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मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

तेजाबी मानसिकता -लघु कथा


तेजाबी हमले की शिकार युवती अस्पताल में जिंदगी व् मौत के बीच जूझ रही थी .युवती के माता -पिता का रो-रोकर बुरा हाल था .पुलिस के साथ मजिस्ट्रेट साहब पीड़ित युवती का बयान लेकर अस्पताल से बाहर निकले तो मीडिया-कर्मियों ने मजिस्ट्रेट साहब को घेर लिया और प्रश्नों की बौछार कर दी - '' सर लड़की का नाम क्या है ?' ''सर लड़की की उम्र क्या है ?'' ''सर लड़की के पिता कौन हैं ?'' ''सर लड़की यही शहर की है या कही और से आई थी ?'' ''सर क्या लड़की ने बताया कि उसके साथ बलात्कार क्यूँ हुआ ? '' सर लड़की ने क्या पहन रखा था ?'' ....प्रश्नों की इस बौछार के बीच कड़कती हुई दामिनी की सी आवाज़ में मजिस्ट्रेट साहब चिल्लाये -'' स्टॉप दिस नॉनसेंस ...आप लोगों ने एक बार भी ये नहीं पूछा कि वे दरिन्दे कौन थे ? कितने थे ?शराब पिए थे या नहीं ?...बस लड़की..लड़की ...लड़की ....ये लड़की कल आपकी बहन..बेटी भी हो सकती है .जिस दिन आप अपनी ये तेजाबी मानसिकता पलट देंगें कि बलात्कार की ख़बरों को चटपटी बनाकर अपने चैनल व् अख़बार बेंचे जाये चाहे इसके बदले पीड़ित लड़की की अस्मिता की धज्जियाँ उड़ाई जाये उस दिन आप लोगो के हर एक सवाल का जवाब दूंगा मैं .'' ये कहकर मजिस्ट्रेट साहब तेजी से अपनी गाड़ी की और बढ़ चले और मीडिया -कर्मी अपने सवालों पर शर्मिंदा हो उठे .
शिखा कौशिक 'नूतन'