाल कर पांच का नोट आगे कर दिया .नफीस उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोला -''आइसक्रीम खा लियो इसकी बेटा जी ..अपने इस चच्चा की तरफ से .'' नफीस के ये कहते ही बच्चा खुश होकर रिक्शा में बैठ गया .नफीस ने एक नज़र उन मोटे महाशय के बंगले पर मारी और सोचा -''वाह रे!!! बाऊ जी आपके पास केवल बड़ा बंगला है पर मेरे पास बड़ा दिल है ....आगे ख़ुदा जाने कौन बेहतर है ?' ये सोचते सोचते वो मस्त होकर अपनी रिक्शा लेकर चल पड़ा .
शिखा कौशिक 'नूतन ' .
4 टिप्पणियां:
unchi dukan feeka pakwan isi ko kahte hain .बेहतरीन अभिव्यक्ति .आपकी कहानी मन को छू गयी . आभार . सब पाखंड घोर पाखंड मात्र पाखंड
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अमीर का दिल ही तो गरीब होता है और गरीब का दिल अमीर ...बस येही फर्क है अमीर और गरीब में ?
नफीस की बहुत नफीस कथा .,,,
अमीर्रों का दिल बहुत छोटा होता है,सुंदर लाजबाब प्रस्तुति,,,
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लाजबाब प्रस्तुति,,
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