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बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

प्रायश्चित की आग-लघु कथा


चौदह वर्षीय पारस का ह्रदय व्यथित था . उसकी सौतेली माँ ने आज जरा सी बात पर उसको इतना लताड़ा कि वो लज्जित होकर गाँव के बाहर बने गुरु जी के आश्रम की ओर चल दिया .आश्रम में पहुंचकर उसने देखा कि गुरु जी एक खरगोश को गोद में लेकर उसके जख्म पर दवा लगा रहे थे .पारस ने उनको प्रणाम किया और उनके चरणों में गिरकर बेसुध होकर रोने लगा .गुरु जी ने नीचे झुककर खरगोश को ज़मीन पर छोड़ा तो वह फुदक फुदक कर इधर उधर दौड़ने लगा .गुरु जी ने पारस के सिर पर प्रेम से हाथ रखा तो मानों पारस के ह्रदय में जलती अपमान की अग्नि एकदम शांत हो गयी . गुरु जी ने पारस को अपने चरणों में से उठाते हुए कहा - '' उठो बेटा ! बताओ क्या कष्ट है ? तुम क्यों रो रहे हो ? '' पारस ने एक सांस में ही सौतेली माँ के बुरे व्यवहार के बारे में बता डाला . गुरु जी ने उसकी बात सुनकर थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बंद की और चिंतन की मुद्रा में खो गए .थोड़ी देर बाद मुस्कुराते हुए अमृतमयी वाणी में बोले - '' बेटा हम जो भी कर्म करते हैं वे हमारे साथ जन्म-जन्मान्तर तक चिपक जाते हैं .तुम्हारी सौतेली माता के ह्रदय में तुम्हारे प्रति जो घृणा का भाव है वो पिछले जन्म में तुम्हारे द्वारा उसके साथ किये गए दुष्कर्मों का ही परिणाम है .तुम पिछले जन्म में अपनी सौतेली माता के श्वसुर थे और तुमने बहू को इतना प्रताड़ित किया था कि उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी . इस जन्म में तुम्हारे प्रति नैसर्गिक घृणा का भाव तुम्हारी सौतेली माता के ह्रदय में तुम्हारे कर्मों के कारण ही आया .तुम अपने पूर्व जन्म के दुष्कर्मों का फल भोगने से भागो नहीं .सौतेली माता की सेवा कर उनके प्रति किये गए अपने दुष्कर्मों का प्रायश्चित करो क्योंकि प्रायश्चित की आग में जलकर ही वे दुष्कर्म राख होंगे .अन्य कोई उपाय नहीं है .जाओ घर वापस चले जाओ !'' गुरु जी की इस आज्ञा का पालन करते हुए पारस के कदम घर की ओर चल पड़े !
शिखा कौशिक 'नूतन'

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