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सोमवार, 25 नवंबर 2013

कोई तो कमी है !!-लघु कथा

मधुकर बाबू के घर आज चहल-पहल थी .देवउठान एकादशी को ही उनकी पच्चीस वर्षीय विधवा बिटिया रिया का पुनर्विवाह होने जा रहा था .विवाह-स्थल पर सादगी से विवाह-संस्कार पूरे किये जा रहे थे .एक ओर एकत्रित आस-पड़ोस की महिलाओं की मण्डली इस विवाह के सम्बन्ध में अपनी अपनी राय ज़ाहिर कर रही थी .सत्या बोली -''अरे मैं तो सोच रही थी कोई बड़ी उम्र का दूल्हा होगा ..भला विधवा से कोई कम उम्र का लड़का क्यूँ ब्याह करने लगा ? ..पर ये तो रिया के साथ का ही लग रहा है और सुदर्शन भी है .'' विभा सिर का पल्लू ठीक करते हुए बोली -'' ठीक कह रही हो भाभी जी ...रिया से पूछा था मैंने कि दुल्हे की भी दूसरी शादी है क्या ?...बाल बच्चे भी हैं क्या ?...तो बोली 'नहीं चाची जी ये इनकी पहली ही शादी है .'' सुरेखा मुंह बनती हुई बोली -'' हो न हो कोई कमी तो है इस लड़के में वरना एक विधवा से कोई कुंवारा क्यूँ ब्याह करने लगा भला ...सरकारी अधिकारी है बड़ा ..तेरे ताऊ बता रहे थे .'' सुशीला सुरेखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली -'' ताई जी ठीक कह रही हो कोई न कोई कमी तो जरूर है .'' उन मधुमक्खियों की घिन-घिन तब टूटी जब फेरे पूरे हो गए और मधुकर बाबू नवदम्पत्ति को आशीर्वाद देते हुए बोले -'' तुम दोनों की जोड़ी हमेशा बनी रहे और बेटा तुमने जो भारतीय समाज की दकियानूसी सोच को दरकिनार कर मेरी विधवा बेटी के जीवन में फिर से खुशियां भरी हैं मैं इसके लिए तुम्हारा आभारी हूँ .'' दूल्हे राजा ने मधुकर बाबू के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा -'' मैंने कोई उपकार नहीं किया है .रिया मुझे मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनसंगिनी लगी इसीलिए मैंने उसका हाथ आपसे मांग लिया और मुझे पता है कि यहाँ उपस्थित लगभग सभी का यही मत होगा कि मुझमे कोई न कोई कमी जरूर है जो मैंने एक विधवा लड़की से विवाह का निश्चय किया .हाँ मुझमे बहुत बड़ी कमी है और वो है -मैं भारतीय समाज की दकियानूसी सोच के अनुसार नहीं चलता जो सोच ये कहती है कि एक विधवा लड़की को केवल बड़ी उम्र का ,विधुर पुरुष ही ब्याहकर ले जा सकता है .'' दूल्हे राजा की ये बातें सुन सत्या ,विभा,सुरेखा व् सुशीला एक दुसरे का मुंह ताकते हुए सोचने लगी -'' कहीं दूल्हे राजा ने हमारी बातें सुन तो नहीं ली ?''
शिखा कौशिक 'नूतन '

1 टिप्पणी:

Vaanbhatt ने कहा…

सार्थक सन्देश...