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शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

मज़हबी रंग -लघु कथा


 सुमेधा रिक्शा से कॉलेज जा रही थी .मेन रोड पर आते ही पीछे से आते जूनून ने बदतमीज़ी की सीमा पार करते हुए सुमेधा का दुपट्टा खींच लिया .सुमेधा को इसका अंदाज़ा नहीं था पर तुरंत संभलते हुए वो चिल्लाई ''पकड़ो' और खुद भी रिक्शा से कूद पड़ी .जूनून घबराहट में साइकिल लेकर भागा पर संतुलन बिगड़ने के कारण धड़ाम से गिर पड़ा .उसके आस-पास भीड़ इकठ्ठी हो गयी .कुछ लोग जोश में आकर चीखने -चिल्लाने लगे .नेता टाइप लोगों ने मौका देखकर चिंगारी लगाईं -'' हद हो गयी ...हिन्दू लड़कियों का तो घर से निकलना ही पाप हो गया .घर से निकली नहीं और मुसलमान लड़के पड़ लिए पीछे ....मारो साले के !'' नेता टाइप लोगों के इस आह्वान पर ज्यों ही भीड़ जूनून को मारने के लिए आगे बढ़ी सुमेधा भीड़ को चीरते हुए जूनून के आगे दीवार बनकर खड़ी हो गयी और गला फाड़कर बोली -ख़बरदार जो किसी ने मेरे मुसलमान भाई को हाथ लगाया .ये तो बिना सोचे समझे ऐसी गलत हरकत कर बैठा पर आप लोग इस हादसे को मज़हबी रंग देने की कोशिश न करें . इस मज़हबी आग में हजारों मासूम लोगों की जिंदगी स्वाहा हो चुकी है .मासूमों के क़त्ल करने वालों को न तो भगवान् ही माफ़ करेगा और न अल्लाह ही .इसे सजा देने का अधिकार केवल मुझे है ...मैं इसे माफ़ करती हूँ !!'' ये कहकर सुमेधा ने अपना दुपट्टा उठाया और सलीके से ओढ़ लिया .भीड़ पर चढ़ा सांप्रदायिक नशा उतर चूका था .सब सुमेधा की सोच की प्रशंसा करते हुए अपने अपने गंतव्य की ओर अग्रसर होने लगे और जूनून ने सुमेधा के पैरों में अपना सिर रख दिया . नेता टाइप लोग भी खिसियाते हुए वहां से सरक लिए .


शिखा कौशिक 'नूतन'

1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

थोड़ी सी समझदारी वरतने से घटना टल सकती है..

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